Posted March 27th, 2008 by Shastri JC Philip
भुवनेश, शास्त्री, डा. महेश प्रकाश. भुवनेश के घर के सामने
जैसे ही मैं ने पुरातत्व संबंधी बहुत ही महत्वपूर्ण “ककनमठ” जाने की इच्छा के बारे में सारथी में लिखा, उसी समय हिन्दी पन्ना के भुवनेश ने मुझे ईपत्र लिख कर एवं दूरभाष द्वारा ककनमठ एवं उसके लगभग 60 किलोमीटर व्यास के कई सारे महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी दी. उन्होंने इन स्थानों के चित्र भी भेजे. (उनके द्वारा सुझाये गये बटेश्वर एवं चौसठ योगिनी मंदिर के छायाचित्र के लिये इसी साल ग्वालियर वापस जाने का इरादा बना लिया है).
ककनमठ यात्रा से लौटते समय हम भुवनेश के घर उतरे, पहली बार उन से मुलाकात की, चायनाश्ता किया एवं रात को घर वापस पहुंचे. भुवनेश से मुलाकात मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण था जितना ककनमठ का दर्शन. कारण स्पष्ट है — वे एक ऐसे मित्र हैं जो सिर्फ चिट्ठाकारी के कारण मुझे मित्ररूप में मिले हैं.
अत: आज का लेख मैं भुवनेश को समर्पित करता हुँ. इसके साथ साथ यह लेख उन सब वरिष्ट एवं कनिष्ट मित्रों को भी समर्पित है जो “सारथी” द्वारा मुझे मिले हैं.
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Posted March 26th, 2008 by Shastri JC Philip
ग्वालियर यात्रा के दौरान मैं एक डाकटिकट/सिक्का प्रदर्शनी में गया जहां हजारों साल पुराने भारतीय सिक्के प्रदर्शन के लिये रखे गये थे.
संयोग से, कुछ समय पहले पुरातत्व अध्ययन के कारण इस विषय में भी मेरी रुचि जागृत हो चुकी है एवं http://www.CoinsEncyclopedia.Com पर मेरे सहयोग से एक विश्वकोश तय्यार हो रहा है. इस बीच इस जालस्थल के मेरे सहयोगी ने भारतीय सिक्कों के बारे में लिखने के मामले में अपनी कठिनाई बताई अत: http://www.CoinsEncyclopedia.org पर हम ने भारतीय सिक्कों पर के विश्वकोश चालू कर दिया है जिस का संचालन मैं करूंगा.
आज का भारत किसी समय 500 से 1000 छोटे राज्यों में बंटा था एवं इन में से कई राज्यों के अपने सिक्के थे. उदाहरण के लिये, सिंधिया राजाओं के राज्यकाल में उन्होंने कम से कम 250 सिक्के चलाये थे. इस तरह सब राज्यों का हिसाब देखें तो भरतीय सिक्कों का अध्ययन काफी कठिन हो जाता है.
ग्वालियर यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात हुई श्रीमान अभय अग्रवाल से, जिन्होंने प्रदर्शनी में सैकडों अति प्राचीन भारतीय सिक्के प्रदर्शित किये थे. जैसे ही मैं ने अपनी रुचि बताई, मुझे एक प्रतियोगी न समझ कर, उन्होंने मुझे अलग ले जाकर विषया की सारी बारीकियां समझाईं. उसके बाद अपनी गाडी से इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकें एवं सूचियां दिखाईं जो दुर्लभ हैं एवं जिनको शायद मैं किसी भी तरह से न पा सकता. इतना ही नहीं उन्होंने अपने खर्चे पर ये किताबें मेरे लिये फोटोकापी कीं एवं मुझे प्रदान किया.
आज भी ऐसे भारतीयों की कमी नहीं है जो अपनी सोच एवं कर्म द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय आदर्श को प्रदर्शित करते है. अभय अग्रवाल जी को मेरा शत शत नमन्!!
