क्या फरक पडता है ?

image ज्वार-भाटे के समय समुद्र का पानी समुद्र तट पर काफी आगे तक भर जाता है और फिर वापस चला जाता है. इस प्रक्रिया में कई जगह स्टारफिश समुद्र के किनारे बालू में फंस कर मर जाते हैं.

एक बार एक फिलासफर समुद्र के किनारे चहलकदमी कर रहा था. उसने देखा कि एक आदमी तेजी से दौडता जा रहा है और रास्ते में दिखने वाले हर स्टारफिश को उठा कर वापस पानी में फेंकता जा रहा है.

उसको टोक कर फिलासफर बोला कि भईया एक ज्वार भाटे के साथ लाखों स्टारफिश बालू में फंस कर रह जाते हैं. अत: तुम चाहे कितने स्टारफिश उठा कर वापस फेंक दो, उनकी समस्या का हल नहीं हो सकता. सब मर जायेंगे. तुम्हारे कार्य से कोई फरक नहीं पडता. लाखों मरते रहेंगे.

फिलासफर के उपदेश को अनसुना कर वह पुन: झुका, बालू में फंसे एक और स्टारफिश को उठा कर वापस पानी में फेंका और बोला, “कम से कम इसके जीवन में फरक पडेगा. यह मौत से बच जायगा”.

कल हम एक नये साल में प्रवेश करेंगे. हम सारी दुनियां को नहीं बदल सकेंगे. लेकिन जिनको बदल सकते हैं उनको नवजीवन का दान देने के लिये ईश्वर आपकी मेरी मदद करें.

याद रखें, आपका एक वाक्य परीक्षा में संघर्षरत एक  विद्यार्थी, एक अनाथ बालकबालिका, एक निराश व्यक्ति, या प्रोत्साहन के अभाव में मुर्झाते एक व्यक्ति को इस साल नया जीवन दे सकता है. ऐसा जरूर करें.

 

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आपके गुरुजन दुष्ट प्रवृत्ति के होंगे !

मेरे आलेख कमजोरदिल इसे न पढें में मैं ने एक गुरू की कहानी बताई है जो लूट के अलावा कुछ नहीं जानता था. इस पर पा.ना. सुब्रमणियन  जी ने टिपियाया कि

लगता है कि आपको जितने भी गुरुजन मिले सभी बड़े दुश्ट प्रवृत्ति के रहे. केवल सहानुभूति जताई जा सकती है. कविता वैसे अच्छी बन पड़ी है अब इसके लिए प्रेरणा तो उसी दुश्ट गुरु से मिली. उनका आभार कर देश को आगे बढाये.

टिप्पणी के लिये आभार. यह सही है कि मुझे लाईब्रेरी की सुविधा नहीं मिली, एकाध बार अध्यापकों ने सजा दी, लेकिन इन अध्यापकों को दुष्ट की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है. मुझे अपने सारे जीवन में एक से एक समर्पित अध्यापक/अध्यापिकायें मिलते रहे हैं और कुल मिला कर एक अध्यापिका मिली जिसे दुष्ट कहा जा सकता है, एवं एक या दो अध्यापक मिले जिनको धंधेबाज कहा जा सकता है. उस अध्यापिका ने जरूर मेरे एवं मेरे दो साथियों के साथ बहुत बुराई/बेईमानी की थी लेकिन इससे हमारे भविष्य पर कोई असर न पडा.

मानव जीवन की एक विशेषता है कि जिस बात की ओर हम अधिक ध्यान देते हैं वह हमारे सोच एवं हमारे जीवन की दिशा को निर्धारित करता है. सौभाग्य से मैं ने अपने दुष्ट अध्यापको की ओर न तो अधिक ध्यान दिया, न उनके शोषण के बारे में फिकर की. इसके बदले आपना सारा ध्यान पढाई, पुस्तक-पठन, अपने शौक आदि को दिया. परिणाम यह हुआ कि एक शोषित विद्यार्थी के बदले एक पोषित विद्यार्थी के रूप में आगे बढने का मौका मिला.

मेरे अच्छे अध्यापकों में से एक थे दांडेकर सर. रिटायर्ड थे, लगभग 70 या अस्सी साल के थे, अनुशासन के मामले में बहुत कडे थे, और सठिया-सत्तरा चुके थे. लेकिन भौतिकी पर उनकी पकड और उसे समझाने का तरीका ऐसा था जैसे कोई जादूगर अपनी मास्मरिक शक्ति का प्रयोग कर रहा है. उन्होंने कक्षा में आरडी बॉटल, निकल्सन अपेरटस, और पता नहीं कौन कौन से उपकरण लाकर दिखाया और सिखाया. आज कितने भौतिकी के अध्यापक हैं जो यह करते हैं या जो इन उपकरणों के बारे में जानते है.

