केरल में मुस्लिम-ईसाई संघर्ष??

मेरे पिछले आलेख केरल में धार्मिक संघर्ष !! में मैं ने इशारा किया था कि धार्मिक सहिष्णुता के मामले में केरल एक आदर्श प्रदेश है. यहां के हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम अपने अपने धर्मो, उसूलों, और कर्मकांड के मामले में बहुत कट्टर  हैं. लेकिन इस कट्टरता ने उनको दंगाई बनाने के बदले आपस में सहिष्णु बनाया है. इस कारण मेरे मित्र सुरेश चिपलूनकर ने  केरल में जिस संभावित मुस्लिम-ईसाई संघर्ष का भय प्रगट किया है वह एक अतिशयोक्ति है.

केरल के हिन्दू, मुस्लिम, एवं ईसाई हरेक अपने धर्मकर्म के मामले में अन्य प्रदेशों के स्वधर्मी लोगों से अधिक कट्टर है. लेकिन इसके साथ ही साथ केरल के हिन्दू, मुस्लिम, एवं ईसाई अन्य प्रदेशों के लोगों से अधिक सहिष्णू हैं. इसका एक कारण है साक्षरता एवं सामाजिक विषमता की कमी.

जिन प्रदेशों में लोग  अपढ होते हैं वहां धर्म एवं संप्रदाय के नाम पर लोग एकदम भडक जाते हैं. लेकिन जैसे जैसे लोग साक्षर होने लगते हैं, वैसे वैसे वे समझने लगते हैं कि लठ्ठ एवं तलवार से कुछ होने वाला नहीं है. वे हिंसाप्रिय होने के बदले शांतिप्रिय होने लगते हैं. ऐसे में सांप्रदायिक शक्तियां लोगों को आसानी से भडका नहीं पाती हैं.

केरल के ईसाई और हिन्दू लगभग शत प्रतिशत साक्षर हैं. मुस्लिम समाज भी द्रुत गति से इसी दिशा में जा रहा है. अन्य प्रदेशों की तुलना में केरल में  इनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है. बडे बडे व्यापारिक प्रतिष्ठन इनके चलाये चलते हैं. फलस्वरूप आपको बुर्का पहने कार चलाती महिलायें और सुपरमार्केटों में ट्रालियां धकेलती बुर्कापरस्त स्त्रियां हर जगह दिख जायेंगी. मेडिकल, इंजिनियरिंग एवं मेनेजमेंट कालेजों में बुर्कानुमा कपडे पहनी लडकियों को भारी मात्रा में देख सकेंगे. इस संपन्नता एवं  साक्षरता ने केरल के मुस्लिम समाज को सांप्रदायिक शक्तियों की हिंसात्मक नीति से बचा कर रखा है.

कुल मिला कर कहा जाये तो सुरेश की यह भविष्यवाणी कि “हिन्दुस्तान का पहला मुस्लिम-ईसाई संघर्ष केरल से आरंभ होगा” गलत आंकडों एवं केरल की सामाजिक स्थिति के बारे में उनके अज्ञान का फल है. इस तरह की गलत भविष्यवाणियों के कारण लोगों के मन में अनावश्यक शंकायें पैदा होती है. इस आलेख का लक्ष्य लोगों को ऐसी गलतफमी से मुक्त करवाना है.  सुरेश जैसे देशप्रेमी के लिए इतना इशारा पर्याप्त है.

केरल में धार्मिक संघर्ष !!

मेरे चिट्ठामित्र सुरेश चिपलूनकर ने अपने आलेख भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala में केरल में भयानक संघर्ष का भय जताया है. मैं टिप्पणी द्वारा उस आलेख की गलती बताने लगा तो मुझे लगा कि एक छोटी सी टिप्पणी से काम नहीं चलेगा बल्कि एकदो पूरा आलेख ही चाहिये. अत: सुरेश को दिये गये अपने वचन के अनुसार मेरा आलेख प्रस्तुत है!!

