समलैंगिकता एवं सामाजिक नजरिया!

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चित्र: समलैंगिक अमरीकी इंडियन लोगों को श्वेतवर्ग के लोगो कुत्तों से नुचवाते हुए!

चूंकि समलैंगिक लोग हमेशा ही विषमलिंगी लोगों की तुलना में नगण्य रहे हैं अत: उनको कभी भी सामाजिक मान्यता नहीं मिली थी. इतना ही नहीं, अधिकतर धर्मों में समलैंगिक संबंधों पर प्रतिबंध था एवं इसे नैतिक पतन का लक्षण माना जाता था. इस कारण पकडे जाने पर समलैंगिकों को हमेशा कठोर सजा दी जाती थी.

लेकिन जिस तरह शराब और वेश्यावृत्ति को बुरा माने जाने के बावजूद, एवं इन बातों को सामाजिक मान्यता न मिलने के बावजूद, ये समाज में बने रहे उसी तरह समलिंगी लोग भी हजारों साल से विभिन्न रूपों में समाज में बने रहे हैं. इतना ही नहीं, बुरा समझे जाने के बावजूद  जब तक शराबखाने एवं वेश्यावृत्ति के अड्डे समाज से हट कर अपने निर्दिष्ट स्थान पर रहे और जब तक वे आम जनता के लिये सरदर्द न बने तब तक समाज उनको सहन करता रहा, उसी तरह तमाम तरह के समलैंगिक समूहों को भी बुरा समझने के बावजूद सारी दुनियां में समाज झेलता आया है.

हिंदी में मलद्वार से संबंधित जो गालियां है (गाँ.. मारना, गाँ..पन आदि) वे पुरुष मैथुन की ओर संकेत करते हैं और यह इत्तिला भी देते हैं कि शराबियों एवं वेश्याओं के समान ये लोग भी समाज में यदा कदा पाये जाते हैं. यह इस बात की भी इत्तिला है कि जिस तरह अन्य गालियों मे (बहन, मां, बेटी) कही गई बातें समाज को स्वीकार्य नहीं है, उसी तरह समलैंगिक मैथुन को भी समाज सामान्य मैथुन के रूप में स्वीकार नहीं करता है.

प्राचीन भारत से जो मिथुन मूर्तियां बची हैं उनमे भी यदा कदा  समलैंगिक संबंधो की ओर इशारा किया गया है, लेकिन उनको सामाजिक मान्यता नहीं दी गई है. यही हिसाब लगभग सब राष्टों के इतिहास में दिखता है:  जब तक समलैंगिक लोग समाज के रास्ते आडे नहीं आये, तब तक समाज उनको बर्दाश्त करता रहा. लेकिन जिस तरह शराबखोरी एवं वेश्यावृत्ति को सामाजिक मान्यता नहीं मिली उसी तरह समलैगिकता को भी सामाजिक रूप से मान्य एक कृत्य नहीं समझा गया. [क्रमश:]

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समलैंगिकता: यह क्या बला है?

image समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाले कानूनों को जब से न्यायपालिका ने अवैध घोषित किया है तब से इस विषय पर काफी चर्चा हो चुकी है. लेकिन विषय अभी भी काफी बचा है, अत: अनुसंधान पर आधारित एक लेखमाला की पहली कडी है यह आलेख.

चित्र 1: अमरीकी समलिंगियों का सामूहिक प्रदर्शन, 2009

विपरीत लिंगियों के बीच यौनाकर्षण एक सामान्य बात है एवं इसके बारे में हर कोई जानता है. लेकिन सम लिंग के लोगों के बीच (पुरुष से पुरुष एवं स्त्री से स्त्री) का आकर्षण बहुत विरल होता है. इस तरह के आकर्षण को समलैंगिक आकर्षण एवं जो लोग इसके वशीभूत होकर समलिंगी लोगों के साथ यौनसंबंध बनाते हैं उनको समलैंगिक कहा जाता है.

अंग्रेजी में पुरुष समलैंगिकों को होमोसेक्सुअल कहा जाता था लेकिन आजकल वे अपने आपको गे (Gay) या “अत्यंत खुश” नामक से संबोधित करते हैं. यह समलैंगिकता को जनप्रिय बनाने का एक प्रयत्न भी है. स्त्री समलैंगिकों को लेस्बियन कहा जाता है जिसके पीछे एक इतिहास है जो हम आगे के एक आलेख में देखेंगे.

