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	<title>सारथी</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2009 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>क्या हम कभी सुधरेंगे?</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Jul 2010 07:16:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[पापी पेट का चक्कर कुछ ऐसा चला कि चिट्ठाकारी करना भूल गया. लेकिन चिट्ठाकारी नहीं भूला. इस बीच हिन्दी शब्द संसाधक ने ऐसा चक्कर चलाया कि कुछ पूछिये मत. अब सब कुछ लगभग सामान्य दिखने लगा है. इन दिनों सारथी पर लिख नहीं रहा था, लेकिन चिट्ठों को पढता जरूर था. कई बार बडी कुंठा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पापी पेट का चक्कर कुछ ऐसा चला कि चिट्ठाकारी करना भूल गया. लेकिन चिट्ठाकारी नहीं भूला. इस बीच हिन्दी शब्द संसाधक ने ऐसा चक्कर चलाया कि कुछ पूछिये मत. अब सब कुछ लगभग सामान्य दिखने लगा है.</p>
<p align="justify">इन दिनों सारथी पर लिख नहीं रहा था, लेकिन चिट्ठों को पढता जरूर था. कई बार बडी कुंठा होती थी कि क्या इतिहास से हम कुछ सीख पायेंगे. मेरे इतिहास के शिक्षक तो सब बहुत गडबड किस्म के थे, और इतिहास के प्रति जो प्रेम हो सकता है उसे एकाध पाठ पढाते ही “झाड” कर अलग कर देते थे. कुल मिला कर कहा जाये तो शालेय इतिहास की शिक्षा इतिहास के विरुद्ध एक तावीज/गंडा विद्यार्थी के मन में बांध देता है. ऐसा कम से कम मेरे साथ और मेरे कई मित्रों के साथ हुआ. आगे जाकर धर्मविज्ञान की शिक्षा ली तो पाया कि वहां भी इतिहास के अध्यापन/अध्ययन की स्थिति इतनी ही बदतर है. </p>
<p align="justify">दर असल इतिहास एक गजब का विषय है. शायद अनुभव और इतिहास मनुष्य के सबसे बडे शिक्षक हैं. लेकिन इतिहास के आस्वादन से वंचित हम में से अधिकतर लोग इतिहास से कुछ भी नहीं सीख&#160; पाते हैं. अब भारत का इतिहास ही ले लीजिये. पिछले ५००० साल का इतिहास इस बात को एकदम स्पष्ट बताता है कि देश के विकास के लिये क्या उचित है और क्या अनुचित है. लेकिन इतिहास के आस्वादन से वंचित हम लोग शायद कभी ये बातें न सीख पायेंगे और पीढी दर पीढी गुलाम ही बने रहेंगे. कल अंग्रेंजों के गुलाम थे, आज उनके व्यापारिक हितों के गुलाम हैं. </p>
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		<title>राजनीति और आम जीवन!</title>
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		<pubDate>Wed, 05 May 2010 07:19:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेशनीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/05/SitholiHotel2.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Dr. Johnson C. Philip, Shastri JC Philip" border="0" alt="Dr. Johnson C. Philip, Shastri JC Philip" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/05/SitholiHotel_thumb2.jpg" width="120" height="123" /></a> जब देश आजाद हुआ था तब देश का भरणपालन अधिकतर आदर्शवादियों के हाथ में था. इस कारण जो देश २५०० साल से लुटतापिटता आया था उसे बहुत ही सावधानी से देश की विदेशनीति बनाई गई, आर्थिक नीति बनाई गई, हर चीज को उस तरह से नियंत्रण में रखा गया जैसे एक मां बडी समझदारी से पिताजी की सीमित आय से परिवार का खर्चा चलाती है. </p>
