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	<title>सारथी</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>बोलो तो मुसीबत, चुप रहो तो मुसीबत!!</title>
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		<pubDate>Wed, 16 May 2012 08:50:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[रवीन्द्र प्रभात एक सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं जिनके आलेख मैं उनकी चिट्ठाकारी के आरंभ से ही पढता आया हूँ.&#160; उनके कई आलेख बहुत ही विचारोत्तेजक रहे हैं एवं उन आलेखों पर टिप्पणी करते समय मैं ने इस बात का उल्लेख भी किया है. हिन्दी चिट्ठाजगत के लिये कुछ करने की इच्छा के कारण उन्होंने “परिकल्पना [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>रवीन्द्र प्रभात एक सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं जिनके आलेख मैं उनकी चिट्ठाकारी के आरंभ से ही पढता आया हूँ.&#160; उनके कई आलेख बहुत ही विचारोत्तेजक रहे हैं एवं उन आलेखों पर टिप्पणी करते समय मैं ने इस बात का उल्लेख भी किया है. हिन्दी चिट्ठाजगत के लिये कुछ करने की इच्छा के कारण उन्होंने “परिकल्पना ब्लागोत्सव” का आयोजन&#160; आरंभ किया था.&#160; इसके के कारण चिट्ठाकारी और चिट्ठाकारों को काफी प्रोत्साहन मिला था. </p>
<p>जब हम पडोसी के लिये कुछ करते हैं तो हम को भी फल मिलता है. यह प्रकृति का नियम है. इस कारण इन ब्लॉगोत्सवों द्वारा रवीन्द्र काफी लोगों की नजर में आये, काफी नाम मिला, प्रशंसा मिली. इसमें किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिये. यह उनके सत्करर्म, उनकी सेवा, का स्वाभाविक फल है. हम सब की कोशिश यह होनी चाहिये कि उनके समर्पण एवं उनकी मेहनत को प्रोत्साहित करें. </p>
<p>मेरे बेटे की मोटरसाईकिल-बस दुर्घटना के कारण मैं&#160; छ: महीने चिट्ठाजगत के बाहर रहा था. कल जब वापस आया तो देखा कि कई लोग जम कर&#160; ब्लॉगोत्सव की आलोचना कर रहे हैं. कारण वही हमेशा वाला प्रश्न है: फलां फलां व्यक्ति/व्यक्तियों को क्यों नाम/इनाम/प्रतिफल मिल रहा है. रवीन्द्र की जम कर खिचाई हो रही है. अरे रवीन्द्र भाई, आप को लग रहा होगा कि बोलो तो मुसीबत, चुप रहो तो मुसीबत!!. सही है. लेकिन आप तो लगे रहें. पत्थर तो उसी पेड पर फेंके जाते हैं जिस पर फल लदे हों. अत्: मेरा सुझाव है कि कर्म करते रहें, फल बांटते रहें! कुछ फल उनको भी दे देना जिन्होंने पत्थर फेंके हैं. आखिरकार पत्थर फेंकने के लिये भी तो मेहनत लगती है!!</p>
<p>बस मैदान में डटे रहें!</p>
<p>&#160;</p>
<p>पुनश्च: &#8212; रवीन्द्र का चिट्ठा है <a title="http://www.parikalpnaa.com/" href="http://www.parikalpnaa.com/">http://www.parikalpnaa.com/</a></p>
<p>&#160;</p>
<p>&#160;</p>
<p>.</p>
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		<title>क्या भिखारी भी मानव हैं ?? (Are Beggars Also Human??)</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2689</link>
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		<pubDate>Wed, 17 Aug 2011 13:58:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[अविस्मरणीय]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे घर के पास हाईवे पर एक बहुत ही व्यस्त चौराहा है जहां हरीबत्ती के लिये अकसर 3 मिनिट रुकना पडता है. वहां एक स्थाई भिखारिन है जिसको मैं पिछले दस साल से पैसा देता आया हूँ. मुझे देखते ही उसकी बांछें ऎसी खिल जाती हैं जैसे कि मुझ से भीख पाना उसका जन्मसिद्ध हक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे घर के पास हाईवे पर एक बहुत ही व्यस्त चौराहा है जहां हरीबत्ती के लिये अकसर 3 मिनिट रुकना पडता है. वहां एक स्थाई भिखारिन है जिसको मैं पिछले दस साल से पैसा देता आया हूँ. मुझे देखते ही उसकी बांछें ऎसी खिल जाती हैं जैसे कि मुझ से भीख पाना उसका जन्मसिद्ध हक है. चूंकि मेरे दादाजी हमेशा कहते थे कि महीने भर मिलने वाले हर भिखारी को भीख दो बेटा, तो भी वह किसी अच्छे हाटल में एक खाने के पैसे से कम ही बैठेगा अत्: मैं भिखारियों को निराश नहीं करता.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">आज किसी कारण से चौराहे पर यातायात एकदम ठप्प था और मामला साफ था कि 3 मिनिट का आज 10 मिनिट हो जायगा. मैं ने डेशबोर्ड पर से 2 रुपये का सिक्का हाथ लिया ही था की वह भिखारिन आ गई. उसे भी मालूम था कि आज मेरी गाडी 3 मिनिट से अधिक रुकेगी. अत: भीख छोड कर वह गाडी के बगल में आ खडी हुई और मेरे परिवार के बारे में पूछने लगी. वह होगी यही 40 से 50 के आसपास की. जब मैं ने अपने विवाहित बेटेबेटी और पत्नी आदि के बारें में कहा तो वह बोली कि दस साल से वह मेरी गाडी में उनको देखती आई है और ईश्वर से प्रार्थना करती आई है कि इस “अच्छे साहब” को ईश्वर का अनुग्रह मिले. वह जानना चाहती थी कि एक साल से वे मेरे साथ क्यों नहीं दिखते.&#160; आज उसने पैसा नहीं लिया बल्कि अपनी बात कह कर झुक कर प्रणाम किया और अगली गाडी की ओर हाथ बढा कर चली गई.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">क्या भिखारी भी मानव हैं? क्या हमारी एक मुस्कान उन में से किसी एक को जीने की आशा दे सकती है?