ईसा जयंती: शुभ कामनायें!!

JChrist

 

ईसा-जयंती के इस पावन पर्व पर
आप सब को ईश्वर की असीम आशिष प्राप्त हो!

 

राजमहलों में जन्म लेने के बदले जिस तरह से
प्रभु ईसा ने
एक गरीब के घर में
और वह भी अपने मांबाप की यात्रा के

दौरान एक गौशाले में जन्म लिया,  उस घटना
के द्वारा प्रभु हम सब को
यह समझने की
बुद्धि प्रदान करें कि ईश्वर आम आदमी

के दिलों में वास करना चाहते हैं.

 

प्रभु करे कि नया साल आप सब के जीवन

और मनों में ईश-निवास का एक साल हो!

सस्नेह — शास्त्री

ज्ञान जी का प्रस्ताव और धन!

मेरे कल के आलेख प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! पर टिपियाते समय ज्ञानदत्त जी ने एक आश्चर्यजनक बात कह दी जो इस प्रकार है:

मनुष्य समान बन नहीं सकता। पूंजी को आप समान बांट भी दें तो वह कालान्तर में पुन: वही असमान बंट जायेगी।  [ज्ञानदत्त पाण्डेय]

इसे पढते ही मुझे एक गणना/परीक्षण याद आया जो आज से कुछ साल पहले किया गया था. इसे करने वालों ने सबसे पहले विश्व-समाज के हर घटक के लोगों का पैसा खर्चने एवं निवेश करने की आदतों का हिसाब तय्यार किया. इसके बाद संगणक की मदद से यह गणना की कि यदि विश्व के हर व्यक्ति से उसका सारा धन ले लिये जाये, और हरेक को (बच्चे, बढे, बूढे आदि को) यदि एक करोड रुपया प्रति व्यक्ति दे दिया जाता है तो क्या होगा.  एक ऐसा समाज जहां आर्थिक विषमता नहीं है और जहां हरेक को पैसे के उपयोग के लिये पूरी आजादी दे दी जाती है.

पहले महीने हर कोई बेहद खुश दिखता है,  खैरात में मिला 1 करोड रुपया उसे जीवन की हर जरूरत की आपूर्ति के लिये मददगार सिद्ध होता है. लेकिन दूसरे महीने से एक अंतर दिखने लगता है: अधिकतर लोग सिर्फ खर्च और आनंद में लिप्त रहते हैं जबकि लगभग 20% लोग खर्च के साथ साथ निवेश भी करते जाते हैं. छठे महीने के अंत तक समाज पूरी तरह आर्थिक विषमता से भर जाता है. ताज्जुब:  ठीक 365 वें दिन लोगों का आर्थिक स्तर वही हो जाता है जो एक करोड रुपये मिलने के पहले था.

लगभग 20% लोग धनी रह जाते है एवं 80% पुन: कंगाल हो जाते है. जो पहले करोडपति था वह आज करोडपति रह जाता है. जो कंगाल था वह एक करोड प्रति व्यक्ति पाने के बावजूद सडक पर भीख मांगने निकल पडता है. कुल मिला कर कहा जाये तो दोष पूंजी के वितरण का नहीं है बल्कि उपलब्ध पूंजी के विनिमय का है. अपवादों को छोड दें तो किसी भी समाज में कोई भी व्यक्ति आर्थिक उन्नति कर सकता है, लेकिन उसके लिये जरूरत अतिविशाल पूँजी की नहीं, बल्कि उसकी अपनी सामान्य पूँजी के साथ साथ उसके विनिमय व निवेश के प्रति असामान्य समर्पण की जरूरत है.

अत: ऊपर उद्धरित ज्ञान जी का कथन एकदम सही है. पूंजी से अधिक उपलब्ध पूँजी का सही उपयोग महत्वपूर्ण है. ज्ञान जी का अगला कथन भी इस कारण जरा देख लें:

अगर मुझे पूंजी की इज्जत करनी नहीं आती तो मैं जितना भी जोर लगाऊं –- टाटा बिरला का क्लोन बन नहीं सकता।

Net Income | About IndiaIndian Coins | Physics Made Simple | India

प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी!

मेरे कल के आलेख  एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!! पर दिनेश जी ने टिपियाया:

यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा। (दिनेशराय द्विवेदी)

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है: जहां भी किसी चीज को अर्जित की सुविधा दी जाती है, वहां कहीं भी हर व्यक्ति एक समान अर्जित नहीं कर पाता. अत: एक ही अध्यापक के पढाये विद्यार्थी जिस तरह पोजिशन से लेकर फेल होने तक के अंक अर्जित करते हैं, उसी तरह संपत्ति के अर्जित करने की स्थिति है. धनी एवं गरीब का अंतर हमेशा रहेगा. लेकिन यदि गरीब को अपने स्तर पर पर्याप्त  रोटी, कपडा और मकान की सुविधा मिलती है तो उस समाज को बुरा नहीं कहा जा सकता है. आर्थिक स्थिति तब बुरी हो जाती है जब गरीब के पास अपनी मौलिक जरूरतों की आपूर्ति के लिये कोई रास्ता या साधन न बचे, जैसा आज करोडों भारतीयों के साथ हो रहा है.