दांडेकर सर के कारण भौतिकी पर मेरी ऐसी पकड हो गई कि आज 55+ साल की उमर में भी आंख मीच कर भौतिकी पढा सकता हूँ. किसी भी किताब को देखने की जरूरत नहीं है. भौतिकी में एम एससी करते समय मुझे दो ऐसे अध्यपक (डा रामजी श्रीवास्तव एवं डा के जी बन्सीगिर) मिले जिनको “जादूगर” कहा जा सकता है. उनकी कक्षाओं में उच्चतर भौतिकी पढना ऐसा आसान लगता था जैसे कहानी सुन रहे हों.

आज मैं इन तीनों अध्यापकों को नमन करता हूँ !!

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मुक्तिदाता का हत्यारा !

WiseMen [हिन्द युग्म से साभार] दुनिया में लगभग हर कौम को कभी न कभी गुलामी देखनी पडी है. और लगभग हर कौम ने गुलामी करवाने वालों के विरुद्ध बगावत की है. ऐसी ही एक खुनी बगावत के लिए मशहूर है कौम यहूदियों की भी.

ईस्वी पूर्व 42 की बात है, धनी यहूदियों पर एक शक्तिशाली गैर-यहूदी का राज्य हो गया. हेरोद-महान नामक यह गैर-यहूदी राजा जानता था कि यहूदियों से लोहा लेना आसान नहीं है अत: उसने यहूदियों को हर तरह से प्रसन्न रखा. राजकाज ठीक से चलता रहा. जैसा कि होना था, लगभग तीन दशाब्दी राज्य करने के बाद उसके राज्य की नींव हिलने लगी लेकिन उसने अपनी शक्तिशाली गुप्तचर सेना की सहायता से हर शत्रु का उन्मूलन कर दिया और राज्य अपने हाथ से न जाने दिया.

उसकी क्रूरता के कारण यहूदी फिर दब कर रहने लगे. रहस्यमय राजनैतिक हत्यायें चलती रहीं और उसके परिवार के कई प्रतिद्वन्दी एक एक करके लुप्त होने लगे. हेरोद और उसकी गुप्तचर सेना के मारे हर कोई थर्राता था. अचानक एक दिन एक दुर्घटना हुई और हर यहूदी का कलेजा मुँह को आ गया …

उस दिन यहूदियों के देश के पूर्वी देशों से विद्वानों का एक बडा काफिला हेरोद-महान के दरबार पहुंचा और बताया कि एक नये राजा का जन्म हुआ है और आसमान में उदित एक नया तारा इसका चिन्ह है. यह चिन्ह देख हेरोद एकदम डर गया. वह लगभग 75 साल की उमर का हो गया था और अपने हाथ से राज्य के छिन जाने के डर के कारण वह अपने परिवार, मित्र, और राज्य में हर संभावित प्रतियोगी की रहस्य में हत्या करवा चुका था. वह यह सोच कर बेचैन हो गया कि अचानक अब कौन प्रतियोगी पैदा हो गया!

इस बीच सारे यहूदी बुरी तरह घबरा गये क्योंकि राजपरिवार में कोई बच्चा नहीं जन्मा था और वे समझ गये कि इस खबर के कारण किसी आम परिवार के बच्चे पर तलवार गिरने वाली है.

हेरोद भी समझ गया कि नक्षत्र उसके अपने परिवार की नहीं बल्कि जरूर किसी यहूदी राजपुत्र के जन्म की खबर लेकर आया है. इस कारण उसने यहूदियों के पंडितों को बुलाया जिन्होंने इस बात की पुष्टि की कि वे एक राजाधिराज के जन्म का इंतजार कर रहे हैं और उनका पदार्पण "बेतलेहेम" नामक यहूदी गांव में होगा. हेरोद बहुत चालाक था. उस ने विद्वानों को रहस्य में बुलाकर तारे के उदय होने की तारीख एवं उस बालक की संभावित उमर वगैरह की जानकारी लेकर विद्वानों को बेतलेहेम गांव की ओर भेज दिया. उनसे यह भी कहा कि जब वे बालक का पता लगा कर उसे दंडवत कर लें तो उसके ठिकाने की खबर बादशाह को भी दें जिससे वे भी जाकर बालक को माथा टेक आयें.

विद्वान लोग जैसे ही उस सुदूर गांव की ओर चल दिये कि अचानक वह तारा पुन: आकाश में दिखने लगा और इस बार उनके आगे आगे उस गांव की ओर चलने लगा जिस के बारे में यहूदियों के पंडितों ने इशारा किया था. बेतलेहेम पहुंच कर वह तारा उस घर के उपर ठहर गया जहां मुक्तिदाता ईसा अपने माँ-बाप के साथ थे. उनकी उमर दो साल होने ही वाली थी.

