Posted August 31st, 2009 by Shastri JC Philip
आज हर ओर सरकारी अस्पतालों की हालत ऐसी खस्ता है कि लोग उनके नाम पर नाकभौं सिकोडते हैं. यही हाल सरकारी विद्यालयों का है.
लेकिन हिन्दुस्तान जैसे भीमकाय देश में जहां हर तरह की संपन्नता आ जाये तो भी करोडों लोग गरीब रहेंगे, यहां सरकारी अस्पताल, विद्यालय, एवं खाद्यान्न वितरण (राशन) का होना जरूरी है. बदलाव उनके रखरखाव एवं गुणवता में आना चाहिये और उनका उन्मूल कतई नहीं होना चाहिये.
पिछले 15 सालों में मुझे कई निजी अस्पतालों एवं विद्यालयों को पास से देखने का मौका मिला है. इनकी गुणवत्ता काफी अधिक है, लेकिन समाज के 5% से अधिक लोग इनकी सेवा नहीं ले सकते. दिन प्रति दिन इन में से कई का रूख व्यापारिक अधिक और सेवा न के बराबर होता जा रहा है.
मेरे बेटे की जूनियर डाक्टर से कल बात हुई तो उसने हाल ही का अनुभव बताया क सर्पदंश पीडित एक छोटी से बच्ची को किस तरह से अपने छोटे से अस्पताल से एक बडे अस्पताल में वह ले गई लेकिन डाक्टरों की लापरवाही के कारण वह गुजर गई. जरूरत इस बात की है कि सरकारी अस्पतालों कों हर तरह की सुविधा से भर दिया जाये, लेकिन उन में इतना कडा अनुशासन हो कि वे निजी अस्पतालों के समान दक्षता से कार्य करें. इसके बिना गरीब को कभी भी स्वास्थ्य एवं जीवन संबंधी सुविधा नहीं मिल पायगी.
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Posted August 19th, 2009 by Shastri JC Philip
मेरे कल के आलेख बर्बादी के लिये एक और रास्ता ?? पर मैं ने बताया था कि दसवी की बोर्ड की परीक्षा समाप्त करके उसे निजी परीक्षा बनाने की साजिश चल रही है. इस मामले में दो मित्रों की टिप्पणी हम सब को सोचने के लिये मजबूर करती है:
(अनुनाद सिंह) परीक्षा को ही हटा देना किसी तरह से तर्कसंगत नहीं है। क्या हम बिना कड़ी परीक्षा के सही लोगों को रोजगार दे पायेंगे। यदि नहीं तो परीक्षा से छुटकारा कैसे मिल सकता है। वस्तुत: परीक्षा-प्रणाली में परिवर्तन होना चाहिये; उसमें नये-नये प्रयोग किये जाने चाहिये । इन सब प्रयोगों का लक्ष्य होना चाहिये कि वास्तविक मेधा की पहचान हो; रट्टा मारने की प्रवृत्ति पर लगाम लगे; बच्चे रचनाशील (क्रिएटिव) और उद्यमी बने; बच्चे सूचना की जानकारी रखना, उसे सम्यक रूप से सजाना, और उसका सार्थक उपयोग करके मानवमात्र का विकास करना सीखें।
(सुरेश चिपलूनकर) अनुनाद से सहमत, पहले दसवीं में आते-आते बच्चा दो बोर्ड परीक्षा देकर अच्छी तरह पक चुका होता था और आराम से पास होता था… अब दसवीं तक कचरा आता जाता है, शिक्षकों पर भी पास करने का दबाव होता है… पास करते जाते हैं। दसवीं तक आते-आते “ढ” से ढक्कन बच्चे भी वहाँ तक पहुँच जाते हैं…। अब पास करने के लिये एक नई ट्रिक खोजी गई है वह है पूरे प्रश्नपत्र में 30% प्रश्न वस्तुनिष्ठ आयेंगे (ये तो सबको पता ही है कि ऐसे वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में नकलपट्टी करना/करवाना कितना आसान होता है) ऐसे में आगे भविष्य में वे कैसे प्रतियोगिता का सामना करेंगे… लेकिन सरकारों के आँकड़ों में संख्या अवश्य बढ़ जायेगी कि “फ़लाँ प्रदेश के इतने प्रतिशत बच्चे 10 वीं से आगे तक पढ़े…”, भले ही वे कितने भी गधे हों…
शालेय शिक्षण की इसके अलावा भी कई समस्यायें है. उदाहरण के लिये, अंग्रेजी जरूरी है लेकिन अंग्रेजी माध्यम के अधिकतर विद्यालय जहां एक हाथ से अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा देते हैं वहीं एक दक्ष ओझा के समान वे दूसरे हाथ से बच्चों के मन से भारतीयता को “झाड” कर दूर कर रहे हैं.
उदाहरण के लिये, अधिकतर अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में कंठलंगोट पहना अनिवार्य होता है. बात बहुत छोटी सी है लेकिन इस विदेशी प्रतीक को शैशव काल से बच्चों के शरीर और मनों पर थोपने के द्वारा वे एक दूरगामी कार्य कर रहे हैं — बच्चों के मन में भारतीय वस्त्र को हेय और अंग्रेज के वस्त्र को उन्नत समझने की प्रवृत्ति पैदा की जा रही है. आप खुद सोचिये कि आज युवा पीढी गले में इस अंग्रेजी लंगोट को पहनने वालों को को परिष्कृत समझती है जब कि धोती पहने वालों को अपढ और असभ्य समझती है.