</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">There is very busy intersection at the highway close to my house. Often it takes 3 minutes to get green light. There is almost always beggar there whom I had been giving money for the last 10 years. My grandpa used to say that even if we give alms to every beggar whom we come across, the amount thus given away would be much less than what a single meal costs me in a good hotel. Thus I always give some money to beggars. This particular lady would always approach me at this intersection with an expression as though it were her birthright to get a rupee or two from me. </p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">Today there was a traffic block at that junction and it was clear that the usual 3 minutes would turn into 10 minutes today. As usual I picked up a two-rupees coin from the dashboard, and lot she was there. She knew that I would be there for some time, so positioning her besides the window she with a smile asked me about my wife and children. She said she had always seen them with me, but the children have been missing for the last year or so. I told her that they got married and are now settled in other states. That lady who might be between 40 to 50, was pleased to hear this. She said she had always been praying that God may bless this “gentleman”. She did not accept the coin today. Instead, she bowed humbly to me and moved on to the next car with her stretched hand.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">Are beggars also human? Can a smile on our face give one of them a better hope in this life?</p>
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		<title>क्या है यह स्लट-वॉक ??? (What Is This Slut-walk?)</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2685</link>
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		<pubDate>Sat, 30 Jul 2011 07:54:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[इन दिनों स्लट-वॉक की बडी चर्चा हो रही है. दर असल स्लट-वॉक पश्चिमी सभ्यता का एक नंगा नाच है जिसे हिन्दुस्तान में आयातित किया जा रहा है. यह 3 अप्रेल 2011 को कनाडा से चालू हुआ था जहां प्रथम स्लट-वॉक में&#160; काफी सारी जवान स्त्रियों ने एक दम अर्धनग्न वस्त्रों में स्त्रियों के यौनिक शोषण [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">इन दिनों स्लट-वॉक की बडी चर्चा हो रही है. दर असल स्लट-वॉक पश्चिमी सभ्यता का एक नंगा नाच है जिसे हिन्दुस्तान में आयातित किया जा रहा है. यह 3 अप्रेल 2011 को कनाडा से चालू हुआ था जहां प्रथम स्लट-वॉक में&#160; काफी सारी जवान स्त्रियों ने एक दम अर्धनग्न वस्त्रों में स्त्रियों के यौनिक शोषण का विरोध किया था.</p>
<p align="justify">धन की जरूरत पडने पर कई पश्चिमी देशों में स्त्रियां अपन कौमार्य नीलाम करके बेचती हैं. ऎसे समाज में यदि वे अर्धनग्न भीड के रूप में सडक पर उतर आयें तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं है. लेकिन हिन्दुस्तान जैसे धार्मिक एवं मर्यादा-नियंत्रित देश में इस तरह के प्रदर्शन एकदम गलत है. स्त्री-स्वंतंत्रता का मतलब लैंगिक अराजकता नहीं है.</p>
<p align="justify">स्लट का चालू अनुवाद है छिनाल या रांड किस्म की औरत. अत: स्लट-वॉक का अनुवाद होगा छिनाल प्रदर्शन या रांड-परेड.&#160; सवाल है कि हिन्दुस्तान में इस प्रकार के अनैतिक परेड की जरूरत है क्या. मेरे हिसाब से अश्लील प्रदर्शन के कानून का प्रयोग कर इस तरह की लैंगिक अराजकता को रोकना जरूरी है.</p>
<p align="center"><font color="#c0504d" size="3"></font></p>
<p align="center"><font color="#c0504d" size="3">What Is This Slut-walk Thing??</font></p>
<p align="justify">There is a lot of discussion these days about a certain “Slut-walk”. Actually this so-called slut-walk is the import of the morally more degenerate elements of the present-day western civilization. It started on 2 April 2011 where, inter alia, numerous young women paraded in public in semi-nude and highly provocative poses. </p>
<p align="justify">We keep seeing instances of women who auction their virginity in these western nations to raise funds. Therefore if a group of women from these countries parade in streets in provocative clothing, one should not be surprised. However, such parades would be totally wrong in India where the majority of people hold on to higher moral and social values. Women’s liberation does not mean liberation to uncover in public. Nor does it mean sexual anarchy.</p>
<p align="justify">The common meaning of the word “slut” is “a woman of totally loose character”. Thus Slut-walk means a parade of women of totally loose character. Why do we need this kind of a parade in India? I strongly feel that the government should invoke laws related to immoral display in public places to totally stop this kind of sexual anarchy.</p>