पूर्वी देशों से पधारे विद्वानों ने अपने ऊंटों के ऊंटों के काफिले से उतर कर ईसा के समक्ष माथा टेका और महाराजाधिराजों के लिये उपयुक्त कुंदन, लोहबान, और गंधरस भेंट किया. अनुमान है कि लोहबान और गंधरस हिन्दुस्तान से (हिमालय से) ले जाये गये थे. ईसा के मांबाप ने उनको बताया कि वे ईश्वरीय प्रेरणा से ईसा को माथा टेकने के लिये पधारे दूसरे झुंड हैं. पहला झुंड गडरियों का था जो एक आसमानी वाणी सुन कर लगभग दो साल पहले ईसा के जन्म के दिन उनके दर्शन के लिये आये थे.

विद्वान लोग वापसी की तैयारी कर रहे थे कि उनको ईशवाणी हुई के वे हेरोद बादशाह के पास वापस न जायें क्योंकि बादशाह का असल लक्ष्य ईसा का दर्शन नहीं बल्कि उनकी हत्या करवाना है. ईशवाणी के कारण वे बादशाह के पास जाने के बदले सीधे अपने देश चले गये. इस बीच ईसा के पितामाह को ईशवाणी हुई कि हेरोद बादशाह ईसा की हत्या की सोच रहे हैं. इस दिव्य वाणी को सुन वे लोग ईसा को लेकर चुप के से मिस्र देश चले गये.

विद्वानों की वापसी के इंतजार में बैठे बादशाह को आखिर उनके गुप्तचरों ने आकर खबर दी कि जीजान से कोशिश करने के बावजूद किसी अनजान कारण से वे न तो विद्वानों पर नजर रख सके, न ही बालक ईसा का घर ढूंढ सके. इसे सुन कर हेरोद के क्रोध का पारा ऐसा चढा कि उसने आज्ञा दी कि यहूदियों के दो साल से कम उमर के सारे बालकों को तलवार के घाट उतार दिया जाये. तारे के उदय होने का समय उसने विद्वानों से पूछ लिया था और उस आधार पर उसका अनुमान था कि ईसा उस समय दो साल से कम उमर के थे.

यहूदियों के सारे गांवों और नगरों में हाहाकार मच गया जब सैनिकों ने निर्दयता से एक एक घर पहुंच कर दो साल व उस से कम उमर के सारे बालकों को निर्दयता के साथ तलवार के घाट उतार दिया. इस तरह हेरोद बादशाह को बडा सकून मिला कि अब उनका राज्य उन से कोई भी छीन न सकेगा. लेकिन अचानक एक घटना हुई.

अचानक बादशाह को एक एक करके कई प्रकार के असाध्य रोगों ने घेर लिया. खाल फट कर रिसने लगा. वह मानसिक रूप से विक्षिप्त भी होने लगा. लोगों को ऐसा लगने लगा कि कोई पागल मानवनुमा जंगली जानवर अब उन पर राज्य कर रहा हो. मुश्किल से एक साल नहीं बीते कि उसके बदन में कीडे पड गये और अचानक एक दिन वह "महान" बादशाह न रहा.

ईसा को कोई हानि न हुई एवं तीस साल की उमर तक वे अपने मांबाप के साथ रहे. उनके पितामाह इमारती लकडी का कार्य करते थे जो कि उस जमाने में श्रमसाध्य कार्य होता था. ईसा ने हर तरह से इस कार्य में अपने परिवार का हाथ बटाया. लेकिन इस बीच धर्म और दर्शन में उनके अगाध ज्ञान को देख कर लोग चकित होने लगे थे क्योंकि ईसा किसी भी प्रकार के गुरुकुल में नहीं गये थे. उनकी मां इस बात को जानती थी, लेकिन बाकी अधिकतर लोग इस बात को समझ नहीं पाये थे कि जिस धर्म एवं दर्शन का स्रोत परमात्मा स्वयं हैं, उसे सीखने के लिये ईसा को किसी का शिष्य बनने की जरूरत नहीं थी.

तीस साल की उमर में वे सामूहिक सेवा के लिये निकल पडे और अगले साढे तीन साल में अपना लक्ष्य पा लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि यहूदियों ने उनको रहस्यमय तरीके से पकडवा दिया और सूली पर टंगवा कर उनकी हत्या करवा दी. लेकिन जैसा यहूदियों के शास्त्रों में कई बार भविष्यवाणी हुई थी, ईसा अपनी मृत्यु के तीन दिन बाद पुनर्जीवित हो गये और चालीस दिन तक जनसाधारण को दर्शन एवं प्रवचन देते रहे. यह देख उनके हत्यारों के बीच बडी बेचैनी और खलबली मच गई, लेकिन उन्होंने ईसा पर पुन: हाथ डालने की कोशिश न की. इन चालीस दिनों के पश्चात वे स्वार्गारोहण कर गये.

