Posted February 22nd, 2008 by Shastri JC Philip
[विचरोत्तेजक चिट्ठे] अभी काफी विषयाधारित एवं विषयकेंद्रित चिट्ठे बचे हैं, उन की चर्चा भी करूंगा, लेकिन बदलाव के लिये आज एक नजर “विचारोत्तेजक” चिट्ठों पर डालते हैं. ये चिट्ठे कई विषयों पर लेख प्रकाशित करते हैं. लेकिन इस वर्ग का हर चिट्ठा पाठक को सोचने के लिये मजबूर करता है. मेरी पसंद के लगभग 10 विचारोत्तेजक चिट्ठों में से आज प्रस्तुत हैं तीन. बाकी चिट्ठों के बारें में इस परंपरा में जरूर लिखूंगा.
चिट्ठों को सिर्फ वर्गीकरण के हिसाब से प्रस्तुत किया जा रहा है, न कि किसी तरह की वरीयता या पहलेदूसरे क्रम के आधार पर. कारण यह है कि इन में से हर चिट्ठा अपने आप में अनोखा है एवं किसी भी चिट्ठे की तुलना अन्य चिट्ठे से नहीं की जा सकती.
दीपकबापू कहिन. दीपक भारतदीप से मेरी ‘मुलाकात’ जालजगत में हुई. बातबात में पता चला कि वे तो मेरे ही शहर ग्वालियर के निवासी है. अब तो वे मेरे अनुज तुल्य हो गये हैं. दीपक न केवल जम कर लिखते हैं, बल्कि हर लेख के पीछे गहन चिंतन छुपा रहता है. कभी कभार ये विषय से हट जाते हैं, जैसे कि पुरस्कार आदि के समय हुआ था, लेकिन वह सिर्फ एक क्षणिक प्रक्रिया है. वे पुन: अपने गंभीर लेखन-मनन पर आ जाते हैं. उनका कोई भी पाठक उनके गहन चिंतन/मनन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता.
भारतीयम प्रोफेसर अरविंद चतुर्वेदी के चिट्ठे पर पहली बार मैं संयोग से पहुंचा था. पहले ही लेख में मुझे लगा कि यह व्यक्ति विषय को प्रेषित करने में दक्ष है. फिर उनका परिचय देखा तो एकदम शंकानिवारण हो गया. वे पेशे से अध्यापक हैं एवं स्पष्ट है कि पढाने में दक्ष हैं. उनकी कक्षा में बैठने का दैवयोग न मिल पाया, लेकिन यह चिट्ठा उस खामी को पूरी कर देता है. लिखते रहें अरविंद जी, बस इतना याद रखें कुछ रिटायर्ड अध्यापक लोग भी आपकी जालकक्षा में बैठे हैं.
परिकल्पना जालभ्रमण के दौरान रवीन्द्र प्रभात के चिट्ठे पर मैं पहली बार अचानक ही पहुंचा था. लेकिन उनके लेखन में जो चुम्बकीय आकर्षण था उस कारण मैं दुबारा गया. तब उनकी कविता आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी…..! ने मेरे मन पर ऐसा असर डाला किये उसे सारथी पर उनकी अनुमति के साथ प्रकाशित किया. इस कविता को जरूर पढें, आप कहेंगे कि आपके विचारों को उन्होंने मथ दिया. लिखते रहें!
पाठकगण कृपया इन तीनों चिट्ठों का पठन करें. आपकी सुविधा के लिये चुने हुए चिट्ठों की कडियां हर लेख में चिट्ठाचित्र के साथ दी जा रही हैं.
मेरी पसंद के चिट्ठे 005
मेरी पसंद के चिट्ठे 004
मेरी पसंद के चिट्ठे 003
मेरी पसंद के चिट्ठे 002
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Posted February 21st, 2008 by Shastri JC Philip
आज मैं अपनी पसंद के एक चिट्ठे की बात करना चाहता हूँ जिसे पढते बहुत लोग हैं, लेकिन यह बात किसी को बताना नहीं पसंद करते. इस कारण इस चिट्ठे को पाठकों के अनुपात में टिप्पणियां कभी नहीं मिलती. टिप्पणी की जरूरत भी नहीं है, लेकिन इसे पढें जरूर.
