बेटा जब समलैंगिक हो जाये 002

मेरे लेख बेटा जब समलैंगिक हो जाये 001 में मैं ने विषय प्रवेश किया था एवं कहा था कि विपरीत लिंगी व्यक्ति के प्रति किसी भी पुरुष या स्त्री का नजरिया उनके मांबाप से मिले नजरिये पर निर्भर करता है. इतना ही नहीं यदि गलत दृष्टिकोण मिला है तो अन्य लोगों द्वारा यह गलती बताने के बावजूद उन में से सिर्फ 20% लोग अपने गलत सोच को बदल पाते हैं.

Mother अनुंसंधानों से पता चला है कि यदि पिता मां के साथ नीच एवं क्रूर तरीके से व्यवहार करता है तो पुत्र के पुरुषविरोधी हो जाने की बहुत अधिक संभावना है. स्त्रीसमलैंगिकों में से बहुत सी कन्यायें इस तरह की पृष्ठभूमि से होती हैं. उसी तरह से यदि मां पुरुषविरोधी एवं हर तरह से पति को नीचा दिखाने वाली एवं घर को तानाशाही से चलाने वाली स्त्री हो तो बेटे के स्त्रीविरोधी होने की संभावना बहुत अधिक होती है. पुरुष समलैंगिकों में से बहुत अधिक लोग इस तरह की पृष्टाभूमि के होते हैं. इसे मन में रख कर मैं ने इस लेखन परंपरा का शीर्षक बेटा जब समलैंगिक हो जाये रखा है. यह शीर्षक लेखन के विषय की ओर इशारा मात्र करता है.

अब वापस आते हैं मूल विषय पर — स्त्रियों के साथ पुरुष का दुर्व्यवहार — जिसकी चर्चा हम ने कुछ दिन पहले शुरू की थी. एक नन्हा बालक यह सीख कर नहीं पैदा होता कि उसे स्त्री को क्या समझना चाहिये, स्त्री को घरसमाज में क्या स्थान देना चाहिये, एवं नारी से किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये. वह तो एक कोरे कागज के समान कोरा मन लेकर पैदा होता है जिस पर उसके पिता, माता, परिवार के अन्य लोग, बडेबूढे आदि प्रभाव डालते हैं. वह कोरा कागज धीरे धीरे भरने लगता है. इस में से कुछ बातें एक धब्बे के समान उसके मन पर स्थाई असर डाल देते हैं जिनको किसी भी हालत में आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है. स्वाभाविक है कि स्त्रीजन के बारें में उसको जो भी नजरिया दिया जाता है वह उससे शायद ही हटे. बलात्कारियों एवं स्त्रीशोषण में लिप्त बहुत से लोग मुलत: स्त्री को सिर्फ भोग्या समझते है. सवाल यह है कि यह सोच कहां से आई एवं कैसे उनके मन में घर कर गई. [शेष अगले लेख में] [Photograph by tp]

पृष्ठभूमि:

  • बलात्कारी एवं मनोविज्ञान
  • यौनाकर्षण, स्त्रियां, बलात्कार !
  • यौनाकर्षण: स्त्रियों की जिम्मेदारी/गैरजिम्मेदारी 2
  • यौनाकर्षण: स्त्रियों की जिम्मेदारी/गैरजिम्मेदारी 1
  • बेटा जब समलैंगिक हो जाये 001

    पिछले दिनों मैं ने कई बार स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की चर्चा की थी एवं इस बात पर जोर दिया था कि पुरुष की वासना को भडकाने की आजादी एवं पुरुष की वासानात्मक नजरों से सुरक्षा दोनों की मांग एक ही मूँह से नहीं आनी चाहिये. यह लेख इसी विषय की एक कडी है. Gays 

    पिछले 200 साल के मनौवैज्ञानिक अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ है कि अपने से विपरीत व्यक्ति के प्रति किसी भी व्यक्ति का व्यवहार इस बात पर निर्भर करता है कि जन्म से उसे कैसी तालीम दी गई है, विपरीत लिंगियों के प्रति उसके मांबाप का क्या नजरिया रहा है, एवं मांबाप का आपसी संबंध कैसा रहा है.

    उदाहरण के लिये, यदि उसे बचपन से यदि यह तालीम दी गई है कि उसके विपरीत लिंग के लोग बेकार, निकम्मे एवं सिर्फ विरोध एवं शोषण के पात्र हैं तो वह व्यक्ति बडे होने पर अपने से विपरीत लिंग के व्यक्तियों को हमेशा सिर्फ उसी शोषण के नजरिये से ही देखेगा, वह हमेशा उनका विरोध ही करेगा. बचपन की तालीम के कारण यह स्वभाव  उसके रोम रोम में इस तरह बस जाता है कि वह इसे चाह कर भी बदल नहीं सकता. हां चाहने की बात काफी दूर है, क्योंकि अपनी तालीम के कारण वह इन बातों को अकाट्य तथ्य के रूप में देखता है.

    Lesbians कोई व्यक्ति समलैंगिक निकल जाता है, स्त्री या पुरुष विरोधी निकलता है, या अपने से विपरीत लिंग के व्यक्ति को सदा गलत नजरिये से देखता है तो इस पर उसके घर की तालीम एवं मांबाप के नजरिये का अमिट एवं शाश्वत प्रभाव पडता है.

    यदि एक ही स्थिति में एक व्यक्ति स्त्री को भोग्या मानता है तथा दूसरा व्यक्ति उसको आदर का पत्र देवी मानता है तो उस सोच का मूल कारण भी उसकी घरू तालीम है.