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		<title>White Tiger: A Dissenting View</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Jul 2011 15:26:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[The White Tiger is a 320+ page English novel by Arvind Adiga which was given the 2008 Man Booker prize. He was given an award close to Rs. 4,000,000 for this novel. Going by the amount he pocketed, and the praises that I saw (a masterpiece, Compelling, Delightfully mordant wit, blazingly savage and brilliant), I [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">The White Tiger is a 320+ page English novel by Arvind Adiga which was given the 2008 Man Booker prize. He was given an award close to Rs. 4,000,000 for this novel. Going by the amount he pocketed, and the praises that I saw (a masterpiece, Compelling, Delightfully mordant wit, blazingly savage and brilliant), I remained under the impression that here is another one of those classic novels that are timeless.</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">I had been reading some dissenting voices here and there, but felt that these people might not have read the novel. Unfortunately, my illusion was shattered when my son presented me with a copy of this book. With great expectation I started reading it two days ago, and was able to complete it an hour ago. I must say that those whose dissenting voices I ignored are probably the only people who read this novel – other than the judges.</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">One of the allegations that keep surfacing about Man Booker and other non Indian literary awards (that many Indians have won) is that these awards are given for novels that present India as a shit hole, as a nation of illiterate people who have nothing except hunger, poverty and corruption in India. I feel that at least for this novel that allegation is totally true. I am now on the trail of the other “award winners” and would present my reflection upon them very soon.</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">White Tiger mentions many of the evils and corruption that one sees in India. However, the books fails to see anything that is good, and there lies the catch. Nor are these evils described to motivate the reader to change them. On the contrary, the reader is bound to think, oh that is the way India is and it is not going to change. It seems that is exactly what the European judges wish to read.</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">The prize was originally known as the Booker-McConnell Prize, after the company Booker-McConnell began sponsoring the event in 1968. It has undergone many changes since then, but one thing has remained unchanged: the price is given only to writers from the former British Empire, including those countries like India that were a Colony of the Empire. </font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">Coming back to the novel: it is less of a novel in the traditional sense of the novel where you have a suspense that remains there till the climax. On the contrary, it is written more like an essay in a narrative format. Thus the only binding factor that I could think of, to retain readers till the end, is that this is a “Booker-prize” novel. I hope and wish that very soon such prizes would become a disqualification in our view, if they are written to cater to the taste of those European readers who would like to keep seeing India as a nation of slaves, now rendered a shit-hole because it is no longer a British Colony. </font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">The book presents India in a very bad light, has no moral in the end, and almost all the reviews that you read praising it are false-talk. I suspect that all this review-publicity is either a business promotion strategy or&#160; a you-scratch-my-back, I-scratch-your-back type of review. Not only that, young Indian readers who read this book are left with a very bad impression of their motherland. Evil is not projected as something that ought to be removed, but rather as something that is inherent in India, or even as the unchangeable spirit of India.</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana">Such novels should not be encouraged. You should look with suspicion those people who endorse this kind of novels. They either do not understand what they read, or are so much given to despising India that they do not get the underlying message of the book.</font></p>
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		<title>हिन्दुस्तानी हो, हिन्दुस्तानी बनो!</title>
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		<pubDate>Fri, 06 May 2011 11:48:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परामर्श]]></category>

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		<description><![CDATA[कई दशाब्दियों से रेलगाडी यात्रा मेरे लिये जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है. इन यात्राओं के दौरान कई खट्टेमीठे अनुभव हुए हैं, जिनमें मीठे अनुभव बहुत अधिक हैं. इसके साथ साथ कई विचित्र बाते देखने मिलती हैं जिनको देखकर अफसोस होता है कि लोग किस तरह से विरोधाभासों को पहचान नहीं पाते हैं. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कई दशाब्दियों से रेलगाडी यात्रा मेरे लिये जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है. इन यात्राओं के दौरान कई खट्टेमीठे अनुभव हुए हैं, जिनमें मीठे अनुभव बहुत अधिक हैं. इसके साथ साथ कई विचित्र बाते देखने मिलती हैं जिनको देखकर अफसोस होता है कि लोग किस तरह से विरोधाभासों को पहचान नहीं पाते हैं. </p>
