गूगल विज्ञापन और हिंदी चिट्ठे

आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार करता था.

दोस्तों, आदमी का लालच कई बार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को खत्म कर देती है. गूगल के साथ मामला यही है. किसी ज़माने में गूगल हिन्दीभाषी चिट्ठों को विज्ञापन के लिए स्वीकार करता था, लेकिन चिट्ठाकार भाई लोग जम कर अपने चिट्ठों पर दिख रहे विज्ञापनों परा चटका लगा कर पैसा सूतने लगे. वे भूल गए कि गूगल के हाथ बड़े लम्बे हैं.

आप जिस संगणक से अपने गूगल विज्ञापन की आय को जांचते हैं उसी आई पी नम्बर से जब क्लिक जाने लगे तो गूगल ने पहचान लिया कि आप खुदा ही दुकानदार और खुद ही ग्राहक का काम कर रहे हैं. अंधा बांटे रेवड़ी, आपन आपन  को देता जाए अंधे के लिए सही है लेकिन गूगल के लिए नहीं.

चूँकि कुछ  हिंदी चिट्ठे जम कर ऐसा कर रहे थे, उसकी सजा सबा को मिल रही है. गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है.

दुर्घटना: कौन जिम्मेदार है?

Motorcycle

मेरे घर के पास ही है राजमार्ग 47, जिस पर हर महीने मैं 1000 से 3000 किलोमीटर की सफारी करता हूँ. अधिकतर अपनी कार में, लेकिन कई बार गैरों की गाडी में. एक औसत यात्रा 100 से 400 किलोमीटर की होती है. 4-लेन के इस राजमार्ग पर यात्रा सामान्यतया सुखद होती है, लेकिन एक चीज मन को दुखी करती है और वह है दुर्घटनायें.

एक बार की यात्रा में औसतन एक दुर्घटना नजर आ जाती है. यहां अधिकतर गाडियां 80 किमी रफ्तार से चलती हैं अत: दुर्घटनाओं में मौत बहुत अधिक होती है, और छोटी गाडियों के सिर्फ अंजरपंजर बच पाते हैं. अनुसंधानों से पता चलता है  कि इन में 80% से 90% मानुषिक लापरवाही और घमंड के कारण जबर्दस्ती होती हैं, और सिर्फ 10% से कम दुर्घटनायें आकस्मिक होती हैं.

मद्यापन करके गाडी चलाना, आधी अधूरी नींद के बाद गाडी चलाना, बिन सही ब्रेक के गाडी चलाना, दूसरे से सडक पर प्रतियोगिता करना, सडक किनाने की चेतावनियों (खतरनाक घाटी, तंग रास्ता, बिन-फाटक रेलवे क्रासिंग, खतरनाक/अंधा मोड) की उपेक्षा आदि के कारण अधिकतर दुर्घटनायें होती हैं.

अफसोस यह है कि एक सेकेंड के दसवें भाग में जो दुर्घटना होती है उसका दर्द, विकलांगपन, बच्चों का, अनाथपन, स्त्रियों का वैधव्य आजीवन दर्द देता है.  आश्रितों की  जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं. बुद्धिमान बच्चे पढाई छोड मजूरी के लिये निकल पडने पर विवश हो जाते हैं. उससे भी अफसोस की बात है है कि जरा सी सावधानी से इन आजीवन के दुखों से बचा जा सकता था.

 

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डॉ अरविंद — बड़े बड़ों की बातें!

मेरे कल के आलेख मसिजीवी का एक प्रश्न!  पर डॉ अरविंद मिश्रा ने टिपियाया:

बड़े बड़ों की बातें!

तीन शब्द ही सही, लेकिन इस टिप्पणी को पढ कर बढा अच्छा लगा. अच्छा इसलिये कि डॉ अरविंद बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हैं एवं सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं. वे अधिकतर वैज्ञानिक विषयों पर लिखते हैं, और इस कारण कई बार कई चिट्ठाकार उनका विरोध कर चुके हैं.

image इसका कारण है पेरोट थ्योरी जिसके बारे में ज्ञान जी अपने चिट्ठे पर लिख चुके हैं. इस सिद्धांत को वैज्ञानिक आलेखों के पाठकों पर लगाया जाये तो निष्कर्ष निकलता है कि इनके पाठकों में से कम से कम पांच प्रतिशत ऐसे लोगो होंगे जिनके लिये उनके आलेख की विषयवस्तु समझ के परे है. लेकिन पढने वाले को कुछ शब्द समझ में आ जाते हैं अत: उसको लगता है कि उसे सब कुछ समझ आ रहा है, जबकि उसके मन में अर्थ का अनर्थ हो रहा होता है.

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है नितंब के शरीरशास्त्रीय/समाजशास्त्रीय विकासवाद के बारे में डॉ अरविद की शुद्ध वैज्ञानिक लेखनमाला. मैं विकासवाद का घोर विरोधी हूँ, लेकिन इसके बावजूद इस लेखनमाला में दिखे मौलिक तर्क एवं चिंतन का कायल हो गया था. लेकिन इस बीच कुछ पाठक जिनको उस आलेख के “शास्त्र” के बदले सिर्फ नितंब ही दिख पाया उन्होंने डॉक्टर के आलेख के विरुद्ध युद्ध छेड दिया. यह तो अच्छा हुआ कि उनके वैज्ञानिक मन ने उनको पकड रोके रखा, वरना एक अच्छा चिट्ठाकार असमय चिट्ठा-सन्यास ले लेता.

