Posted May 31st, 2009 by Shastri JC Philip
लगभग 15 साल पहले ग्वालियर से कोच्चि पहुंचा तो साल भर में औसत 170 दिन बरसात के लिये अपने आप को तय्यार करना आसान नहीं था. (जी हां, यहां साल में 200 से अधिक सूखे दिन नहीं मिल पाते हैं). पानी बरसना चालू हो जाता है तो कई बार 12 घंटे लगातार बरसता है.
हमारे घर के आसपास इतना पानी हो जाता है कि कई बार मछलियां और छोटे से कछुए हमारे आंगन में आ जाते हैं. प्रकृतिप्रेम के कारण इन सब चीजों में मुझे बहुत आनंद आता है. लेकिन एक चीज है जिस के लिये मैं तय्यार नहीं था, और वह है यहां की बिजली.
पश्चिमी मानसून के आरंभ में (जून), और पूर्वी मानसून (अक्टूबर के आसपास) के आरंभ में बिजली कडकती है तो ऐसा लगता है जैसे बम गिराये जा रहे हैं. बिजली गिरने से हर साल केरल में कई मौतें होती हैं. टेलिफोन एक्सचेंजों की तो खैर नहीं है और हर तरह की सुरक्षा के बावजूद हर साल सैकडों सर्किटकार्ड जल जाते हैं.
बरसात के समय और बिजली कडकने के दौरान टेलिफोन का उपयोग एकदम वर्जित होता है. इसके बावजूद कई लोग लापरवाही से दूरभाष का उपयोग करते हैं और बिजली गिरने के कारण बुरी तरह जल जाते है, और कई बार जिंदा नहीं बचते हैं. आज से 10 साल पहले हमारे सामने बिजली हमारे नारियल के पेड पर कडकी और मेरी आखों के सामने उसका ऊपरी हिस्सा जल गया. प्रकृति वाकई में शक्तिशाली है.
बिजली कुछ इलाकों में अधिक गिरती है और उन इलाकों में अधिक सावधानी रखी जाती है. ऐसे इलाकों में मकानों-ढांचों के ऊपर तडित-चालक अकसर दिख जाते हैं. सौभाग्य से दो साल पहले मेरे घर के पास बीएसएनएल का टावर आ गया है जिसकी उंचाई इतनी अधिक है कि अधिकतर बिजली सीधे उसके तडितचालक पर गिरती है. इसे देखना एक रोमांचक अनुभव होता है. हर बार लगता है, जान बची तो लाखों पाये!!
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Posted May 30th, 2009 by Shastri JC Philip
कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में मुसीबत नहीं बुलाना चाहता है. न ही कोई अकलमंद व्यक्ति मुसीबत को न्योता देता है. लेकिन चाहनेसोचने से कुछ नहीं होता, मुसीबत फिर भी हरेक के घर आ ही जाती है.
आप सुबह से रात मेहनत कर, अपनी सामर्थ से ऊचे विद्यालय की फीस देकर, अपनी जरूरतों को भूल कर, पुराने कपडे पहन कर अपने बच्चे को बडी मेहनत से पढाते हैं. महंगे से महंगा ट्यूशन दिलवाते हैं. जिंदगी में उसे वे सारी चीजें प्रदान करते हैं जिनकी कल्पना तक आप नहीं कर पाते थे. लेकिन एक दिन प्रिन्सिपाल आपको बुला कर खबर देता है कि आपका लाल पिछले तीन महीने से विद्यालय नहीं पहुँच रहा है और अब वह पुलीस स्टेशन पर है, या आपकी गुडिया शहर के एक आलीशान पब में नशे में धुत लुच्चाई करती हुई पुलीस के द्वारा पकडी गई है तो वाकई में आपके पैरों तले जमीन खिसक जाती है. इसके साथ साथ कई लोगों के जीवन में सब कुछ खतम हो जाता है.
जब सब कुछ सही चल रहा होता है तब हम सब बडे हिम्मती हो जाते हैं, लेकिन जब छत अचानक टूट पडती है तब हम सब एकदम कायर बन जाते हैं. असल में हिम्मत बांध कर स्थिति का सामना करने की जरूरत तब है जब बिना किसी पूर्वसूचना के सारी मुसीबतें एक साथ टूट पडती हैं. इसके बाद उस मुसीबत का क्या होगा यह आपके नजरिये पर निर्भर करता है.
यदि नजरिया सकारात्मक, आशावादी, हो तो आप बिगडती स्थिति को संभाल सकते हैं. नजरिया नकारात्मक, निराशावादी, हो तो जो बिगडा है उसका परिणाम उससे भी अधिक बुरा हो सकता है. यह न भूलें कि दुनियां कल खतम नहीं हो जायगी. बिगडे को पुन: बनाने के लिये, पहले से अच्छा बनाने के लिये, अभी आप को सैकडों अवसर मिल सकते हैं — यदि नजरिया सही हो तो!!