<p>उदाहरण के लिये निम्न प्रस्ताव को ले लीजिये: बी इंडियन, बाई इंडियन. यह प्रस्ताव अंग्रेजी में या हिन्दी में अकसर दिख जाता है. अब सवाल यह है कि इसे सीधे सीधे भारतीय अनुवाद में क्यों नहीं दे दिया जाता है. “हिन्दुस्तानी हो, हिन्दुस्तानी बनो” (जो इस अंग्रेजी वाक्य का भावार्थ&#160; है)&#160; हिन्दी में कहने में हमें तकलीफ क्यों होती है. हिन्दुस्तानियों को हिन्दुस्तानी बनाने के लिये एक विलायती भाषा की जरूरत क्यों पडती हैं?</p>
<p>दूसरी ओर, जब “बी इंडियन, बाई इंडियन” लिखा दिखता है तो कोफ्त होती है कि यह किसके लिये लिखा गया है? अंग्रेजीदां लोग तो इसे पढने से रहे क्योंकि उनकी नजर में तो हिन्दी केवल नौकरोंगुलामों की भाषा है. आम हिन्दीभाषी जब इसे पढता है तो उसके लिये इसका भावार्थ समझना आसान नहीं है. उसे लगता है कि यहां खरीदफरोख्त की बात (बाई Buy) हो रही है. </p>
<p>जरा अपने आसापास नजर डालें. कितने विरोधाभास हैं इस तरह के. कम से कम दोचार को सही करने की कोशिश करें!</p>
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		<title>चिट्ठा एग्रीगेटर की कमी!</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Mar 2011 13:25:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

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		<description><![CDATA[काफी अर्से पापी पेट की जरूरतों के पीछे&#160; भाग, चिट्ठाकारी को हटा कर रखने&#160; के बाद चिट्ठाकारी में लौटा तो एक बात बहुत खल गई कि कोई भी एग्रीगेटर काम नहीं कर रहा है. ऐसा लगा कि मैं अनाथ हो गया हूं. दर असल कुछ साल से यह नियम बन गया था कि रोज सुबह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>काफी अर्से पापी पेट की जरूरतों के पीछे&#160; भाग, चिट्ठाकारी को हटा कर रखने&#160; के बाद चिट्ठाकारी में लौटा तो एक बात बहुत खल गई कि कोई भी एग्रीगेटर काम नहीं कर रहा है. ऐसा लगा कि मैं अनाथ हो गया हूं. </p>
<p>दर असल कुछ साल से यह नियम बन गया था कि रोज सुबह चिट्ठाजगत पर एक नजर डालने के बाद ही बाकी कुछ किया जाये. संगणक पर काम करने के बीच दिन भर में कम से कम दसबीस बार नजर चली जाती थी. जैसे ही किसी प्रिय चिट्ठाकार का आलेख दिखा, या किसी और का कोई दिलचस्प आलेख नजर आया, या कोई नया-नवेला सशक्त लेखक नजर आया तो उस आलेख को पढना एवं टिप्पणी करना जीवन का एक अंग बन गया था.</p>
<p>कोई भी कार्य कितना भी खुशी दे, कितना भी सहज हो, वह करना और भी सहज हो जाता है जब उसके लिये सही औजार उपलब्ध हो. दीवार में कील ठोकने के लिए पत्थर काफी है, लेकिन वह हथौडे का आनंद या सुविधा नहीं देता है. चिट्ठाजगत में हम अपने मित्रों के चिट्ठों पर जा जाकर देख सकते हैं, लेकिन एग्रीगेटर में सबकुछ (शीर्षक, टिप्पणी, आंकडे आदि) देखने का मजा कुछ और ही है. </p>
<p>इस हफ्ते चिठाजगत के जालसाज से बात हुई तो पहली बार पता चला कि एग्रीगेटर की प्रोग्रमिंग कितनी जटिल है, जिसके चलते उनका यंत्र रुक गया है. उम्मीद है कि जल्दी ही उनका नवीन तंत्र सही हो जायगा जिससे कि हम सब पुन: एक दूसरे को देख सुन सकें.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>नया साल, नये सपने??</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Jan 2011 04:21:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[जनवरी एक को हमारे प्रार्थना समाज में सर्वदेशीय उन्नति एवं प्रगति के लिये हम एकत्रित हुए तो एक सज्जन ने एक दिलचस्प बात कही. वे बोले कि हर नये साल वे कुछ न कुछ निर्णय जरूर लेते हैं, लेकिन कभी भी उन निर्णयों का पालन नहीं कर पाते. इस कारण उन्होंने तय किया है कि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जनवरी एक को हमारे प्रार्थना समाज में सर्वदेशीय उन्नति एवं प्रगति के लिये हम एकत्रित हुए तो एक सज्जन ने एक दिलचस्प बात कही. वे बोले कि हर नये साल वे कुछ न कुछ निर्णय जरूर लेते हैं, लेकिन कभी भी उन निर्णयों का पालन नहीं कर पाते. इस कारण उन्होंने तय किया है कि इस साल वे किसी भी तरह का निर्णय नहीं लेंगे!</p>
<p>मेरे मन में एकदम से दो बातें कौंध गईं. पहली बात –&#160; उन्होंने जो किया वह क्या एक तरह का निर्णय नहीं था? बिल्कुल था. हां उस निर्णय का सार यह था कि वे इस साल आगे बढने के लिये कोई भी सक्रिय कोशिश नहीं करेंगे. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उन्होंने विफलता के लिये निर्णय ले लिया था.&#160;&#160; एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट किया जा सकता है.&#160; मान लीजिये कि दो मित्र ऊंचीकूद की तय्यारी कर रहे हैं. उन में से एक दोस्त बाकायदा धागा बांध कर उसके ऊपर से कूदता है. हर सफलता पर वह धागे को कुछ ऊचा करता जाता है. </p>
<p>दूसरा मित्र बिना निशान आदि लगाये कूदता है. हर बार वह और अधिक उत्साह के साथ कूदने की कोशिश करता है. इस तरह साल भर वे दोनों ऊंचीकूद की तय्यारी करते रहते हैं. साल के अंत में प्रतियोगिता होती है. दोनों कूदते हैं. फल क्या होगा?</p>
<p>जो व्यक्ति बिना किसी लक्ष्य के कूदता है, वह साल भर के परिश्रम के बावजूद कोई खास तरक्की नहीं कर पाता है, लेकिन जो व्यक्ति लक्ष्य के साथ कूदता है वह बहुत अधिक ऊचाई तक चला जाता है. जीवन के हर पहलू में हमारा लक्ष्य बहुत बदलाव लाता है.</p>
<p>आप सब के लिये मेरी कामना है कि सन २०११ आप के लिये बहुत ऊचे पहुंचने का साल निकले!</p>
]]></content:encoded>
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		<item>
		<title>सरकार हमारी है या हम सरकार के खरीदे हैं??</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2676</link>
