Posted in भारत

सरकार हमारी है या हम सरकार के खरीदे हैं??

जनतंत्र का मतलब यह है कि सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाई गई है.  लेकिन पूर्ण जनतंत्र तभी स्थापित हो सकता है जब किसी भी जनतंत्र के सारे  नियमकानून उस देश की जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाये गये हों. विडंबना यह है कि १९४७ में तकनीकी तौर पर हम आजाद हो गये,…

Continue Reading...
Posted in भारत

राजनीति और आम जीवन!

जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेशनीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से पिताजी की सीमित आय से…

Continue Reading...
Posted in भारत

प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी!

मेरे कल के आलेख  एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!! पर दिनेश जी ने टिपियाया: यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों…

Continue Reading...
Posted in भारत

एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!!

चित्र: केरल के राजाओं का सोने का एक सिक्का मेरे पिछले आलेख सोने की चिडिया भारत: सच या गप? में मैं ने प्राचीन भारतीय सिक्कों के आधार पर यह प्रस्ताव रखा था कि  भारत एक समृद्ध देश था जिस कारण लगभग 3000 साल तक यह विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करता रहा. मैं ने यह भी कहा था कि लोग इसे…

Continue Reading...
Posted in भारत

सोने की चिडिया भारत: सच या गप?

बचपन में बडे उत्साह से हम लोग गाते थे “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती”. हमारे अध्यापक लोग बताते थे कि किसी जमाने में हिन्दुस्तान को  “सोने की चिडिया” कहा जाता था. अंग्रेजों के राज (और सफल ब्रेनवाशिंग) के साथ साथ राष्ट्र के प्रति  हमारा गर्व ऐसा गायब हुआ कि भारत के प्राचीन वैभव और संपन्नता के…

Continue Reading...
Posted in परिचय भारत

पुलीस स्टेशन का एक और चक्कर!!

केरल में अकसर पुलीस से मुलाकात होती रहती है: कभी हाईवे पर (जहां सघन जांच होती है) या पुलीस स्टेशन पर. आज पिताजी को खाना देकर अस्पताल से वापस आ रहा था कि पांच पुलीस वालों ने हाथ दिखाया. मैं समझ गया कि बेचारे बिन वाहन परेशान हो रहे हैं . वे लोग सुबह से सडक किनारे भीड-नियंत्रण कर रहे…

Continue Reading...
Posted in भारत

इधर कूँआ तो उधर खाई!!

प्रजातंत्र अपने आप में एक अच्छी चीज है लेकिन जहां विभिन्न राजनीतिक पार्टियां सीटों के लिये लडती हैं तो उनको तुष्टीकरण की गंदी नीति अपनानी पडती है. दर असल नायक को एक जज के समान होना चाहिये जो दूध का दूध और पानी का पानी कर दे, लेकिन जो वोटों के आधार पर उन्नत स्थान पर पहुंचता है वह ऐसा…

Continue Reading...
Posted in भारत

क्या सारा हिन्दुस्तान एक संडास है!!

कुछ साल पहले की बात है एक विदेशी पर्यटक से पूछा गया कि हिन्दुस्तान के बारे में आप की क्या राय है. उन्होंने तुरंत जवाब दिया कि हिन्दुस्तान एक बडा संडास है. इस कथन का कारण पूछा तो उनका कहना था कि उनकी सारी भारत-यात्रा रलगाडी से हुई थी और रेलगाडी में सुबह खिडकी खोल कर बैठना एक मुश्किल कार्य…

Continue Reading...
Posted in भारत

ऐसा भी होता है!!

(एक मिनी पोस्ट): केरल का महात्मा गांधी विश्वविद्यालय हर बात में राजनैतिक दखल के कारण हिन्दुस्तान के सबसे ढीले ढाले विश्वविद्यालयों में से एक है. कल (जून 6) उन्होंने अखबार में निम्न खबर दी: “एम एससी की परीक्षा जून 10 को होगी. सामान्य परीक्षा फारम 10 जून तक, और लेट फीस के साथ 11 जून तक जमा की जा सकती…

Continue Reading...
Posted in भारत

घूरे के लिये सोने का त्याग!!

आज भारत के कम से कम 40 करोड लोग बडे आराम से हिन्दी पढलिख लेते हैं. इन लोगों के लिये कम से कम 1000 गैर सरकारी  सामाजिक पत्रिकायें/अखबार हिन्दी में छपती हैं.  कम से कम पच्चीसतीस अश्लील पत्रिकायें भी हिन्दी में छपती हैं. लेकिन निजी क्षेत्र में एक भी विज्ञान-पत्रिका मेरी जानकारी में नहीं है. 1960 आदि में एक निजी…

Continue Reading...