प्राचीन भारत में धनीगरीब का अंतर जरूर था, लेकिन गरीब से गरीब व्यक्ति के पास अपनी मूलभूत जरूरतों की आपूर्ति के लिये जमीन, खेती, जंगल से प्राप्त सामग्री आदि उपलब्ध थे. जलाऊ लकडी की कोई कमी नहीं थी. बाजार या हाट में वह अन्न, उपज, या जंगल-जमीन से प्राप्त की हुई चीजों के विनिमय के द्वारा अपनी जरूरत की चीजें प्राप्त कर लेता था.

“दास” या “गुलाम” शब्द एकदम से अभागों का चित्र हमारे समक्ष लाता है. लेकिन यह न भूलें कि शोषित एवं बंधुआ दास या गुलाम एक अर्वाचीन प्रक्रिया है, प्राचीन नहीं. प्राचीन समाज में दास और गुलाम को पर्याप्त सुरक्षा मिल जाती थी. (अपवादों को छोडें क्योंकि अपवाद हमेशा संख्या में न्यून होते हैं).

प्राचीन केरल का उदाहरण लें तो यहां उपजाऊ भूमि इतनी प्रचुर थी कि हर किसी को अपने जरूरत की पूर्ति अवसर मिल जाता था. इतना ही नहीं, काली मिर्च, इलायची, अदरख, दालचीनी आदि की खेती आम थी और इनको विदेशी व्यापारी लोग हाथों हाथ खरीद ले जाते थे. काली मिर्च की खेती इतना आसान है कि कोई भी व्यक्ति अपने घरजमीन में बीसतीस बेल लगा सकता है, और आजीवन फल लेता रह सकता है. इससे इतनी आय होती थी कि कालीमिर्च को उस जमाने में काला-सोना कहा जाता था.

केरल में अरब, पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश लोग सिर्फ इस काले-सोने के लिये आये थे और आपस में मारामारी करते थे. केरल की जनता के लिये जबकि कालीमिर्च एक आम चीज है, एवं खेती बहुत आसान है. 1300 ईस्वी से पहले सामंतवादी व्यवस्था लगभग न के बराबर थी.

कुल मिला कर कहा जाये तो हिन्दुस्तान वाकई में सोने की चिडिया थी जिसे लूटने के लिये दुनियां भर के लोग लालाईत रहते थे. दिनेश जी ने सही कहा है:

यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता।

एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!!

image

चित्र: केरल के राजाओं का सोने का एक सिक्का

मेरे पिछले आलेख सोने की चिडिया भारत: सच या गप? में मैं ने प्राचीन भारतीय सिक्कों के आधार पर यह प्रस्ताव रखा था कि  भारत एक समृद्ध देश था जिस कारण लगभग 3000 साल तक यह विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करता रहा. मैं ने यह भी कहा था कि लोग इसे लगभग 1200 साल लूटते रहे जो इस बात को याद दिलाता है कि हिन्दुस्तान कितना समृद्ध था.

मेरे कई मित्रों ने समृद्धि की बात को स्वीकार किया लेकिन उसके साथ यह बात जोड दिया कि प्राचीन भारत में  थोडे से लोग समृद्ध थे, बाकी सब कंगाल थे. इस प्रस्ताव ने मुझे इतना झकझोर दिया कि पिछले दिनों सारा समय भारत के इतिहास को पढने में लगाया.

चूँकि मेरा मूल आलेख केरल के सोने के सिक्कों के बारे में था, अत: मैं ने केरल के इतिहास को काफी विस्तार से पढा. मैं सारथी के सब मित्रों का आभारी हूँ कि जिस काम को मैं कुछ महीनों से टालता आ रहा था उसे तुरंत करने के लिये उनका प्रोत्साहन मिला.

प्राचीन भारत के इतिहास को वस्तुनिष्ठ तरीके से पढें तो एकदम यह स्पष्ट हो जाता है यह देश धनधान्य से, खेतीबाडी से, खनिज पदार्थों द्वारा, एवं नदीनालों की संपदा (सोना, बहुमूल्य पत्थर आदि) से भरपूर था. धनीगरीब का अंतर जरूर था, लेकिन गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी खेतीबाडी और पेशेवर काम इतना रहता था कि आज जो “विषमता” दिखती है इतनी विषमता नहीं थी.

दर असल देश के गरीब किसी जमाने में आज के समान गरीब नहीं थे. उनको खेतीबाडी, पेशेवर धंधों, एवं जगल-खनिज-नदीनालों द्वारा रोजीरोटी की उपलब्धि इतनी अधिक थी कि गरीब व्यक्ति के पास परिवार को पालनेपोसने के लिये लगभग वह सब कुछ था जिसकी जरूरत थी. जनसंख्या कम थी, रोजीरोटी के संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे.

आज जो आर्थिक विषमता दिखती है इसका मूल कारण विदेशी लुटेरों के द्वारा पिछले 300 सालों में  की गई लूट एवं उसके कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियां हैं. भारत वाकई में सोने की चिडिया थी, एवं आज जो आर्थिक विषमता हम देखते हैं यह एक प्राचीन नहीं बल्कि अर्वाचीन स्थिति है जिसका मूल कारण यूरोपियन साम्राज्यवादियों द्वारा की गई लूटखसोट एवं सामाजिक परिवर्तन है. इसे हम अगले आलेख में विस्तार से देखेंगे.

Net Income | About IndiaIndian Coins | Physics Made Simple | India