<p align="justify">ऐसे परिवारों में मां जो कुछ करती है उसे एक दो लोग समझते हैं, लेकिन कुछ बच्चे हमेशा शिकायत करते रहते हैं कि उनको पडोसी के बच्चों के समान यह नहीं मिला या वह नहीं मिला. उनको इस बात से कुछ लेना देना नहीं है कि घर की आर्थिक स्थिति क्या है. उनको इस बात से भी कुछ लेनादेना नहीं है कि उन्हीं की खातिर मां यह सब सह रही है क्योंकि बच्चे तो सिर्फ खर्चा बढाते हैं उसमें कोई योगदान नहीं देते हैं.</p>
<p align="justify">चाहे नेहरू ने राज किया हो या इंदिरा ने, मुझे उनके राजनैतिक झुकाव से कोई मतलब नहीं है. लेकिन इतना जरूर है उन लोगों ने जो आर्थिकसामरिक ढांचा ढाला, और जिसे राजीव गांधी और अटल जी ने आगे बढाया उस कारण आज ६० साल में हम ऐसी स्थिति में पहुंच गये हैं जो मैं ने अपने बचपन में (१९५४ से आगे) देखा था उस से १०० गुना बेहतर है. उस समय एक टेलीफोन कनेक्शन के लिये १० साल इंतजार करना पडता था, वेस्पा स्कूटर के लिये भी १० साल का ही इंतजार था. खानपान की सामग्री का इतना अभाव था कि घरपार्टियों में लोग भोजन पर गिद्ध के समान टूट पडते थे और घर ले जाने के लिये (दूसरों की नजर बचा कर) थैले में जो डाल लेते थे वह अलग होता था. एक प्लास्टिक के लिफाफे के लिये कपडे की दुकान पर अनुनयविनय करते थे. एक हाथघडी या रेडियो मरम्मत के लिये देते थे तो इस बात का खुटका लगा रहता था कि उस में से क्या क्या “खीच” लिया जायगा.</p>
<p align="justify">ताज्जुब है कि जो देश २५०० साल तक नोचाखसोटा गया, और जिसकी आजादी के समय जो जनसंख्या थी उसे से अब ढाई गुनी हो जाने के बावजूद, ६० साल में जीवन की लगभग हर तरह की सुविधा उपलब्ध हो गई है. जो कुछ अभी तक नहीं हो पाया है उसे जरा क्षण भर के लिये अलग रख दें. उसके बदले जरा यह सोचें कि महज ६० साल में कितना कुछ हम ने वापस पा लिया है. इस आधार पर अगले आलेख में मैं कुछ कहना चाहूंगा.</p>
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		<title>एक बिजली, लाखों का नुक्सान!</title>
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		<pubDate>Tue, 04 May 2010 16:50:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके. सालों पहले जब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके.</p>
<p>सालों पहले जब ग्वालियर से कोच्चि आकर बसा तो यहां की साल में १६५ दिन की बारिश मेरे लिये अजूबा थी. झंझट भी था. लेकिन जब धर्मपत्नी ने पहली बारिश के समय टोका कि बरसात के समय दूरभाष का प्रयोग न करूं, संगणक आदि बंद कर दूं, तो लगा कि वे मजाक कर रही हैं. लेकिन उसी हफ्ते जब मेरे पडोसी के पेड पर बिजली गिरी तो कान पकड लिये.</p>
<p>अगली बरसात के मौसम में दौड कर संगणक बंद करते करते मेरे सामने ही मेरा मॉडम जल गया. प्रभु की दया से केबल को हाथ लगाने के पहले ऐसा हो गया, वर्ना ३०,००० वोल्ट बिजली मेरे बदन से होकर गुजरती तो पता नहीं क्या खाक बचता. इसके अगले साल हम लोग खिडकी से बारिश देख रहे थे कि हमारे आंगने में लगे नारियल पर बिजली गिरी और दस मिनिट में उसका सिर्फ ठूंठ बचा रहा.</p>