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Posted May 29th, 2009 by Shastri JC Philip
दिनेशराय द्विवेदी को हिन्दी चिट्ठाजगत में कौन नहीं पहचानता है!! उनके आलेख तो लोगों को ऐसे आकर्षित करते हैं जैसे शहद का प्रवाह हो रहा हो! उन्होंने जो अलख जगा रखी है उस से हर कोई कमोबेश लाभान्वित हुआ है.
“तीसरा खंबा” में उनके आलेख क्या आप अपने लिए एक काम करेंगे? को पढते ही मुझे लगा कि सारथी के वे पाठक जिन्होंने उनका कानून-संबंधी चिट्ठा “तीसरा खंबा” अभी तक नही देखा है वे एक बहुत उपयोगी ज्ञानस्रोत से वंचित हैं. हां, यदि कुछ हल्कीफुल्की शैली में गंभीर विषय पढना हो तो दिनेश जी के पिटारे में अनवरत नामक एक और बिलाग है जिस पर बडे ही तंतरभरे शब्दों में उन्होंने जनतंतर की कथा बांची है. (एक वेताल मुझे भी मिल जाता तो मेरी भी मेहनत खतम हो गई होती. अनुमान है कि अनवरत का सहाई-वेताल आजकल उनके सारे काम कर देता है और वे आराम फर्मा रहे हैं).
तीसरा खंभा चिट्ठे के द्वारा दिनेश जी भारत के न्यायकानूनों एवं न्यायालयों से संबंधित जरूरी जानकारियां देते हैं. इसके द्वारा वे लोगों को जागृत करने, उनको उनके अधिकार समझाने, और इन सब के फलस्वरूप भारतीय न्यायकानून व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिये एक और योगदान करने का कार्य करते हैं. दिनेश जी जटिल विषयों को ऐसी शैली में प्रस्तुत करते हैं कि पढने वाले को लगता है कि वह कोई कहानी सुन रहा हो. आलेख के खतम होने के बाद एकदम याद आता है कि यह एक कठिन विषय की एकदम सरल प्रस्तुति है.
किसी भी देश की जनता को सशक्त बनाने के लिये यह जरूरी है कि उनको उनके हक बताये जायें और उनको सोचने के लिये प्रेरित किया जाये. दिनेश जी ये दोनों कार्य अपने चिट्ठे के द्वारा कर रहे हैं, और उसके साथ साथ पाठकों की शंकाओं का समाधान कर कई लोगों की मदद कर रहे हैं. इस निस्वार्थ देश-सेवा के लिये समर्पित इस सच्चे भारतपुत्र को मेरा अनुमोदन और अभिवादन!!
उनके चिट्ठे को आज ही बुकमार्क करना न भूले. प्रस्तुत है तीसरा खंबा !!
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Posted May 28th, 2009 by Shastri JC Philip
लगभग सभी चिट्ठाप्रेमी कुछ चिट्ठों को नियमित रूप से पढते हैं. मेरे लिये राज भाटिया जी के चिट्ठे जरूरी चिट्ठों में से एक है क्योंकि उन के लिये मेरे दिल में जगह एकदम विशेष है.
कल सारथी चिट्ठे पर उनकी टिप्पणी आई तो मैं बहुत उत्साहित हो गया, लेकिन दौडा दौडा उनके चिट्ठों पर गया तो पता चला कि चिट्ठों पर वही पुराने आलेख पडे हैं, और इसका मतलब है कि वे वापस नहीं पहुँचे हैं.
पिछले कुछ महीनों में टिप्पणियों एवं पत्रव्यवहार दारा भाटिया जी से काफी सारे विषयों पर बडी बौद्धिक चर्चा हुई. हर बार कुछ न कुछ सीखने को मिला. एक बार तो एक प्रश्न जिसका जवाब हफ्तों से नहीं मिल रहा था वह उनके एक पत्र में मिल गया. हर चिट्ठाकार को प्रोत्साहित करने के लिये, दिशा देने के लिये, परामर्श देने के लिये, यहां तक कि आवश्यक हास्य के लिये भी उनका समर्पण तारीफे काबिल है.
भाटिया जी का हर रोम भारत-प्रेम से ओतप्रोत है एवं जर्मनी में हर क्षण वे देश की याद और देश की उन्नति की कामना के साथ बिताते हैं. भारती आदर्श एवं भारतीय मूल्यों को वे कस कर पकडे हुए हैं एवं हर मौके पर वे इन चीजों का समर्थन और अनुमोदन करते हैं. लगभग हर गंभीर चिट्ठे पर उनकी विश्लेषणात्मक टिप्पणी हर दिन दिख जाती है.
मुझे शिकायत है चिट्ठे पर उन्होंने बूझो तो जानें के द्वारा चिट्ठाकरों को एक साथ बांध दिया था, कि अचानक उनको हिन्दुस्तान आना पडा. तब से उनकी चिट्ठाकारी बंद है. उम्मीद है कि वे जल्दी ही वापस पहुंच कर अपनी कलम चलाने लगेंगे.
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