सेक्स क्या: सवाल है कि इस चिट्ठे में ऐसी क्या बात है कि मैं खुले आम इसके बारे में लिख रहा हूँ. उत्तर हाजिर है:
- यह एक विषयाधारित चिट्ठा है.
- चिट्ठाकार के अनुसार, सेक्स को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं. जिसे लेकर सेक्स शब्द सामने आते ही जेहन में एक गलत छवि उभरती है. इस गलत को दूर करने का एक प्रयास है सेक्स क्या …
- मैं ने इसके सारे लेख पढे हैं एवं मेरे मूल्यांकन के अनुसार ये लेख 95% तक वैजानिक तथ्यों पर आधारित हैं, एवं वयस्कों के लिये हिन्दी में आधुनिक यौन शिक्षा का एक अच्छा रास्ता है.
- कुछ लोगों को इस चिट्ठे के चित्रों पर आपत्ति होगी. लेकिन लगभग 70% चित्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बनाये गये हैं. बाकी 30% चित्रों के बिना काम चल सकता है (मेरा इशारा उन चित्रों की ओर है जिन के बिना भी लेख समझा जा सकता है).
कुल मिला कर यह चिट्ठा यौनजीवन के बारें में वैज्ञानिक तथ्यों के प्रचारप्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. यौनजीवन के बारे में तथ्यपरक लेखों को छापने वाले इस चिट्ठे का मैं सार्वजनिक रूप से अनुमोदन करता हूँ.
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Posted February 20th, 2008 by Shastri JC Philip
मेरी रुचि विषयाधारित चिट्ठों के प्रति काफी अधिक है. मेरे पाठक जानते हैं कि इस विषय में मैं ने एक अभियान ही चला रखा है कि अधिक से अधिक चिट्ठे विषयाधारित हों या विषयकेंद्रित हों. हिन्दी का सौभाग्य है कि विषयाधारित चिट्ठे बढ रहे हैं. उनके पाठक भी बढ रहे हैं. जितने भी विषयाधारित चिट्ठे हैं उनको अन्य चिट्ठों की तुलना में स्थाई पाठक भी अधिक मिल रहे हैं.
इस समय लगभग 40 विषयाधारित चिट्ठे बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं. इन में से आर्थिक, फिल्म, शेयर एवं मार्केट से संबंधित चिट्ठों को मैं नहीं पढता क्योंकि इन विषयों में मेरी रुचि कम है. अत: इन अच्छे एवं उपयोगी चिट्ठों के बारें में मैं इस लेखन परंपरा में नहीं लिखूंगा.
मेरी पसंद के लगभग 25 विषयाधारित चिट्ठों में से तीन के बारे में आज कुछ कहना चाहता हूँ. लेखों में ये जिस क्रम से दिये जा रहे हैं वे पूरी तरह से Random हैं एवं इस क्रम में किसी भी तरह की वरीयता का प्रदर्शन नहीं है.
किसानो के लिए. पंकज अवधिया से मेरी पहली “मुलाकात” एक गूगलखोज के द्वारा हुई थी. उसके बाद मैं हमेशा उनके लेख पढता आया हूँ. भारत की लुप्त होती वैज्ञानिक जानकारी के एक महत्वपूर्ण पहलू को दस्तावेजीकरण द्वारा सुरक्षित रखने के लिये कृषिवैज्ञानिक पंकज का योगदान असाधारण है.
शब्दों का सफर अजित वडनेरकर शब्दव्युत्पत्ति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे है. अंग्रेजी में शब्दव्युत्पत्ति पर अनुसंधान एक अति विकसित क्षेत्र है, लेकिन भारतीय भाषाओं में मौलिक कार्य कम ही हुआ है. अजित जिस समर्पण के साथ शब्दों की साधना कर रहे हैं वह कल की पीढी के लिये एक महत्वपूर्ण योगदान होगा.