इस हफ्ते चिट्ठाजगत में वापस आया तो दिखा कि उनके विरुद्ध पुन: जबर्दस्ती का एक टंटा खडा कर दिया गया था जिसका उन्होंने डट कर विरोध किया.  वैज्ञानिकों को बधाई. सरवाईवल ऑफ द फिटेस्ट के असर के कारण उन में से कुछ लोग हम सब से काफी हिम्मती एवं मजबूत हैं.

लिखते रहें डॉ अरविंद! आपके पाठक बहुत हैं. मैं तो आप के उन सारे आलेखों को पढने जा रहा हूँ जो पिछले 4 महीनों में मुझ से छूट गये थे!

 

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मसिजीवी का एक प्रश्न!

001F मेरे पिछले आलेख पाबला जी से हुआ अपराध बहुत बडा? पर काफी सार्थक टिप्पणियां आई हैं जिनके लिये मैं अपने चिट्ठामित्रों का आभारी हूँ. इन में से एक टिप्पणी पर जरूर कुछ कहना चाहूँगा जो मेरे मित्र मसिजीवी से मिली है.

(मसिजीवी) चर्चा के लिए अनंत विकल्‍प थे फिर चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ? उत्‍तर मुश्किल नहीं है उनकी ओर से लोगों ने बार बार स्‍पष्‍ट किया है कि वे इस मंच से नाराज हैं हमारी छोटी सी समझ इसे ही बैडफेथ कहती है।

(शास्त्री) मैं नहीं जानता कि यह सही है क्या. हो सकता है कि वे नाराज हों. यह भी हो सकता है कि इस नाराजगी के कारण उन्होंने चिट्ठाचर्चा.कॉम अपने नाम रजिस्टर करवा लिया हो. तर्क के लिये ये दोनों बातें सही माल ली जायें तो भी उसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने एक चिट्ठा-मित्र को कठघरे में खडा कर दें. उलाहना देना एक बात है, उससे आगे जाना अलग बात है. कारण यह है कि यदि कोई किसी बात का विरोध करना चाहता है तो अपराध  के अलावा हर तरह के तरीके का उपयोग उसके लिये जायज है. कल को कोई मुझ से नाराज हो जाये तो वह मेरे नाम से बचे 199 डोमेन खरीद सकता है. (एक www.ShastriPhilip.Com  मैं ने पंजीकृत कर रखा है).   जनतंत्र में यह उसका अधिकार है.  अत: अपने जनतांत्रिक अधिकार के उपयोग के लिये एक चिट्ठामित्र को उलाहना से अधिक न दें तो अच्छा लगेगा.

(मसिजीवी) जब हमने कहा था कि आप अकेले ये सब नहीं कर सकते जरूर कोई ओर बात है तो ये ज्‍यादा आहत करने वाली बात थी पर आपने लीगल नोटिस की धमकी नहीं भेजी थी अपनी बात रखी थी।

(शास्त्री) कानूनी नोटिस देने की कह कर पाबला जी भी जरूरत से कुछ अधिक आगे निकल गये हैं और मैं उसका अनुमोदन नहीं करता. पाबला जी को इतना आगे जाने की क्या जरूरत थी इसका मुझे अनुमान नहीं है और मेरा अनुरोध है कि कोई भी साथी जब तक उसके रोजी पर चोट न लगे तब तक कभी भी कानूनी कार्यवाही आदि की  दिशा में न सोचे. इस छोटे परिवार में हम एक साथ मिलबैठ कर बिन कोर्टकचहरी के अपनी समस्या सुलझा सकते हैं.

चिट्ठाजगत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो निष्पक्ष तरीके से चिट्ठा-मित्रों के बीच की लगभग हर समस्या को सुलझा सकते  हैं. अत: यदि आपसी घमासान के बदले समस्याओं को मध्यस्थता एवं परामर्श द्वारा हल कर किया जाये तो परिवार की भावना को ठेस नहीं पहुंचेगी और आपसी प्रेम और भाईचारा बना रहेगा.

अंत में एक बात हरेक कनिष्ठ एवं वरिष्ठ चिट्ठकारों को याद दिलाना चाहता हूँ:  इस घटना में पहल कहां से हुई, तीर किस दिशा में  बढा, फिर क्या हुआ आदि मेरा विषय नहीं है.  विषय यह है कि   हम में से हरेक व्यक्ति संयंम से काम ले तो यह खटपट की नौबत नहीं आयगी. लेकिन एक व्यक्ति संयंम खो दे तो फिर चेन-रिएक्शन शुरू हो जाता. बिना कारण सज्जन  और विद्वान लोग मर मिटते हैं.  यह सब देख कर चिट्ठाजगत के असली विलेन मजे ले रहे हैं क्योंकि वे यहां चिट्ठाकारी के लिये नहीं बल्कि लट्ठम-लट्ठ के लिये आये हैं.  यदि हम सब यह प्रण कर लें के कम से कम अगले छ: महीने हम अन्य चिट्ठाकारों के सहीगलत व्यवहार पर टिप्पणी करने के पहले कम से कम एकाध बार उन से सीधे पूछपाछ कर आगे बढें तो हम सब के लिये अच्छा होगा.

 

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