सुरेश केरल में जिस भयानक संघर्ष का जो अनुमान लगा रहे  हैं वह दोतीन गलतफहमियों पर आधारित है. पहली गलतफहमी यह है कि केरल में सिर्फ 10% हिन्दू हैं और यह भी कि वे 10% लोग स्वाभिमान के साथ कह नहीं पाते के वे हिन्दू हैं. ये दोनों बातें गलत है. केरल में लगभग 60% जनता हिन्दू हैं, और केरल का औसत हिन्दू काफी स्वाभिमानी होता  है.

उनकी दूसरी गलतफमी यह है कि केरल का धार्मिक वातावरण उत्तर के वैमनस्य भरे सांप्रदायिक वातावरण के समान है. दर असल केरल के धार्मिक वातावरण और उत्तर के वातावारण में जमीन आसमान का फरक है क्योंकि केरल हिन्दुस्तान के सबसे अधिक सहिष्णू प्रदेशों में से एक है. सहअस्तित्व लोगों की नस नस में है. इसके कुछ उदाहरण दूँ:

दक्षिण केरल में सैकडों साल तक कई हिन्दू मंदिरों के “भंडारी” अनिवार्यतया ईसाई लोग होते थी. (इसका एतिहासिक कारण शायद पी एन सुब्रमनियन जी या बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण जी  बता सकें क्योंकि केरल के इतिहास पर उनकी पकड मेरी पकड से अधिक है). इसका सबसे अच्छा उदाहरण है मेरे परदादा जी.  हमारा परिवार 2000 साल से ईसाई हैं और मेरे परदादा जी घोर ईसाई थे लेकिन एक हिन्दू मंदिर के भंडारी भी थे. मंदिर के उपयोग में लाई जाने वाली कई वस्तुएं, खासकर तेल, पहले उन से स्पर्श करवाया जाता था और फिर उसे उपयोग में लाया जाता था. उनकी अगली पीढी से हम सब के नाम के साथ इस मंदिर का नाम भी जुड गया और मेरे नाम में जो “सी” आपको दिखता है वह उस मंदिर के नाम पर पडा है और पूरा नाम है “चेरुवेल्लेत्तु”.

केरल की धार्मिक सहिष्णुता का सबसे अर्वाचीन उदाहरण जरा ले लें. मैं त्रिक्काक्करा मंदिर से 1500 फीट दूर रहता हूँ. वामन अवतार को समर्पित इस मंदिर में एक प्लेटफार्म है जहां कहा जाता है कि वामन अवतार ने महाबली को पाताल भेजा था. केरलवालों का महाउत्सव ओणम इसी अवतार और इसी मंदिर से जुडा हुआ है और हर ओणम के समय यहां हर दिन लाखों रुपया खर्च करके भंडारा किया जाता है. इस कार्य के लिये ओणम से दो  हफ्ते पहले दान एकत्रित किया जाता है. मंदिर के आसापास के निवासी (जिन में ईसाई और मुस्लिम परिवार बहुत अधिक हैं)  उत्साह से दान देते हैं और दानराशि काफी बडी होती है.

दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से पहली राशि के लिये मंदिर के अधिकारी  लोग मेरे घर आते हैं. उनका कहना है कि यदि पहला दान मेरे हाथ से मंदिर पहुँचे तो उस साल काफी दान मिल जाता है. केरल की धार्मिक स्नेह और सहिष्णुता की एक मिसाल है यह.

आप शायद कहेंगे के केरल के हिन्दू और केरल के मंदिर शायद ढीलेढाले होंगे. बात बिल्कुल उल्टी है. केरल के अधिकतर  मंदिर अभी भी हिन्दू धर्म और कर्मकांड को उसके मूल रूप में बनाये हुए हैं. किसी भी बात में ढीलढाल नहीं है. कडाई इतनी है कि अभी भी (जी हां, 21वीं शताब्दी में भी) गैर हिन्दू इन मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. हमारे घर के बगल के इस मंदिर के लिये उत्सव के समय हम रात को रास्ते की रो़शनी के लिये मुफ्त बिजली देते हैं, ओणम के समय पहला दान मुझ जैसे गैर हिन्दू का होता है, मंदिर आनेजाने वालों के साथ भोर से रात तक दुआ सलाम होती है,  घरों में आपस में  आनाजाना और खानापीना चलता है, लेकिन इन सब बातों के बावजूद मेरे  घर से 1500 फुट दूर इस मंदिर में मेरा प्रवेश वर्जित है. एक ओर धार्मिक कट्टरता है, लेकिन दूसरी ओर सहिष्णुता है, जिसके कारण वे मेरा सहयोग खुले तौर पर वे मांगते हैं और उनको मिलता है.