साईब्लॉग हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच वैज्ञानिक चिट्ठों का नितांत अभाव है. मुझ जैसे भौतिकविद को यह बात हमेशा खलती रहती है. लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में अब तीनचार चिट्ठे आ गये हैं, जिन में डॉ अरविन्द मिश्रा का साईब्लॉग बहुत महत्वपूर्ण है. वे पंकज या अजित के समान नियमित नहीं लिख पा रहे हैं, लेकिन उम्मीद है कि यदि पाठको की ओर से कुछ दबाव/टिप्पणी आदि बढ जाये तो वे और अधिक नियमित हो जायेंगे. यदि वे 3 दिन में एक बार 100 शब्दों का एक वैज्ञानिक खबर ही छाप दें तो उनका चिट्ठा दौडने लगेगा.
मेरी पसंद के विषयाधारित चिट्ठे अगले लेखों में !!
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Posted February 15th, 2008 by Shastri JC Philip
सबसे पहले तो मैं अपने मित्रों से क्षमायाचना करता हूँ जो काफी आस के साथ इस लेखन परंपरा को पढ रहे थे. कुछ तकनीकी कारणों से लिखने छापने में परेशानी आ रही है, लेकिन उम्मीद है कि इस हफ्ते यह समस्या हल हो जायगी.
हिन्दी के प्रचार प्रसार के प्रति मेरे झुकाव के कारण मैं काफी समय चिट्ठों को पढने में एवं उन चिट्ठों के निरीक्षण में लगाता हूँ जिन को आद्योपांत पढने के लिये समय नहीं है, लेकिन जिन के बारे में मुझे यकीन है कि वे अपने क्षेत्र में काफी महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं.
हिन्दी जाल पर कई युवा तुर्क हैं जिनको में नियमित पढता हूँ. इन में से तीन के बारे में मुझे कुछ कहना है.

महाशक्ति प्रमेन्द्र प्रताप सिंह देशभक्ति से ओतप्रोत हैं एवं हिन्दुस्तान के विरुद्ध कोई भी बात सहन नहीं कर पाते. मैं इनकी देशभक्ति का कायल हूँ. हां, कई बार इन से भाषा में चूक हो जाती है, लेकिन उमर के साथ वे और संतुलित तरीके से टीकाटिप्पणी एवं विमर्शन करना सीख जायेंगे. मेरी शुभकामनायें!
I’m Vikash & this is my world…! विकास कुमार काफी उत्साह के साथ लिखते हैं एवं इनके लेखों में काफी ऊर्जा दिखती है. विकास यदि नियमित रूप से लिखने लगें एवं विविध विषयों पर लिखने के बदले कुछ और विषयकेंद्रित लिखें तो बहुत आगे पहुंच जायेंगे.
सुनो भाई साधो…. कमलेश मदान अति उत्साही हैं एवं कुछ करना चाहते हैं. वे हिन्दी के लिये, हिन्दुस्तानी समाज के लिये, सब के लिये सब कुछ करना चाहते हैं. मेरे लिये वे एक अनुज हैं. उनकी लेखनी धीरे धीरे विषयकेंन्द्रित होती जा रही है जो की इस बात का लक्षण है कि वे जल्दी ही चिट्ठाजगत में काफी वजनी चिट्ठाकार माने जा सकते हैं.
इनको देख कर मुझे अकसर अपना बचपन याद आता है. मै बेहद क्रांतिकारी विचारक था. लेकिन मेरे गुरुजनों ने उस विचार को अनुशासित करके सही दिशा में उपयोग करना सिखाया — जिस तरह बांध की मदद से बाढ के पानी का उपयोग देश के लिये कल्याणकारी कामों के लिये किया जाता है. तीनों छोटे भाईयों को मेरा आशीर्वाद कि ईश्वर इसी प्रकार आप तीनों की लेखनी को सशक्त रखें.
विशेष नोट: इन लेखों में चिट्ठों का क्रम किसी भी प्रकार की वरीयता को नहीं दिखाता है. यह लेखन परंपरा लगभग 25 भागों में खतम होगी क्योंकि एक दिन सामान्यतया सिर्फ 3 चिट्ठों का परिचय होगा. इनका चित्र बनाने/स्थापित करने एवं विवरण लिखने में काफी समय लगता है.
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