इस घटना के लगभग दो सहस्त्र साल के बाद की स्थिति जरा देखें! आज महान बादशाह हेरोद को कोई नहीं जानता. इस लेख को लिखने के पहले मुझे विश्वकोश में देखकर उनके बारे में जानकारी लेनी पडी. लेकिन आज ईसा का नाम हर कोई जानता है. यहाँ तक की जिन (लगभग) गुमनाम विद्वानों ने ईसा को माथा टेका, वे आज भी अमर हैं क्योंकि क्रिसमस या ईसाजयंती पर जो कार्ड भेजे जाते हैं उन में अकसर ऊंटों पर सफर करते इन विद्वानों का चित्र दर्शाया जाता है. इतना ही नहीं, ईसा के जन्म के दिन जिन गुमनाम गडरियों को ईसा के जन्म के बारे में खबर दी गई थी उनका चित्र भी अकसर क्रिसमस-कार्ड पर दर्शाया जाता है. यह ईसा की शिक्षा को बहुत ही सुंदर तरीके से प्रदर्शित करता है कि मनुष्य इस बात से महान नहीं बनता कि वह क्या है, बल्कि इस बात से महान बनता है ईश्वर के साथ उसका क्या नाता है. जो कोई दूसरों से उसका हक छीन कर बडा बनना चाहता है वह मटियामेट हो जाता है. यह भी ईसा की शिक्षा में हम देखते हैं.

इस हफ्ते सारी दुनियां में लोग ईसाजयंती मना रहे हैं. अपनी सुरक्षा के लिये जब एक व्यक्ति लोगों से उनका जीवन छीन रहा था तब ईसा ने लोगों को शाश्वत जीवन प्रदान के लिये अपना जीवन कुर्बान कर दिया था. यह है इस साल ईसाजयंती पर हम सब के लिये एक चिंतनीय संदेश.

कौन है यह सांता क्लॉज ??

image कल दिसम्बर 25 को बडी खुशी के साथ ईसाजयंती मनाई गई, लेकिन साथ साथ यह प्रश्न भी बहुत मनों में छोड गई कि यह सांता क्लॉज कौन है?

यह नाम लाल परिधान एवं लम्बी टोपी पहने, पीठ पर तोहफों का भारी थैला टांगे, एक बुजुर्ग के नाम के रूप में प्रयुक्त होता है. चूंकि यह पश्चिमी देशों से आई एक अवधारणा है इस कारण अधिकतर भारतीय इस नाम के पीछे छिपे संदेश को नहीं जानते हैं. कई लोग सांता क्लॉज को ही ईसा समझ लेते हैं.

दर असल यह “निकोलस” नामक व्यक्ति के नाम का एक परिवर्तित रूप है.  सैकडों साल पहले यूरोप में जन्मा यह बुजुर्ग ईसा का एक समर्पित अनुयाई था. वह ईसाजयंती के दिन किसी भी व्यक्ति को धन की कमी के कारण त्योहार मनाने से वंचित नहीं देखना चाहता था. इस कारण वह लाल रंग के विशेष वेशभूषा में (अपना चेहरा छुपा कर) गरीबों के घर जाकर खानपान की सामग्री एवं बच्चों के लिये खिलौने बांटा करता था.

निकोलस धनी नहीं था अत: उसके इस त्याग को देख कर लोग उसे “संत निकोलस” (सेंट निकोलस) नाम से संबोधित करने लगे. उसकी मृत्यु के बाद उस तरह की वेशभूषा में लोगों को जरूरी सामग्री बांटना कई लोगों की आदत बन गई. ये सब संत निकोलस कहलाये जाते थे. कालांतर में सेंट निकोलस नाम बदल बदल कर “सांता क्लाज” हो गया.

कुल मिला कर कहा जाये तो “सांता क्लाज” उसी बात को प्रदर्शित करता है जो ईसा का संदेश था कि हर किसी को अपने पडोसी से अपने समान प्रेम करना चाहिये.

नोट: कई बार ईसाजयंती (क्रिसमस) मनाते समय लोग अनजाने सांता क्लाज को एक जोकर के समान नाचते हुए दिखाते हैं. यह गलत है क्योंकि एक दानशाली महामानव को एक जोकर के रूप में प्रदर्शित करना दान की आत्मा का उपहास है.

 

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