यदि आप को लगता है कि अंग्रेजी माध्यम विद्यालय सिर्फ देश का भला कर रहे हैं तो जरा वहां से दसवीं पास बच्चों से देशप्रेम संबंधित कुछ प्रश्न पूछ कर देखें. या जरा जांच कर देखें कि वे किसी भारतीय भाषा में दक्ष हैं क्या — आपकी झक्की खुल जायगी. बात स्पष्ट है, इन विध्यालयों की संस्कृति का भारतीयकरण होना बहुत जरूरी है.
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Posted August 18th, 2009 by Shastri JC Philip
आज किसी ने मुझे बताया कि कम से कम कुछ राज्यों में, और शायद पूरे देश में, जल्दी ही दसवी बोर्ड की परीक्षा हटा कर उसे निजी परीक्षा में बदल दिया जायगा. इसके साथ सिर्फ 12वीं की परीक्षा बोर्ड के नियंत्रण में रह जायगी.
आज शालेय शिक्षा को निजी क्षेत्र ने एक मेगा-धंधा और लूट का क्षेत्र बना लिया है. गरीब आदमी बच्चों को निजी विद्यालयों में नहीं भेज पाता है और उनको सरकारी विद्यालयों में भेजने को मजबूर है. लेकिन वहां किस तरह की पढाई होती है यह हम सब जानते हैं.
इसके बावजूद बोर्ड की परीक्षा के डर के मारे अधिकतर सरकारी अध्यापक कम से कम दसवीं के पाठ्यक्रम को कुछ सावधानी से पढाते थे और विद्यार्थीयों का थोडाबहुत कल्याण हो जाता था. लेकिन यदि दसवी को बोर्ड से हटा कर निजी परीक्षा कर दिया जायगा तो सरकारी विद्यालयों में दसवीं में जो कुछ पढाया जाता है वह भी खतम हो जायगा.
सरकारी स्कूलों का ह्रास निजी स्कूलों को लूट का अवसर देता है. इतना ही नहीं समाज के एक बहुत बडे तबके को अशिक्षित रहना पडेगा क्योंकि वे निजी विद्यालयों में बच्चों को भेज नहीं सकते और बोर्ड की परीक्षा के हट जाने से सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों की बची खुची जिम्मेदारी भी खतम हो जायगी.
मैं ने पांचवीं, आठवीं, दसवीं और ग्यारहवीं की बोर्ड की परीक्षा दी थी. वह एक सुखद अवसर था, जीवन भर के लिए स्थायी दस्तावेज भी हो गये. लेकिन हम खुद अपने हाथों अपने देश की शिक्षाव्यवस्था का विनाश करने पर तुले हुए हैं.
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Posted August 16th, 2009 by Shastri JC Philip
पिछले हफ्ते मैं युवा परिवारों के लिये आयोजित एक कांफेरेंस में गया हुआ था. वहां कई सामाजिक समस्याओं पर मैं ने लेक्चर दिये, और लोगों ने उन विषयों को बहुत पसंद किया.
आखिरी दिन चर्चा के अवसर पर एक महिला ने कहा, “शास्त्री जी, आप ने कई मामलों में निषेध का अनुमोदन किया है. लेकिन जब हम किसी भी व्यक्ति को किसी कार्य के लिये मना करते हैं तो वह और सक्रियता से उसे करता है. अत: मेरा सुझाव है कि किसी भी व्यक्ति को कभी किसी बात के लिये मना न किया जाये”.
उस महिला का कथन सुनने में एकदम अच्छा और सही लगता है, लेकिन एकदम गलत है. इसे समझाने के लिये मैं ने कुछ प्रश्न पूछे:
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मान लीजिये कि आपकी बिटिया लुच्चे किस्म के लडकों के साथ घूमतीफिरती है. क्या आप उसे ऐसा करने से मना करेंगी?
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मान लीजिये कि वह उन लौंडों के प्रति यौनाकर्षण महसूस करती है और वे उसे किसी भी दिन फुसला सकते हैं. क्या आप उसे मना करेंगी?
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यह भी मान लें कि उन में से कुछ लोग नशीली पदार्थों के आदी हैं. क्या आप उन के सेवन से अपनी पुत्री को मना करेंगी?
उस महिला का चेहरा देखने लायक था. मैं ने प्रश्न जारी रखे:
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मान लीजिये कि आप के पति किसी गैर स्त्री के साथ बडे ही आपत्तिजनक तरीके से घूमतेफिरते हैं. आप उनको टोकेंगी या नहीं?
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मान लीजिये कि वे उसके लिये काफी उपहार वगेरह खरीदने लगे हैं. आप टोकाटाकी करेंगी या नहीं?
काफी सोचने के बाद उन्होने जवाब दिया, “मेरे पतिबच्चों की बात अलग है. मैं तो अन्य लोगों की बात कर रही थी”. मामला साफ था: “जब सारी दुनियां मर रही हो तो उसे मत टोको क्योंकि अपना क्या जाता है”.
सब ने मन ही मन कहा “धन्य हैं मेडम आप” !!
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