मैं क्या कहना चाहता हूँ — यह कि हिन्दू धर्म को उसके शुद्ध स्वरूप में बनाये रखने के लिये केरल के हिन्दूओं ने बहुत अधिक योगदान दिया है. लेकिन अन्य प्रदेशों में हिन्दुओं और मुस्लीमों/ईसाईयों में जो खटपट दिखती है वह यहां नगण्य है. यहँ धर्म धर्म है, संबंध संबंध है, और वे एक दूसरे को प्रभावित नहीं करते हैं.  

केरल के प्रसिद्ध अय्यप्पन तीर्थ के लिये जाते समय भक्तगण पहले एक मुस्लिम अवतार को प्रणाम करते हैं और फिर अय्यप्पन के दर्शन को जाते हैं. ऐसे प्रदेश के लिये सुरेश जैसे देशप्रेमी  का आलेख अतिशयोक्ति से भरा हुआ है. उन्हें अभी कुछ और घूमफिर कर देशदर्शन की जरूरत है.  शायद कभी वे केरल पधारेंगे और मेरे साथ रहेंगे तो इस बात को समझ जायेंगे कि यहां हिन्दू, ईसाई, मुल्लिम सभी धर्म के मामले में कट्टर हैं, लेकिन आपसी संबंधों के मामले में उदार और सहिष्णु हैं. अत: उन्होंने केरल में जिस सांप्रदायिक घमासान की संभावना बताई है उसमे थोडी सी अतिशयोक्ति आ गई है. [क्रमश:]

उन्मुक्त, सुरेश चिपलूनकर: अनुमोदन तथा कुछ और बातें!!

Suresh

सुरेश चिपलूनकर के चिट्ठे को हर कोई जानता है. इनके हिन्दूवादी विचारों से कई चिट्ठाकार इनका विरोध करते हैं, लेकिन मैं इस चिट्ठे के स्नेहियों में से एक हूँ क्योंकि मैं भी सुरेश के समान ही राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिये समर्पित हूँ. पिछले दिनों उन्होंने घोषणा की कि उनके सारे लेख क्रियेटिव कामन्स में दिये जा रहे हैं.

क्रियेटिव कामन्स का मतलब है कि बिना किसी अतिरिक्त  अनुमति के उनके लेखों को कोई भी चिट्ठाकार अपने चिट्ठे पर छाप सकता है. सिर्फ उनके चिट्ठे पर दी शर्तों का पालन करना पर्याप्त होगा. मैं उनके इस कदम का अनुमोदन एवं हार्दिक स्वागत करता हूँ. उम्मीद है कि कई चिट्ठाकार इसी तरह अपने चिट्ठे की सामग्री उदारता से उपलब्ध करवायेंगे.

इस मामले में मैं उन्मुक्त जी का नाम हरेक को याद दिलाना चाहता हूँ. उनके चिट्ठे की हर सामग्री किसी के द्वारा भी पुन: छापी जा सकती है और उनकी शर्तें एकदम उदार हैं. उनका तर्क यह है कि अपनी रचना को इस तरह से खुले में छोड देने से “विचार आगे बढते हैं”. मैं उनकी इस सोच का कायल हूँ, एवं हिन्दी चिट्ठाकारों के समक्ष इस तरह का एक नमूना और आदर्श रखने के लिये उनका भी अनुमोदन करता हूँ.  उनसे एवं मेरे बेटे से प्रेरणा लेकर “सारथी” के मेरे सारे आलेख क्रियेटिव कामन्स में रखे गये हैं. रवि रतलामी भी प्रशंसा के पात्र हैं जिनका चिट्ठा इसी तरह क्रियेटिव कामन्स में है.