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चित्र 2: दो मिस्री समलिंगियों का प्रेम-व्यवहार, अनुमानत: 3000 साल पुराना चित्र

विवाह एवं उससे संबंधित सामान्य पुरुष-स्त्री मैथुन को हर संस्कृति, धर्म, एवं काल में मान्यता दी गई है. इसे सामान्य माना जाता है एवं इससे इतर प्रकार के यौन संबंधों को असामान्य/बुरा माना गया है. लेकिन इसके बावजूद इस तरह की यौन प्रक्रियायें होती रही हैं. हां इनकी संख्या हमेशा नगण्य रही है एवं इस तरह की यौन प्रक्रियायें हमेशा अपवाद रही हैं.

बीसवीं शताब्दी में जो तमाम प्रकार के सामाजिक परिवर्तन हुए हैं उनके कारण इनकी संख्या काफी बढी है एवं इन लोगों ने संघर्ष करके काफी आजादी/सुरक्षा पा ली है. इस लेखन परंपरा में इन बातों को विस्तार से देखेंगे.

 

Article Bank | Net Income | About IndiaIndian Coins | Physics Made Simple | India Pic 1 by domasan Pic 2 Khnumhotep and Niankhkhnum. Illustration from photograph © 1999 Greg Reeder

समलैंगिकता पर एक लेखन परंपरा!

JCP_jul09_50 कल सुबह से सारथी पर प्रस्तुत करूंगा एक लेखन परंपरा, “समलैंगिकता: यह क्या बला है?”

इसमें इस विषय के एतिहासिक, वैज्ञानिक, कानूनी,  एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला जायगा. यदि आप आंख मीच कर सडक पर चलने में यकीन रखते हैं तो यह लेखन परंपरा आप के लिये नहीं है. यदि आप हर विषय पर तर्कसंकग आलेख पढना पसंद करते हैं तो यह आलेख आप जैसे व्यक्ति के लिये है — शास्त्री

नजरिया और जीवहत्या !!

image अभी दस मिनिट पहले मेरे एक विद्यार्थी ने मुझे बिहार से दूरभाष लगाया, सिर्फ यह जानने के लिये कि वह काव्यरचना करता रहे या नहीं.

वह एक मानसिक रोगी था. मेरे कहने पर उसे देश के सबसे अच्छे मनोवैज्ञानिकों को दिखाया गया. उनकी दवादारू से उसे काफी फायदा हुआ. आज वह अध्यापक है, सामान्य जीवन जी रहा है, दवा नियमित रूप से ले रहा है.  यारदोस्त एवं सामाजिक संबंध कम है, अत: अपना खाली समय लेखन में बिताता है. कल का एक मनोरोगी, जो आज बिना किसी पर भार बने  अपना काम देख रहा है.

कई सालों से वह हफ्तेमहीने एक कविता मुझे भेज देता है, और मैं उसे सुधार कर, चार प्रोत्साहन के शब्द जोड कर, उसे वापस भेज देता हूँ. महीने में मेरे दस मिनिट का यत्न एक व्यक्ति को जीवनदान दे सकता है तो वह दस मिनिट जीवन की एक महानतम उप्लब्धि है. जीवनदान जीवन छीनने से महान कार्य है.

लेकिन अब उसके परिवार वाले उसके पीछे पडे हैं कि वह इस “बेकार” आदत को छोड दे. यह क्यों बेकार आदत है, इससे बेहतर आदत क्या हो सकती है, या इसे छोडने पर जो खाली समय (और खाली दिमांग) होगा उसका क्या होगा, इस मामले में उनके पास कोई सुझाव नहीं है. बस इस “बेकार” की आदत को त्यागना है. खैर इस विद्यार्थी को मैं ने सुझा दिया है कि जो कविता का मतलब न जानें उनकी  न सुना करे.

जो लोग अपने लिये कोई अर्थपूर्ण कार्य करके अपने मानसिक संतुलन  को बनाये रखते हैं उनको कई बार हम अपनी मूर्खता भरे एवं ठस नजरिये के कारण मार डालते हैं. मानसिक हत्या!

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