    यदि समाज में स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर नियंत्रण करना है तो हमारे घरों में बच्चों को दी जाने वाली तालीम में आमूल परिवर्तन करना होगा. [शेष आगे के लेखों में]

    [Pictures By RandomlyRoaming, philippe leroyer]

    डायरी कैसे लिखें!

    कल के मेरे लेख डायरी तो बेवकूफ लिखते हैं!! में मैं ने लिखा था कि जो युवा लोग डायरी लिखते हैं उन में से बहुत से लोग ऐसी क्षणिक एवं भावनात्मक बातों के बारे मे लिख जाते हैं जो बाद में उन को परेशान कर सकते हैं, विशेष कर विवाह के बाद.

    Memories लेकिन, जैसा कई मित्रों ने अपनी टिप्पणियों में कहा है, डायरी लिखनी हो तो उसमें उन बातों को रेखाकित करें जो आजीवन आपकी मदद कर सकें. कुछ उदाहरण:

    1. सारी महत्वपूर्ण तिथियों को नोट करते जाये. परीक्षा, परीक्षाफल, इंटरव्यू, नौकरी लगने की तारीख, महत्वपूर्ण यात्राये, आपको मिले अवार्ड, आदि के तारीख. कल को आप की जीवनी लिखनी पडे तो यह डायरी आधारस्तंभ बन जायगी.

    2. जीवन के सारे महत्वपूर्ण निर्णय रेखांकित करें.

    3. प्रेरक प्रसंग रेखांकित करें.

    4. महत्वपूर्ण व्यक्तियों, पुस्तकों, घटनाओं को रेखांकित करें.

    5. अपने लक्ष्यों एवं उसके मूल्यांकन को रेखांकित करें.

    कुल मिला कर कहा जाये तो उसे इस तरह कहा जा सकता है:

    डायरी स्वान्तः सुखाय तो हो किंतु उसका एक सार्वजनिक हित का पक्ष भी हो तो बेहतर. ऐसी डायरियाँ आगे चलकर जीवन के सिंहावलोकन या आत्मकथाओं के लेखन मे बड़ी मददगार हो सकती हैं — युवा रचनाकार कृपया ध्यान दें — क्योंकि उम्र के उस पड़ाव पर जब सार्थक और सफल जीवन जीने के बाद लोग आत्म कथा लेखन की सोचते है तो याददाश्तजवाब दे जाती है — कई घटनाएं, तिथियाँ जिनका सार्वजनिक महत्त्व होता है भूल सी जाती हैं — अस्तु, डायरी लिखें मगर उत्तरदायित्व के साथ. [arvind mishra]

     

     

     

    [Photograph by popitz]

    डायरी तो बेवकूफ लिखते हैं!!

    आजकल कई युवा मित्रों की आदत सी बन गई है डायरी लिखने की. लिखते भी क्या है, दिनभर की सारी बातों को लापरवाही से लिख देते है. वे यह नहीं समझते कि ऐसा करना अपने जीवन में टाईम बम लगाने के सामान है, ऐसा बम जो एक बार फट कर खतम नहीं हो जाता बल्कि फटना चालू होता है तो लडी के समान जीवन-माला के अंत तक चलता ही रहता है.

    Diary मानव जीवन एक सरल अनुभव है. लेकिन लापरवाही इसे काफी जटिल बना सकती है. इतना जटिल कि उस जाल में उलझते चले जायें. डायरी आपके लिये यह जंजाल बन सकती है.

    युवा जीवन में हर कोई तमाम तरह के अनुभवों एवं अनुभूतियों से होकर गुजरता है. वासनाओं एवं कामनाओं पर नियंत्रण सीखा ही जा रहा होता है. ऐसी अवस्था में हर युवा/युवती कई तरह की बातें सोचता है, महसूस करता है. कई डायरीलेखक इतने बेवकूफ होते हैं कि अपने मानसिक भार एवं तनाव को कम करने के लिये ये सब लिख देते हैं.

    डायरियां भरती जाती हैं. पेटी में स्थान पाते जाते है. दस साल के बाद शादी होती है. पति या पत्नी शक्की किस्म का निकलता है. अचानक शक्की पति अपने हाथ पडी पत्नी की डायरी में पढता है, “आज दीपक ने मुझे चूमा तो मेरा मेरा रोम रोम पुलकित हो गया”. इस वाक्य के आगेपीछे दीपक के बारे में कुछ नहीं है. अब पति को समझाओ कि यह दीपक तो आपका भांजा है जो आपकी गोदी में पला था. पति क्यों मानेगा. वह तो आपको पीटने के लिये संटी तलाश रहा था, आपने उसके हाथ गदा पकडा दी.

    पत्नी शक्की निकलती है. अचानक पति की पुरानी डायरी में पढती है, “सारिका के साथ अपने अनुभव को मैं कभी नहीं भूल सकता”. अब आप समझाईये कि आप हिन्दी की पुरानी पत्रिका सारिका की बात कर रहे हैं. वह क्यों मानेगी. जो हथगोला तलाश रही थी उसे आपने एटम बम पकडा दिया है.

    बेवकूफी न करें. डायरी न लिखें. मुझ जैसे काऊसलर इस तरह ही समस्याओं को सुलझाते सुलझाते अब अपना मानसिक संतुलन खोने की स्थिति में आ चुके हैं. [Photograph by wiccked]