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		<pubDate>Mon, 08 Nov 2010 11:20:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[जनतंत्र का मतलब यह है कि सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाई गई है.&#160; लेकिन पूर्ण जनतंत्र तभी स्थापित हो सकता है जब किसी भी जनतंत्र के सारे&#160; नियमकानून उस देश की जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाये गये हों. विडंबना यह है कि १९४७ में तकनीकी तौर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>जनतंत्र का मतलब यह है कि सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाई गई है.&#160; लेकिन पूर्ण जनतंत्र तभी स्थापित हो सकता है जब किसी भी जनतंत्र के सारे&#160; नियमकानून उस देश की जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाये गये हों.</p>
<p>विडंबना यह है कि १९४७ में तकनीकी तौर पर हम आजाद हो गये, लेकिन आज भी अंग्रेजों के द्वारा हिन्दुस्तानियों के दमन एवं शोषण के लिये बनाये गये कई कानून इस देश में चल रहे हैं. फल यह है कि आजाद होते हुए भी, कानून हमारी आजादी की सुरक्षा नहीं कर पा रहा है. न ही हम अपनी आजादी की मांग कर पा रहे हैं क्योंकि कई क्षेत्रों में वही अंग्रेजों के बनाये नियमकानूनों के आधार पर काम चलता है.&#160; इसका एक अच्छा उदाहरण है हमारा पुरातत्व विभाग. इसकी स्थापना अंग्रेजों ने की थी, एवं पिछली एक शताब्दी से अधिक समय में सारे हिन्दुस्तान भर में हो पुरातत्व संग्रहालय हैं उन के पास लाखों वस्तुओं का संग्रह हो गया है. </p>
<p>मेरी रुचि प्राचीन भारत के सिक्कों में है, और पुरातत्व विभाग के पास लाखों दुर्लभ सिक्के पडे हैं. कुछ को जनता देख सकती है लेकिन अधिकांश उनकी कालकोठरियों में पडे है. जो दिखाने के लिये रखे है आप उनका छायाचित्र नहीं उतार सकते. कुल मिलाकर कहा जाये तो हमारे पैसे का उपयोग कर हमारे ही देश की संपत्ति की सुरक्षा में लगे लोग हम को उस असीमित जानकारी का उपयोग करने नहीं देते. न ही वे लोग इस जानकारी को सही रीति से लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं. </p>
<p>लगभग हर जनतंत्र में जनता की संपत्ति बडे आराम से जनता को उपलब्ध है. बस अपने ही देश में आप के पैसे से आप को अभी भी गुलाम रखा जा रह है. इसके विरुद्ध जनमत तय्यार करना जरूरी है, और इस आलेख को इसकी पहली कडी मान लीजिये.</p>
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		<title>एक पति, एक सौ पत्नियां!</title>
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		<pubDate>Thu, 28 Oct 2010 03:05:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[आज एक पत्रिका पढ रहा था तो एक बात बडी खटक गई. लेख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के बारे में था. लेखक का कहना था कि प्रधान-मंत्री से बडी उम्मीदें थीं, लेकिन वे यह नहीं कर पाये या वह नहीं कर पाये. पढ कर बडा विचित्र लगा. आप न वह प्रतियोगिता देखी होगी जिसमें आदमी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज एक पत्रिका पढ रहा था तो एक बात बडी खटक गई. लेख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के बारे में था. लेखक का कहना था कि प्रधान-मंत्री से बडी उम्मीदें थीं, लेकिन वे यह नहीं कर पाये या वह नहीं कर पाये. पढ कर बडा विचित्र लगा.</p>
<p align="justify">आप न वह प्रतियोगिता देखी होगी जिसमें आदमी को कमर तक एक बोरी में डाल कर कमर पर उसे बांध दिया जाता है. अब उस से दौडने को कहा जाता है. कोई भी व्यक्ति दो कदम से आगे नहीं बढ पाता है. दर्शक लोग तमाम तरह की बाते कहते हैं कि ऐसा करो या वैसा करो. कुछ बेवकूफ आप बोरियों में कूद जाते हैं, कमर पर बंधवा लेते हैं&#160; और दो कदम के बाद ऐसे गिरते हैं कि आगे कभी किसी को कोई सुझाव न देने की सोच कान पकड लेते हैं.</p>
<p align="justify">यह इस देश की विडंबना है कि जिस आदमी को भी जिम्मेदारी के पद पर बैठा दिया जाता है उसे कोई भी निर्णय लेने के लिये सौ लोगों के अनुमति की जरूरत होती है. दायें जाओ तो एक सहयोगी पार्टी नारज होती है, बायें जाओ तो दूसरी, सीधे जाओ तो तीसरी. कहीं न जाओ तो जनता नाराज होती है. अफसोस यह है कि सहयोगी न हों तो सरकार नहीं “बन” सकती, लेकिन सहयोगी हों सरकार नहीं “चल” सकती! हां किनारे खडे लोग एक से एक सुझावे देते जाते हैं क्योंकि वे कभी पाले में नहीं उतरे हैं. सुझाव देने के लिये न तो अकल की जरूरत होती है न समझ की.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>क्या हम कभी सुधरेंगे?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2669</link>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 07:16:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[पापी पेट का चक्कर कुछ ऐसा चला कि चिट्ठाकारी करना भूल गया. लेकिन चिट्ठाकारी नहीं भूला. इस बीच हिन्दी शब्द संसाधक ने ऐसा चक्कर चलाया कि कुछ पूछिये मत. अब सब कुछ लगभग सामान्य दिखने लगा है. इन दिनों सारथी पर लिख नहीं रहा था, लेकिन चिट्ठों को पढता जरूर था. कई बार बडी कुंठा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पापी पेट का चक्कर कुछ ऐसा चला कि चिट्ठाकारी करना भूल गया. लेकिन चिट्ठाकारी नहीं भूला. इस बीच हिन्दी शब्द संसाधक ने ऐसा चक्कर चलाया कि कुछ पूछिये मत. अब सब कुछ लगभग सामान्य दिखने लगा है.</p>
<p align="justify">इन दिनों सारथी पर लिख नहीं रहा था, लेकिन चिट्ठों को पढता जरूर था. कई बार बडी कुंठा होती थी कि क्या इतिहास से हम कुछ सीख पायेंगे. मेरे इतिहास के शिक्षक तो सब बहुत गडबड किस्म के थे, और इतिहास के प्रति जो प्रेम हो सकता है उसे एकाध पाठ पढाते ही “झाड” कर अलग कर देते थे. कुल मिला कर कहा जाये तो शालेय इतिहास की शिक्षा इतिहास के विरुद्ध एक तावीज/गंडा विद्यार्थी के मन में बांध देता है. ऐसा कम से कम मेरे साथ और मेरे कई मित्रों के साथ हुआ. आगे जाकर धर्मविज्ञान की शिक्षा ली तो पाया कि वहां भी इतिहास के अध्यापन/अध्ययन की स्थिति इतनी ही बदतर है. </p>
