हम सब बाजार से मोलभाव करके एक से एक अच्छे आम और अमरूद खरीदना पसंद करते हैं, लेकिन सौ में से एक व्यक्ति भी शायद इनके पेड लगाकर इनकर सीचने-बढाने के लिये तय्यार नहीं होता है. तुरंत फल की कामना अधिकतर लोगों का स्वाभाव है. इस कारण बहुत से लोग पूछते हैं कि यदि आय कल होगी तो आज से चिट्ठाकारी क्यों करे! यह आम के पेड लगाने जैसी ही बात है.
तुरंत फल मिल जाये तो कई लोग हर दिन दो चिट्ठे लिखने को तय्यार हो जायेंगे. लेकिन कम से कम हिन्दी चिट्ठाकारी में विज्ञापन-जनित आय तुरंत नहीं मिल पायगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आय के इंतजार में आप आज जो कुछ लिखते हैं वह सब बेकार है.
चिट्ठाकारी एक ऐसा शौक है जो कल तक जो लोग आपस में अनजान थे उनको आज एक परिवार का अंग बना देता है. मैं ने 2007 मार्च में हिन्दी चिट्ठाकारी शुरू की थी. इन 16 महीनों में मुझे कम से कम 50 अच्छे मित्र मिल चुके हैं. पुरुषस्त्री दोनों. इन से पत्रव्यवहार चलता है. प्रोत्साहन मिलता है. मार्गदर्शन मिलता है.
सजीव सारथी केरल आते हैं तो मुलाकात जरूर होती है. बेजी (कठपुतलियां) आजकल केरल आई हैं, उनसे लगभग हर दूसरे दिन बातचीत हो जाती है. समीर जी ने केरल का प्रोग्राम बनाया तो पहल फोन मुझे किया. रायपुर से एक मित्र केरल पधारे तो उनके चिट्ठामित्र ने तुरंत मुझे पत्र लिखा. ज्ञान जी कई मामलों में मुझे परामर्श दे चुके हैं. पंकज अवधिया ने तो मेरे स्वास्थ्य के लिये इतना कुछ किया है कि यहां लिखने की जगह नहीं है. सुनीता (शानू), मीनाक्षी, अनीता कुमार, अनुनाद जी, उन्मुक्त जी, दिनेश जी, डा अरविंद, अजित, रवि रतलामी, मसिजीवी, नारायण जी आदि से पत्रव्यवाहार चलता है. रचना सिंह से वैचारिक चर्चा एवं मतभेद जम कर चलता है. प्रशांत प्रियदर्शी, बालकिशन एवं प्रमेंद्र मुझे प्रोत्साहित करते रहते हैं. ईगुरू माया जैसे कन्या मुझ अधेड को सार्वजनिक रूप से डंके की चोट पर छेडती है. मनीश, डा चोपडा, परमजीत बाली, संजय बेंगाणी जैसे मित्र मुझे कैसे मिलते. पिछली दीवाली पर ककनमठ गये तो मुरेना में भुवनेश के घर जम कर सत्कार हुआ. उनसे उससे पहले कभी मुलाकात नहीं हुई थी. अभी कम से कम पच्चीस नाम और हैं, लेकिन यहां पर रोक रहा हूँ जिससे कि इसे समय पर पोस्ट कर सकूँ.
एक साल में मुझे इतने मित्र मिले कि जीवन में इसके पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ. इसके साथ साथ लिखने, चर्चा करने, अपना नजरिया दूसरों के समक्ष रखने, आदि के लिये ऐसा एक रास्ता खुल गया जहा मैं किसी गैर पर, संपादक पर, या प्रकाशक पर निर्भर नहीं हूँ.
चिट्ठाकारी जरूर करें. नियमित रूप से करें. आपको एक बहुत बडी मित्र मंडली मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा, सोचने का अवसर मिलेगा, दूसरों को मदद करने का अवसर मिलेगा. आप की सोच को वे प्रभावित करेंगे, उनकी सोच को आप प्रभावित करेंगे. आपके मेरे जीवन पर इसका स्थाई, शाश्वत एवं सकारात्मक प्रभाव पडेगा. सबसे बडी बात यह है कि कल को इस से कुछ आय भी होने लगेगी.
[इस लेख के लिये मैं ज्ञान जी का आभारी हूँ जिन्होने कल सुझाव दिया था कि चिट्ठाकारी के इस पहलू को भी मेरे लेखों मे उजागर किया जाये]