<p>इसके कुछ सालों बाद इस इलाके में बीएसएनएल वालों का टावर लग गया और बिजली को उसका तडित-चालक खीचने लगा. हम लोगों ने चैन की सांस ली. लेकिन पिछले हफ्ते जो बिजली गिरी तो लगभग १ मिनिट तक आवाज आती रही और धरती कांप गई. पता चला कि केबिल द्वारा इंटरनेट प्रदान करने वाली दोनों कंपनियों का लाखों रुपये की मशीनें जल गईं. हफ्ते भर जालसंपर्क टूटा रहा. अब जुडा तो ५ मिनिट जाल लग जाता है तो अगले ५५ मिनिट मैं निराश बैठा रहता हूं.</p>
<p>एक बिजली, लेकिन क्या क्या गुल खिला गई इस बार.</p>
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		<title>बनारस का बुद्धिजीवी फरिश्ता!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2655</link>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 03:14:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू &#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन &#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण -८) में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" border="0" alt="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind_thumb.jpg" width="240" height="160" /></a> मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू <a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">-८</a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">)</a> में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज ७ की तकनीकी समस्या के कारण अभी तक पेश नहीं कर पाया था. आज सुबह हिन्दीटंकण की समस्या हल हुई तो लगा अब इस “महामिलन” के बारे में लिखने का समय आ गया है.</p>
<p align="justify">दर असल डा अरविंद मिश्रा मेरे इष्ट चिट्ठाकारों में से एक हैं. उनका वैज्ञानिक लेख गजब का होता है, और मैं उनको नियमित रूप से पढता हूं. वैचारिक विषयों पर भी उनके आलेख पाठक को चिंतन के लिये प्रेरित करते हैं अत: उनके वैचारिक आलेख भी काफी रुचि से पढता हूँ. चिट्ठाजगत के एकाध चिट्ठा-पिस्सुओं को उनके वैज्ञानिक आलेखों से बढी तकलीफ होती है, और उनके कहे को तोडमरोड कर पेश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अरविंद जी ने आज तक जम कर उनका सामना किया है. इन सब कारणों से मैं उनका बडा भक्त हूँ और उनसे मुलाकात के लिये एक एक पल काटना मुश्किल हो गया था.</p>
<p align="justify">लेकिन वैज्ञानिक ठहरे वैज्ञानिक. वे कहां हम धरतीधारियों के टाईमटेबल से चलते हैं. (सुनते हैं कि बिजली के बल्ब के अविष्कारक थामस एडिसन ने तो शादी के एक हफ्ते के बात अपनी श्रीमती जी को अपने पास देख टोक दिया था कि देवी आप कौन हैं और क्यों मेरे आसापास घूम&#160; रही हैं). खैर डॉ अरविंद ने अंत में चलभाष पर खबर की कि वे शहर के दूसरे कोने में पहुंच चुके हैं और हमारी कुटिया/आश्रम में सशरीर तशरीफ लाना चाहते&#160; हैं. बडा सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके व्यस्त कार्यक्रम के बीच १४ किलोमीटर दूर मुझ से मिलने के लिये वे खुद आना चाहते थे.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="Temple" border="0" alt="Temple" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple_thumb.jpg" width="440" height="304" /></a> </p>
<p align="center"><font color="#0000f2">चित्र को बडा करके देखने के लिये मंदिर के चित्र पर चटका लगाईये</font></p>