<p align="justify">दर असल इतिहास एक गजब का विषय है. शायद अनुभव और इतिहास मनुष्य के सबसे बडे शिक्षक हैं. लेकिन इतिहास के आस्वादन से वंचित हम में से अधिकतर लोग इतिहास से कुछ भी नहीं सीख&#160; पाते हैं. अब भारत का इतिहास ही ले लीजिये. पिछले ५००० साल का इतिहास इस बात को एकदम स्पष्ट बताता है कि देश के विकास के लिये क्या उचित है और क्या अनुचित है. लेकिन इतिहास के आस्वादन से वंचित हम लोग शायद कभी ये बातें न सीख पायेंगे और पीढी दर पीढी गुलाम ही बने रहेंगे. कल अंग्रेंजों के गुलाम थे, आज उनके व्यापारिक हितों के गुलाम हैं. </p>
]]></content:encoded>
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		<title>राजनीति और आम जीवन!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2659</link>
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		<pubDate>Wed, 05 May 2010 07:19:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेशनीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/05/SitholiHotel2.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Dr. Johnson C. Philip, Shastri JC Philip" border="0" alt="Dr. Johnson C. Philip, Shastri JC Philip" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/05/SitholiHotel_thumb2.jpg" width="120" height="123" /></a> जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेशनीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से पिताजी की सीमित आय से परिवार का खर्चा चलाती है. </p>
<p align="justify">ऐसे परिवारों में मां जो कुछ करती है उसे एक दो लोग समझते हैं, लेकिन कुछ बच्चे हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि उनको पडोसी के बच्चों के समान यह नहीं मिला या वह नहीं मिला. उनको इस बात से कुछ लेना देना नहीं है कि घर की आर्थिक स्थिति क्या है. उनको इस बात से भी कुछ लेनादेना नहीं है कि उन्हीं की खातिर मां यह सब सह रही है क्योंकि बच्चे तो सिर्फ खर्चा बढाते हैं उसमें कोई योगदान नहीं देते हैं.</p>
<p align="justify">चाहे नेहरू ने राज किया हो या इंदिरा ने, मुझे उनके राजनैतिक झुकाव से कोई मतलब नहीं है. लेकिन इतना जरूर है उन लोगों ने जो आर्थिकसामरिक ढांचा ढाला, और जिसे राजीव गांधी और अटल जी ने आगे बढाया उस कारण आज ६० साल में हम ऐसी स्थिति में पहुंच गये हैं जो मैं ने अपने बचपन में (१९५४ से आगे) देखा था उस से १०० गुना बेहतर है. उस समय एक टेलीफोन कनेक्शन के लिये १० साल इंतजार करना पडता था, वेस्पा स्कूटर के लिये भी १० साल का ही इंतजार था. खानपान की सामग्री का इतना अभाव था कि घरपार्टियों में लोग भोजन पर गिद्ध के समान टूट पडते थे और घर ले जाने के लिये (दूसरों की नजर बचा कर) थैले में जो डाल लेते थे वह अलग होता था. एक प्लास्टिक के लिफाफे के लिये कपडे की दुकान पर अनुनयविनय करते थे. एक हाथघडी या रेडियो मरम्मत के लिये देते थे तो इस बात का खुटका लगा रहता था कि उस में से क्या क्या “खीच” लिया जायगा.</p>
<p align="justify">ताज्जुब है कि जो देश २५०० साल तक नोचाखसोटा गया, और जिसकी आजादी के समय जो जनसंख्या थी उसे से अब ढाई गुनी हो जाने के बावजूद, ६० साल में जीवन की लगभग हर तरह की सुविधा उपलब्ध हो गई है. जो कुछ अभी तक नहीं हो पाया है उसे जरा क्षण भर के लिये अलग रख दें. उसके बदले जरा यह सोचें कि महज ६० साल में कितना कुछ हम ने वापस पा लिया है. इस आधार पर अगले आलेख में मैं कुछ कहना चाहूंगा.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>एक बिजली, लाखों का नुक्सान!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2658</link>
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		<pubDate>Tue, 04 May 2010 16:50:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके. सालों पहले जब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके.</p>
<p>सालों पहले जब ग्वालियर से कोच्चि आकर बसा तो यहां की साल में १६५ दिन की बारिश मेरे लिये अजूबा थी. झंझट भी था. लेकिन जब धर्मपत्नी ने पहली बारिश के समय टोका कि बरसात के समय दूरभाष का प्रयोग न करूं, संगणक आदि बंद कर दूं, तो लगा कि वे मजाक कर रही हैं. लेकिन उसी हफ्ते जब मेरे पडोसी के पेड पर बिजली गिरी तो कान पकड लिये.</p>
<p>अगली बरसात के मौसम में दौड कर संगणक बंद करते करते मेरे सामने ही मेरा मॉडम जल गया. प्रभु की दया से केबल को हाथ लगाने के पहले ऐसा हो गया, वर्ना ३०,००० वोल्ट बिजली मेरे बदन से होकर गुजरती तो पता नहीं क्या खाक बचता. इसके अगले साल हम लोग खिडकी से बारिश देख रहे थे कि हमारे आंगने में लगे नारियल पर बिजली गिरी और दस मिनिट में उसका सिर्फ ठूंठ बचा रहा.</p>
<p>इसके कुछ सालों बाद इस इलाके में बीएसएनएल वालों का टावर लग गया और बिजली को उसका तडित-चालक खीचने लगा. हम लोगों ने चैन की सांस ली. लेकिन पिछले हफ्ते जो बिजली गिरी तो लगभग १ मिनिट तक आवाज आती रही और धरती कांप गई. पता चला कि केबिल द्वारा इंटरनेट प्रदान करने वाली दोनों कंपनियों का लाखों रुपये की मशीनें जल गईं. हफ्ते भर जालसंपर्क टूटा रहा. अब जुडा तो ५ मिनिट जाल लग जाता है तो अगले ५५ मिनिट मैं निराश बैठा रहता हूं.</p>