इस बीच सुरेश के निम्न आलेख भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala को देखा तो लगा कि यह आलेख एवं इसमें दिये गये निष्कर्ष गलत आंकडों पर आधारित है. उन से मैं ने वादा किया है कि चित्र का दूसरा पहलू सारथी पर पेश करूंगा. यह आलेख सारथी पर कल आयगा. इस बीच उपर दी गई कडी को चटका कर आप यह आलेख और सुरेश का चिट्ठा दोनों जरा देख लें.

चिट्ठाकारों को नंगा करने की साजिश!!

कुछ हफ्तों से चिट्ठे पढ नहीं पाया था (मेरे पिताजी के लिये घर-अस्पताल-घर चक्कर के कारण). लेकिन आज तसल्ली से बैठ कर चिट्ठों पर नजर डालने लगा तो महावीर बी सेमलानी का एक आलेख नजर आया जिसमें उन्होंने चिट्ठाजगत में पिछले दिनों जो कलुषित वातावरण पैदा हुआ था उस पर दु:ख प्रगट किया है. मैं महावीर के आलेख का अनुमोदन करना चाहता हूँ.

इसके साथ हम को एक बात मन में रखनी होगी कि हम में से हरेक कुछ हद तक इस अराजकत्व के लिये दोषी हैं. जब हम सडक पर मैला पडा देखते हैं तो बच कर निकल जाते हैं. लेकिन चिट्ठाजगत में कोई कुछ अनावश्यक लिखता है तो उसके समर्थन के लिये या टिप्पणी करने के लिये बहुतेरे लोग पहुंच जाते  हैं. पक्ष और विपक्ष हो जाता है और लेखक की इच्छा पूरी हो जाती है कि उसका चिट्ठा किसी तरह हिट हो जाये.

पांच हजार चिट्ठों में पचास से अधिक नहीं है जो गंदगी फैला रहे हैं. उन में भी मुश्किल से पांच है जो लिखनाकरना कुछ नहीं चाहते (क्योंकि उनके पास देने के लिय कुछ नहीं है) लेकिन वे चिट्ठाजगत की नस नस पहचानते हैं. एक दक्ष ओझा के समान वे किसी एक “ग्राहक” को पकड कर चुपके से उसकी कोई नस दबा देते हैं. जैसे ही वह आह करता है वैसे ही ओझा को “काम” मिल जाता है.

यदि चिट्ठाकार मित्र इन पांच लोगों को पहचान लें तो चिट्ठाजगत में शांति हो सकती है. इसके लिये जरा निम्न प्रश्नों का उत्तर ढूँढे:

  1. वे चिट्ठाकार कौन से हैं जिन के कारण पिछले 3 साल सब से अधिक तूतूमैंमैं हुई है?
  2. वे चिट्ठाकार कौन हैं जिन्होंने पिछले 3 सालों में कम से कम 10 वरिष्ठ एवं आदरणीय चिट्ठाकारों पर आरोपप्रत्यारोप लगाया है या उनके साथ तूतूमैंमैं की है?
  3. वे चिट्ठाकार कौन से हैं जिनका अधिकतर समय, और जिनके अधिकतर लेख, दूसरों की गलती और मीनमेख निकालने में जाता है.

सडक पर पडे मैले को दूर से ही पहचान लें तो पैर गंदा नहीं होगा. उसी प्रकार चिट्ठाजगत में जो लोग अशांति और वैमनस्य पैदा करते हैं उन पांच छ: जमूरों को हम सब पहचान लें तो तो अशांति की स्थिति इतनी अधिक नहीं होगी. इन लोगों को पहचान कर इनके चिट्ठों को पढना बंद करें क्योंकि गंदी चीज को घर लाना मूर्खता है. इन चिट्ठों के अनुयाइयों के चिट्ठों को भी पढना बंद करें क्योंकि जो गंदगी का अनुयाई है वह शुचित्व का विरोधी है.

आईये चिट्ठाकारों को नंगा करने की कोशिश करने वाले चिट्ठाकारों को पहचान कर उनसे दूर रहें. जो पहले से कपडे उतार चुका है उसको उपदेश की नहीं बहिष्कार की जरूरत है.