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Posted March 14th, 2008 by Shastri JC Philip
जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था, अर्थलाभ की इच्छा त्याग दें तो आप की पुस्तक असानी से हजारों या लाखों लोगों तक पहुँच सकती है. इसके लिये सबसे अच्छा तरीका है ईपुस्तक के रूप में अपनी पुस्तक को प्रकाशित करना.
ईपुस्तक का मतलब है पुस्तकें जो इलेक्टानिक रूप में हैं एवं जिनको जाल पर बांटा जा सकता है. इसका सबसे सरल उदाहरण है पीडीएफ पुस्तकें. मेरी निम्न पुस्तकें पीडीएफ ईपुस्तक का उदाहरण हैं हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 1 से 5 व हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 6 से 8. पिछले एक साल में इसकी लगभ 1000 प्रतियां लोग अपने संगणक पर उतार चुके हैं. मेरी अंग्रेजी ईपुस्तकें (सब बाईबिल से संबंधित हैं) काफी बडे दायरे में जाती हैं अत: पिछले साल उनकी लगभग 600,000 प्रतियां इस तरह से वितरित हुई थीं. इस साल अनुमान 1,000,000 प्रतियोंके बंटने का है.
मुझे इससे कौडी भर का आर्थिक फायदा नहीं है, लेकिन जरा सोचें कि मेरी लेखनी का प्रभाव कितना व्यापक हो रहा है.
हिन्दी चिट्ठाकारों में से यदि तीसरा खंबा, शब्दों का सफर, पर्यानाद, साईब्लाग आदि विषयाधारित चिठों के वर्गीकृत लेखों को इस रीति से बांटने लगें तो उनकी पहुंच और भी व्यापक हो जायगी. पंकज अवधिया काफी सारे वैज्ञानिक दस्तावेज इस तरह से वितरित करते आये हैं. उम्मीद है कि आप लोग भी ऐसा करेंगे.
कैसे लिखें एक किताब इस साल
आपकी किताब छापेगा कौन??
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Posted March 12th, 2008 by Shastri JC Philip
बहुत से लोग हैं जो किताबें लिख सकते हैं, एवं जो लिखना भी चाहते है. लेकिन वे एक बात पर आकर अटक जाते हैं. सवाल यह है कि उनकी किताब कौन छापेगा. हिन्दीजगत में तो यह समस्या बहुत विकराल है क्योंकि लेखकों के अनुपात में प्रकाशक नहीं हैं, एवं जिनकी किताबें छप जाती हैं उन के पीछे कुछ न कुछ जुगाड रहता है जो आम लेखक से हो नहीं पाता है और उसकी किताब कभी छप नहीं पाती है.
असल समस्या यह है कि आम लेखक अपनी किताब छपने, उसके हाथों हाथ बिकने, एवं लाखों रुपये कमाने के दिवास्वप्न देखता रहता है. यह वास्तविकता से परे है एवं यह सपना उनको लेखक बनने से आजीवन वंचित रखता है. लाखों कमाने के लिये हिन्दी में अभी उपयुक्त बाजार नहीं है. हजार प्रतियों की एक अच्छी पुस्तक पांच से दस साल में बिकती है, एवं वहां लाखों के सपने देखना पराजय की गारंटी है.
आपको मालूम होना चाहिये कि अंग्रेजी बाजार में, जहां दस हजार से एक लाख प्रतियां बिकती हैं, दस में से सिर्फ एक पुस्तक पर प्रकाशक को सही आर्थिक फायदा होता है. उन में से भी सैकडो फायदेमंद किताबों में से सिर्फ एक किताब “बेस्टसेलर” हो पाती है.
अत: यदि आप आर्थिक लाभ की बात को भूलने को तय्यार हों तो ही पुस्तकलेखन कर सकेंगे. बल्कि यदि अर्थ आपका लक्ष्य नहीं है तो आजकल की नई तकनीकों द्वारा आप आसमान छू सकते हैं. मैं ने जब से अर्थलाभ को त्याग दिया है तब से इंटरनेट द्वारा मेरी पुस्तकों को लाखों प्रतियां हर साल वितरित होने लगी हैं. अगले लेखों में इन बातों का खुलासा करूंगा.
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