<p>एक बिजली, लेकिन क्या क्या गुल खिला गई इस बार.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>बनारस का बुद्धिजीवी फरिश्ता!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2655</link>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 03:14:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू &#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन &#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण -८) में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" border="0" alt="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind_thumb.jpg" width="240" height="160" /></a> मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू <a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">-८</a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">)</a> में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज ७ की तकनीकी समस्या के कारण अभी तक पेश नहीं कर पाया था. आज सुबह हिन्दीटंकण की समस्या हल हुई तो लगा अब इस “महामिलन” के बारे में लिखने का समय आ गया है.</p>
<p align="justify">दर असल डा अरविंद मिश्रा मेरे इष्ट चिट्ठाकारों में से एक हैं. उनका वैज्ञानिक लेख गजब का होता है, और मैं उनको नियमित रूप से पढता हूं. वैचारिक विषयों पर भी उनके आलेख पाठक को चिंतन के लिये प्रेरित करते हैं अत: उनके वैचारिक आलेख भी काफी रुचि से पढता हूँ. चिट्ठाजगत के एकाध चिट्ठा-पिस्सुओं को उनके वैज्ञानिक आलेखों से बढी तकलीफ होती है, और उनके कहे को तोडमरोड कर पेश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अरविंद जी ने आज तक जम कर उनका सामना किया है. इन सब कारणों से मैं उनका बडा भक्त हूँ और उनसे मुलाकात के लिये एक एक पल काटना मुश्किल हो गया था.</p>
<p align="justify">लेकिन वैज्ञानिक ठहरे वैज्ञानिक. वे कहां हम धरतीधारियों के टाईमटेबल से चलते हैं. (सुनते हैं कि बिजली के बल्ब के अविष्कारक थामस एडिसन ने तो शादी के एक हफ्ते के बात अपनी श्रीमती जी को अपने पास देख टोक दिया था कि देवी आप कौन हैं और क्यों मेरे आसापास घूम&#160; रही हैं). खैर डॉ अरविंद ने अंत में चलभाष पर खबर की कि वे शहर के दूसरे कोने में पहुंच चुके हैं और हमारी कुटिया/आश्रम में सशरीर तशरीफ लाना चाहते&#160; हैं. बडा सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके व्यस्त कार्यक्रम के बीच १४ किलोमीटर दूर मुझ से मिलने के लिये वे खुद आना चाहते थे.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="Temple" border="0" alt="Temple" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple_thumb.jpg" width="440" height="304" /></a> </p>
<p align="center"><font color="#0000f2">चित्र को बडा करके देखने के लिये मंदिर के चित्र पर चटका लगाईये</font></p>
<p align="justify">शास्त्रीधाम तक पहुंचना बहुत आसान है. वामन अवतार के लिये प्रसिद्ध त्रिक्ककरा मंदिर के बगल में ही है शास्त्रीधाम. (चित्र ऊपर संलग्न है. किलका कर बडा चित्र देख लें). बस उनको बता दिया के आटोवाले को मंदिर का नाम बता दे और उसके सामने उतर लें. यह वही प्रसिद्ध मंदिर है जो ओणम त्योहार का कारण है. (हर ओणम पर त्योहार मनाने के लिये पहला दान मेरे घर से लिया जाता है, लेकिन केरल के नियमों के अंतर्गत मैं इसमें प्रवेश नहीं कर सकता).&#160; ऑटो समय पर आ गया और अलिंगन के साथ स्वागत कर मैं उनको अपने घर ले गया.</p>
<p align="justify">ऐसा लगता था कि हम दशाब्दियों से एक दूसरे को जानते थे. आपस में बातचीत जो शुरू हुई तो चिट्ठाजगत से लेकर प्राचीन-भारत तक और सौन्दर्यशास्त्र से लेकर दर्शन तक की चर्चा बडे ही अनायास हुई. बातचीत के लिये हम दोनों में से किसी ने कोई एजेंडा सोच नही रखा था, लेकिन जब आपसी स्नेह होता है तो कब शब्दों की कमी पडी है और कब पूर्व-योजना की जरूरत पडी है.&#160; खानपान के बीच उन्होंने अपने परिवारजनों द्वारा भेजी गई कुच चीजें मेरी श्रीमतीजी को भेंट कीं तो वे भौचक्की रह गईं. उनके लिये अनजान लोगों के स्नेह की निशानी देख वे एकदम अवाक-मूक रह गईं. </p>
<p align="justify">खानपान के बाद हम लोग ऊपर की मंजिल के मेरे सिंहासन-कक्ष (लाईब्रेरी) में चले गये. मेरे अनुरोध पर डॉ अरविंद ने वाकई में मेरा “सिंहासन” ग्रहण कर लिया. हर ओर किताबें ही किताबें. उन्होंने बहुत पसंद किया. मुझे बताना पडा कि ये सिर्फ २००० ग्रंथ&#160; हैं. मेरा संकलन ३०,००० पुस्तकों का था जिन में से १०,००० के हिसाब से दो संस्थाओं को (जिन में मैं प्राचार्य रहा था) और ८,००० अपने मित्रों को बांट दिये हैं.&#160; फिर मैं ने अपने सिक्कों के कुछ नमूने उनको दिखाये और भारतीय सिक्काशास्त्र के बारें कुछ दिलचस्प बातें बताईं. पुन: विभिन्न विषयों पर चर्चा का दौर चला तो पता न चला कि समय कैसे बीत गया.</p>
<p align="justify">डॉ अरविंद एक सुलझे हुए चिंतक हैं को कई विषयों में दखल रखते हैं. हर विषय पर उनकी एक निश्चित सोचीसमझी राय है. ऐसे व्यक्ति से घंटों बात की जा सकती है और हर पल ऐसा लगता है जैसे आप किसी विश्वविद्यालय के अनुभवी अध्यापक की ऐसी कक्षा में बैठे हों जहां ज्ञान अनवरत बांटा जा रहा है लेकिन जहां परीक्षा का कोई डर नहीं है. एक जिज्ञासु विद्यार्थी के समान मैं बैठकर ज्ञानपान करता रहा. एकाध बार विपरीत विचार रखे तो शहद के छत्ते से और अधिक सोमवर्षा हुई. कुल मिला कर यह ऐसी एक अनुभूति थी जिस में डूब कर मुझे पता ही न चला कि समय जैसी भी कोई बला हम दोनों के सर पर आसीन है. </p>
<p align="justify">अचानक डॉ अरविंद चौंके जैसे कि एक अच्छा प्यारा सा सपना एकदम उसके चरमोत्कर्ष पर टूट गया हो. जैसे ही उन्हों ने घोषणा की कि खेल खतम पैसा हजम, वापस जाने का समय तो कभी का निकल चुका है तो मेरी हालत उस बच्चे के समान थी जिस का प्यारा सा खिलौना दुकानदार ने वापस खीच लिया हो. अरविंद जी को क्या दोष देता. भलामानुस ३००० किलोमीटर दूर से आया, घर आया, समय बिताया, इससे अधिक मैं उन से क्या मांग सकता था.</p>