<p align="justify">शास्त्रीधाम तक पहुंचना बहुत आसान है. वामन अवतार के लिये प्रसिद्ध त्रिक्ककरा मंदिर के बगल में ही है शास्त्रीधाम. (चित्र ऊपर संलग्न है. किलका कर बडा चित्र देख लें). बस उनको बता दिया के आटोवाले को मंदिर का नाम बता दे और उसके सामने उतर लें. यह वही प्रसिद्ध मंदिर है जो ओणम त्योहार का कारण है. (हर ओणम पर त्योहार मनाने के लिये पहला दान मेरे घर से लिया जाता है, लेकिन केरल के नियमों के अंतर्गत मैं इसमें प्रवेश नहीं कर सकता).&#160; ऑटो समय पर आ गया और अलिंगन के साथ स्वागत कर मैं उनको अपने घर ले गया.</p>
<p align="justify">ऐसा लगता था कि हम दशाब्दियों से एक दूसरे को जानते थे. आपस में बातचीत जो शुरू हुई तो चिट्ठाजगत से लेकर प्राचीन-भारत तक और सौन्दर्यशास्त्र से लेकर दर्शन तक की चर्चा बडे ही अनायास हुई. बातचीत के लिये हम दोनों में से किसी ने कोई एजेंडा सोच नही रखा था, लेकिन जब आपसी स्नेह होता है तो कब शब्दों की कमी पडी है और कब पूर्व-योजना की जरूरत पडी है.&#160; खानपान के बीच उन्होंने अपने परिवारजनों द्वारा भेजी गई कुच चीजें मेरी श्रीमतीजी को भेंट कीं तो वे भौचक्की रह गईं. उनके लिये अनजान लोगों के स्नेह की निशानी देख वे एकदम अवाक-मूक रह गईं. </p>
<p align="justify">खानपान के बाद हम लोग ऊपर की मंजिल के मेरे सिंहासन-कक्ष (लाईब्रेरी) में चले गये. मेरे अनुरोध पर डॉ अरविंद ने वाकई में मेरा “सिंहासन” ग्रहण कर लिया. हर ओर किताबें ही किताबें. उन्होंने बहुत पसंद किया. मुझे बताना पडा कि ये सिर्फ २००० ग्रंथ&#160; हैं. मेरा संकलन ३०,००० पुस्तकों का था जिन में से १०,००० के हिसाब से दो संस्थाओं को (जिन में मैं प्राचार्य रहा था) और ८,००० अपने मित्रों को बांट दिये हैं.&#160; फिर मैं ने अपने सिक्कों के कुछ नमूने उनको दिखाये और भारतीय सिक्काशास्त्र के बारें कुछ दिलचस्प बातें बताईं. पुन: विभिन्न विषयों पर चर्चा का दौर चला तो पता न चला कि समय कैसे बीत गया.</p>
<p align="justify">डॉ अरविंद एक सुलझे हुए चिंतक हैं को कई विषयों में दखल रखते हैं. हर विषय पर उनकी एक निश्चित सोचीसमझी राय है. ऐसे व्यक्ति से घंटों बात की जा सकती है और हर पल ऐसा लगता है जैसे आप किसी विश्वविद्यालय के अनुभवी अध्यापक की ऐसी कक्षा में बैठे हों जहां ज्ञान अनवरत बांटा जा रहा है लेकिन जहां परीक्षा का कोई डर नहीं है. एक जिज्ञासु विद्यार्थी के समान मैं बैठकर ज्ञानपान करता रहा. एकाध बार विपरीत विचार रखे तो शहद के छत्ते से और अधिक सोमवर्षा हुई. कुल मिला कर यह ऐसी एक अनुभूति थी जिस में डूब कर मुझे पता ही न चला कि समय जैसी भी कोई बला हम दोनों के सर पर आसीन है. </p>
<p align="justify">अचानक डॉ अरविंद चौंके जैसे कि एक अच्छा प्यारा सा सपना एकदम उसके चरमोत्कर्ष पर टूट गया हो. जैसे ही उन्हों ने घोषणा की कि खेल खतम पैसा हजम, वापस जाने का समय तो कभी का निकल चुका है तो मेरी हालत उस बच्चे के समान थी जिस का प्यारा सा खिलौना दुकानदार ने वापस खीच लिया हो. अरविंद जी को क्या दोष देता. भलामानुस ३००० किलोमीटर दूर से आया, घर आया, समय बिताया, इससे अधिक मैं उन से क्या मांग सकता था.</p>
