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बदलाव क्यों नहीं आयगा!!

मेरे कल के आलेख सरकारी तंत्र, आम आदमी!! में मैं ने उन बातों की ओर इशारा किया था जहां बदलाव आ सकता है. जरूरत अपने अधिकारों को समझने, उनको मांगने, एवं जरूरत पडने पर संगठित रूप से मांगने की है. इच्छा हो तो किसी भी चट्टान को तोडा जा सकता है, बशर्ते सही समय पर सही औजार का प्रयोग किया…

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सरकारी तंत्र, आम आदमी!!

परसों दिनेश जी का आलेख रेल बोर्ड के गलत निर्णयों से रेल संपत्ति का नुकसान और यात्रियों को परेशानी पढा तो एक दम से बहुत सारी बातें याद आ गईं. 1950 और 60 आदि का अपना बचपन याद आ गया जब सरकारी कर्मचारी तो बादशाह हुआ करते थे. दफ्तर का चपरासी भी लाट साहब से कम नहीं होता था और…

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हस्तलिखित संपदा: आपके घर में??

मैं जब भी गोरे अंग्रेजों की करतूतों के बारे में लिखता हूँ तो चिट्ठाजगत के कई भूरेकाले अंग्रेजों के तनबदन में आग लग जाती है.  सच कहा जाये तो अंग्रेज सिर्फ इस देश को लूटने के लिये आये थे, और उनसे हम को जो भी भलाई मिली है वह संयोग मात्र है. यदि उन्होंने सडकें बनवाईं तो वह अपने धंधे…

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केप्टेन गिल एवं मेरी क्रांतिकारी सोच्!!

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज के एक केप्टेन थे जी एम सिंह गिल. मैं दूसरी कक्षा में पढता था जब उन से मेरी पहली मुलाकात हुई. वे ग्वालियर के हमारे गिर्जाघर के मुखियों में से एक थे, और इस कारण हफ्ते में कम से कम दो बार सत्संग में वे बोलते थे. उस भारी भरकम व्यक्ति की…

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सब ओर उत्तरभारतीय हैं!!

यह इस देश की विडम्बना है कि आजादी के 60 साल होते होते तमाम प्रकार के लोग हिन्दुस्तान को भाषा, जातीयता, या अन्य आधार पर एक बार और बांटने की कोशिश कर रहे हैं.  हम यह भूल जाते हैं कि एक जयचंद के कारण कितने ही प्रथ्वीराज चौहानों की हार हो चुकी है. देश पहले मुगलों के हाथ और फिर…

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हमे कुत्ता तक कहा!

मेरे पिछले आलेख हर देशभक्त को दुखी होना चाहिये!! में मैं ने याद दिलाया था कि किस तरह यूरोप के साम्राज्यवादी अपने कुत्तों को “टीपू” कहते थे क्योंकि टीपू सुल्तान ने उनके छक्के छुडा दिये थे. हिन्दुस्तानियों का यह अपमान अभी भी चल रहा है, बाल्टियाना दिवस (वेलेंटाईन डे) और पाश्चात्य नववर्ष के अर्धरात्रि आयोजनों में जो लुचपन होता है…

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हर देशभक्त को दुखी होना चाहिये!!

सारथी के वरिष्ठ लेखकों को याद होगा कि मेरे उनके बचपन में कुत्तों के लिये सबसे आम नाम हुआ करता था “टीपू”. सवाल है कि ऐसा कैसे हुआ? टीपू सुल्तान ने जब अंग्रेजों के छक्के छुडा दिये थे, तब टीपू को काबू में लाने के लिये अंग्रेजों ने हर तरह के नीच तंत्र का सहारा लिया. कई हिन्दुस्तानी शासकों को…

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अंग्रेजी में हिन्दी, एक जुगुप्साजनक अनुभव!!

  आज जब अनुनाद जी के चिट्ठे पर यूनेस्को का भाषाओं पर खतरे का मानचित्र आलेख दिखा तो एकदम कई बातें याद आ गईं. पहली बात है जब मैं ने नागालेंड और आसपास के प्रदेशों की एक पुस्तक देखी. भारतीय भाषा की यह पुस्तक अंग्रेजी लिपि में थी. इस सदमें से उभर नहीं पाया था कि उस नागा ने उसे…

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मोलभाव या विश्वास ?

सारथी के सारे पाठक जानते हैं कि आटोरिक्शा वाले पैसे के लिये कैसे मोलभाव करते हैं. यदि आपने पहले से भाडा तय नहीं किया तो आपकी मुसीबत है. पांच रुपये के भाडे की जगह पच्चीस की मांग आम बात  है. पिछले दिनों मैं अपने बेटे डा आनंद के साथ कोल्हापुर के कुछ दर्शनीय स्थल देखने गया.  आटो वाले से राजमहल…

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क्या यह हिन्दुस्तान में संभव है?

सन 1990 में मैं वजीफे पर एडवांस्ड-काऊंसलिंग की ट्रेनिंग के लिये अमरीका गया था. तब हर मौके पर खूब घूमाफिरा. एक चीज वहां बहुत अच्छी लगी – हाईवे के किनारे जगह जगह “विश्राम-क्षेत्र”  मिल जाते हैं जहां आपको पानी, लघु शंका, चाय, पेट्रोल आदि कि सुविधा मिल जाती है. चित्र 1: आने जाने के लिये बेलगांव-पूणे राजमार्ग के अलग अलग…

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