<p align="justify">लाइब्रेरी से निकल हम दोनों निचली मंजिल पहुंचे तो मेरी पत्नी एक लिफाफा लिये खडी थीं, ३००० किलोमीटर दूर एक अन्य नारी एवं उनके बच्चों को अपना प्यार जताने के लिये. यह है नैसर्गिक प्यार जहां स्नेह दिखाने के लिये कोई दबाव नहीं है, बल्कि जो स्नेह एक बिनदेखी नारी से मिला उसे उसी तरह वापस अभिव्यक्त किया गया. जब जब किसी को लगता है कि दोचार चिट्ठापिस्सू चिट्ठाजगत को कलुषित कर रहे हैं तब तब जरा सोच कर देखें कि चिट्ठाजगत के इस तरह के सकारात्मक पहलू कितने कितने हैं. </p>
<p align="justify">आखिर विदा कह कर अरविद जी हम को दुखी मन के साथ छोड गये कि आपस में बिताये गये थोडे से घंटे जितने थे उससे भी बहुत कम लगे! ईश्वर करे के वे जल्द ही केरल पुन: तशरीफ लायें.</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>संडास या मोबाईल फोन!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2649</link>
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		<pubDate>Fri, 23 Apr 2010 06:28:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह सुबह एक अंग्रेजी चिट्ठे पर एक विदेशी की टिप्पणी दिखी कि सन २०१० में हिन्दुस्तान में जितने संडास हैं उनसे अधिक मोबाईल फोन हैं. इस खबर पर कई लोगों ने काफी चुटकी ली एवं कई लोगों ने हंसी की तो मैं ने एकदम टिप्पणी की “क्या आप लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तान [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज सुबह सुबह एक अंग्रेजी चिट्ठे पर एक विदेशी की टिप्पणी दिखी कि सन २०१० में हिन्दुस्तान में जितने संडास हैं उनसे अधिक मोबाईल फोन हैं. इस खबर पर कई लोगों ने काफी चुटकी ली एवं कई लोगों ने हंसी की तो मैं ने एकदम टिप्पणी की “क्या आप लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तान में लोग जान बूझकर संडास बनाने से किनारा करते हैं”. </p>
<p align="justify">मैं ने कुछ और भी बातें लिखीं जिसका असर यह हुआ कि मूल टिप्पणी जिसने की थी उसने तुरंत एक माफीनामा मुझे भेजा और उस पूरी चर्चा को हटा दिया. उसके स्थान पर मेरी टिप्पणी छाप दी कि “यदि मोबाईल जिस कीमत में खरीदा जा सकता है उस कीमत में संडास बनाने की सहूलियत होती तो आज हर हिन्दुस्तानी के पीछे कम से कम दो संडास होते”. मुझे खुशी है कि मेरी बात उन लोगों को समझ में आ गई.</p>
<p align="justify">समस्या यह है कि हिन्दुस्तान के विरुद्ध कोई भी देशीविदेशी व्यक्ति कोई टिप्पणी करता है तो उसका विश्लेषण करने के बदले हम लोग तुरंत उस बात को मान लेते हैं. फलस्वरूप निराशाजनक नजरिया आगे बढता जाता है. निम्न कथन जरा देखें:</p>
<ol>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानी लोग सुधर नहीं सकते</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानी लोग सुधरना नहीं चाहते</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तान में उन्नति इसलिये नहीं हो रही कि जनता विकास नहीं चाहती</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानियों को भ्रष्टाचार की आदत लग गई है</div>
</li>
</ol>
<p align="justify">सवाल यह है कि यदि भारत का असली स्वरूप हमेशा ऐसा रहा है क्या. यदि नहीं तो हम लोग क्यों ऐसे प्रस्तावों को चुपचाप मान लेते हैं?</p>
<p align="justify">दर असल जो देश सोने की चिडिया था वह २५०० साल तक नुचतापिटता और लुटता रहा, तब कहीं इस स्थिति में पहुंचा है. देश १९४७ में आजाद हुआ तो हर तरह से कंगाल था. लेकिन जिन लोगों ने पिचली ६ दशाब्दियों में हुए बदलाव को देखा है वे जानते हैं कि एक देश जिसके करोडों वासियों को मुगलों ने और अंत में अंग्रेजों ने नंगा करके छोडा था, वह पुन: एक विश्व शक्ति बनता जा रहा है. २५०० साल की लूट को ६० साल में काफी हद तक वापस पा लेना अपने आप में एक अद्भुत कार्य है.</p>
<p align="justify">यदि आप और मैं जीजान से और देशभक्ति के साथ लगे रहें तो सन २०२५ तक हम निश्चित रूप से एक महाशक्ति बन जायेंगे और २०५० तक वापस सोने की चिडिया बन जायेंगे.</p>
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		<title>क्या एक भी हिंदी प्रोग्रामर नहीं है हिंदीप्रेमी?</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Apr 2010 10:25:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[सारथी के मित्रों ने नोट किया होगा कि पिछले दिनों मेरी चिट्ठावापसी के समय से मैं हिंदी में लिखते समय काफी संघर्ष कर रहा हूँ. दर असल नियमित रूप लिखने कि बड़ी इच्छा है लेकिन जब से संगणक पर विंडोज ७ का प्रयोग चालू कर दिया है तब से सारे के सारे यूनिकोड हिंदी औजार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सारथी के मित्रों ने नोट किया होगा कि पिछले दिनों मेरी चिट्ठावापसी के समय से मैं हिंदी में लिखते समय काफी संघर्ष कर रहा हूँ. दर असल नियमित रूप लिखने कि बड़ी इच्छा है लेकिन जब से संगणक पर विंडोज ७ का प्रयोग चालू कर दिया है तब से सारे के सारे यूनिकोड हिंदी औजार बेकार हो गए हैं. गूगल का औजार चल रहा है लेकिन वह इतना मनमौजी ही कि अंग्रेजी और हिंदी में किसी तरह का तालमेल नहीं है और अनुमान से टंकण करना पड रहा है. </p>
<p>अब उपर प्रयुक्त “टंकण” शब्द को ही ले लीजिए. कम से कम चार विभिन्न तरह से टंकण करने पर ही टंकण छाप सका. हर बार सिर्फ तमकन या टंकन छप रहा था. चार गुना समय देने पर एकाध आलेख तय्यार हो पा रहा है.</p>
<p>अंग्रेजी में एक धुन्धो, (ढूंढो) तो बिसीयोम (बीसियों) शब्द संसाधक मिल जाते हैं. क्या बात है की (कि)&#160; हिंदी में ऐसा नहीं हो पा रहा है. इसका कोई हल नहीं है क्या? क्या कोई प्रोग्रामर इसका हल नहीं निकल सकता क्या?</p>
<p>सारथी चिट्ठा इस कार्य के&#160; लिए आर्थिक सहयोग करने के लिए तय्यार है.</p>
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