<p align="justify">लाइब्रेरी से निकल हम दोनों निचली मंजिल पहुंचे तो मेरी पत्नी एक लिफाफा लिये खडी थीं, ३००० किलोमीटर दूर एक अन्य नारी एवं उनके बच्चों को अपना प्यार जताने के लिये. यह है नैसर्गिक प्यार जहां स्नेह दिखाने के लिये कोई दबाव नहीं है, बल्कि जो स्नेह एक बिनदेखी नारी से मिला उसे उसी तरह वापस अभिव्यक्त किया गया. जब जब किसी को लगता है कि दोचार चिट्ठापिस्सू चिट्ठाजगत को कलुषित कर रहे हैं तब तब जरा सोच कर देखें कि चिट्ठाजगत के इस तरह के सकारात्मक पहलू कितने कितने हैं. </p>
<p align="justify">आखिर विदा कह कर अरविद जी हम को दुखी मन के साथ छोड गये कि आपस में बिताये गये थोडे से घंटे जितने थे उससे भी बहुत कम लगे! ईश्वर करे के वे जल्द ही केरल पुन: तशरीफ लायें.</p>
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		<title>संडास या मोबाईल फोन!</title>
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		<pubDate>Fri, 23 Apr 2010 06:28:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[आज सुबह सुबह एक अंग्रेजी चिट्ठे पर एक विदेशी की टिप्पणी दिखी कि सन २०१० में हिन्दुस्तान में जितने संडास हैं उनसे अधिक मोबाईल फोन हैं. इस खबर पर कई लोगों ने काफी चुटकी ली एवं कई लोगों ने हंसी की तो मैं ने एकदम टिप्पणी की “क्या आप लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तान [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज सुबह सुबह एक अंग्रेजी चिट्ठे पर एक विदेशी की टिप्पणी दिखी कि सन २०१० में हिन्दुस्तान में जितने संडास हैं उनसे अधिक मोबाईल फोन हैं. इस खबर पर कई लोगों ने काफी चुटकी ली एवं कई लोगों ने हंसी की तो मैं ने एकदम टिप्पणी की “क्या आप लोगों को लगता है कि हिन्दुस्तान में लोग जान बूझकर संडास बनाने से किनारा करते हैं”. </p>
<p align="justify">मैं ने कुछ और भी बातें लिखीं जिसका असर यह हुआ कि मूल टिप्पणी जिसने की थी उसने तुरंत एक माफीनामा मुझे भेजा और उस पूरी चर्चा को हटा दिया. उसके स्थान पर मेरी टिप्पणी छाप दी कि “यदि मोबाईल जिस कीमत में खरीदा जा सकता है उस कीमत में संडास बनाने की सहूलियत होती तो आज हर हिन्दुस्तानी के पीछे कम से कम दो संडास होते”. मुझे खुशी है कि मेरी बात उन लोगों को समझ में आ गई.</p>
<p align="justify">समस्या यह है कि हिन्दुस्तान के विरुद्ध कोई भी देशीविदेशी व्यक्ति कोई टिप्पणी करता है तो उसका विश्लेषण करने के बदले हम लोग तुरंत उस बात को मान लेते हैं. फलस्वरूप निराशाजनक नजरिया आगे बढता जाता है. निम्न कथन जरा देखें:</p>
<ol>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानी लोग सुधर नहीं सकते</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानी लोग सुधरना नहीं चाहते</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तान में उन्नति इसलिये नहीं हो रही कि जनता विकास नहीं चाहती</div>
</li>
<li>
<div align="justify">हिन्दुस्तानियों को भ्रष्टाचार की आदत लग गई है</div>
</li>
</ol>
<p align="justify">सवाल यह है कि यदि भारत का असली स्वरूप हमेशा ऐसा रहा है क्या. यदि नहीं तो हम लोग क्यों ऐसे प्रस्तावों को चुपचाप मान लेते हैं?</p>
<p align="justify">दर असल जो देश सोने की चिडिया था वह २५०० साल तक नुचतापिटता और लुटता रहा, तब कहीं इस स्थिति में पहुंचा है. देश १९४७ में आजाद हुआ तो हर तरह से कंगाल था. लेकिन जिन लोगों ने पिचली ६ दशाब्दियों में हुए बदलाव को देखा है वे जानते हैं कि एक देश जिसके करोडों वासियों को मुगलों ने और अंत में अंग्रेजों ने नंगा करके छोडा था, वह पुन: एक विश्व शक्ति बनता जा रहा है. २५०० साल की लूट को ६० साल में काफी हद तक वापस पा लेना अपने आप में एक अद्भुत कार्य है.</p>
<p align="justify">यदि आप और मैं जीजान से और देशभक्ति के साथ लगे रहें तो सन २०२५ तक हम निश्चित रूप से एक महाशक्ति बन जायेंगे और २०५० तक वापस सोने की चिडिया बन जायेंगे.</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>क्या एक भी हिंदी प्रोग्रामर नहीं है हिंदीप्रेमी?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2647</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2647#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 19 Apr 2010 10:25:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[सारथी के मित्रों ने नोट किया होगा कि पिछले दिनों मेरी चिट्ठावापसी के समय से मैं हिंदी में लिखते समय काफी संघर्ष कर रहा हूँ. दर असल नियमित रूप लिखने कि बड़ी इच्छा है लेकिन जब से संगणक पर विंडोज ७ का प्रयोग चालू कर दिया है तब से सारे के सारे यूनिकोड हिंदी औजार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सारथी के मित्रों ने नोट किया होगा कि पिछले दिनों मेरी चिट्ठावापसी के समय से मैं हिंदी में लिखते समय काफी संघर्ष कर रहा हूँ. दर असल नियमित रूप लिखने कि बड़ी इच्छा है लेकिन जब से संगणक पर विंडोज ७ का प्रयोग चालू कर दिया है तब से सारे के सारे यूनिकोड हिंदी औजार बेकार हो गए हैं. गूगल का औजार चल रहा है लेकिन वह इतना मनमौजी ही कि अंग्रेजी और हिंदी में किसी तरह का तालमेल नहीं है और अनुमान से टंकण करना पड रहा है. </p>
<p>अब उपर प्रयुक्त “टंकण” शब्द को ही ले लीजिए. कम से कम चार विभिन्न तरह से टंकण करने पर ही टंकण छाप सका. हर बार सिर्फ तमकन या टंकन छप रहा था. चार गुना समय देने पर एकाध आलेख तय्यार हो पा रहा है.</p>
<p>अंग्रेजी में एक धुन्धो, (ढूंढो) तो बिसीयोम (बीसियों) शब्द संसाधक मिल जाते हैं. क्या बात है की (कि)&#160; हिंदी में ऐसा नहीं हो पा रहा है. इसका कोई हल नहीं है क्या? क्या कोई प्रोग्रामर इसका हल नहीं निकल सकता क्या?</p>
<p>सारथी चिट्ठा इस कार्य के&#160; लिए आर्थिक सहयोग करने के लिए तय्यार है.</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>जालियांवाला बाग हत्याकांड!!</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Apr 2010 11:24:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले तीन हफ्तों से रोज सुबह ५ को दौड शुरू होती है और रात को ९ बजे खतम होती है. इस चक्कर में चिट्ठाकारी और अन्य सब कुछ पीछे रह जाता है. लेकिन कल जब बेटे के चिट्ठे पर पढ़ा कि कल जालियांवाला हत्याकांड का दिवस था तो मन एक दम से दर्द से भर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले तीन हफ्तों से रोज सुबह ५ को दौड शुरू होती है और रात को ९ बजे खतम होती है. इस चक्कर में चिट्ठाकारी और अन्य सब कुछ पीछे रह जाता है. लेकिन कल जब बेटे के चिट्ठे पर पढ़ा कि कल जालियांवाला हत्याकांड का दिवस था तो मन एक दम से दर्द से भर गया.</p>
<p>यह हत्याकांड ब्रिटिश बर्बरता का एक नंगा उदाहरण है. ब्रिटिश लुटेरे इस देश का कल्याण करने नहीं आये थे, बल्कि सोने कि चिड़िया हिंदुस्तान को लूटने के लिए आये थे. उन में से एक न्यून पक्ष हिन्दुस्तानियों का हितैषी था, लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ पैसा बनाने के लिए आते थे. लेकिन जब देश में आजादी की मांग होने लगी तो वे बेचैन हो गए. सोने की चिडिया हाथ से निकली जा रही थी. इस बीच प्रथम विश्व युद्ध आया तो उनको लगा कि अब हिनुस्तानी लोग उनके हाथ से निकल जायेंगे. लेकिन भारतीयों ने प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों हर तरह से मदद कि क्योंकि इसके बदले उन्होंने हिंदुस्तान को आजाद करने का वाचन दिया था. </p>
<p>प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग ४३,००० हिन्दुस्तानी लोग अंग्रेजों के लिये शहीद हो गए. लेकिन सोने कि चिड़िया को कौन आजाद करता है. अंग्रेज अपने वादे से मुकर गए. देश में इस कारण हर और असंतोष फैल गया. आजादी के लिए हर और कोशिश होने लगी. अप्रेल १३, १९१९ को अमृतसर के जालियांवाला बाग में काफी सारे लोग एक शांत सभा के लिए एकत्रित हुए. सभा के आरम्भ होने के लगभग एक घंटे बाद जनरल डायर लगभग ९० सैनिकों के साथ वहां पहुंचा. ५० के पास रायफल थे. बिना सूचना के गोली चलने का आदेश दिया गया. 1,650 गोले दागे गए और गोली दागना सिर्फ तब रोका गया जब लगभग सारी गोलियां खत्म हो गईं.&#160; </p>
<p>कम से कम १००० लोग वहीं पर तडप तडप कर खतम हो गए. कम से कम ५०० लोग बुरी तरह घायल हो गए. उन लोगों ने मेरीआपकी खातिर अपना जीवन दान किया. लेकिन हम लोग ऐसे जीते हैं जैसे आजादी खैरात में मिली हो. </p>
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		<title>टेलिफोन विभाग को यह क्या हो गया?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2644</link>
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		<pubDate>Tue, 30 Mar 2010 16:54:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[मुझे अकसर टेलिफोन का पैसा चुकाने में देर हो जाती है और फाईन देना पड जाता है। लेकिन आज तो गजब हो गया। धर्मपत्नी ने याद दिलाया कि इस बार भी देर हो गई है। यहां विश्वविद्यालय में ही टेलिफोन विभाग का अच्छाखासा दफ्तर है लेकिन वे लोग सिर्फ 2 बजे तक पैसा लेते हैं। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मुझे अकसर टेलिफोन का पैसा चुकाने में देर हो जाती है और फाईन देना पड जाता है। लेकिन आज तो गजब हो गया।</p>
<p align="justify">धर्मपत्नी ने याद दिलाया कि इस बार भी देर हो गई है। यहां विश्वविद्यालय में ही टेलिफोन विभाग का अच्छाखासा दफ्तर है लेकिन वे लोग सिर्फ 2 बजे तक पैसा लेते हैं। इतना ही नहीं, तारीख निकल जाने के बाद फाईन के साथ पैसा नहीं लेते बल्कि उसके लिये ग्राहक को शहरी दफ्तर की ओर (6 किलोमीटर दूर) बेरूखी से रवाना कर दिया जाता है। लेकिन जब धर्मपत्नी ने बताया कि अब तो तो पांच बजे तक पैसे लिये जाते हैं और हर तरह का पैसा स्वीकार किया जाता है तो आज अनमने भाव से मैं भरी दोपहरी के 3 बजे अपने पास के कार्यालय पहुंचा। </p>
<p align="justify">दो महीने का, फाईन मिला कर, कुल 1230 रुपये का बिल था।&#160; 1200 रुपये टिकाने के बाद मैं ने तीस रुपये और बढाये तो बहुत ही मुस्कराते हुए उस ने और पास बैठे चपरासी ने एकदम से टोका कि ये 30 रुपये काहे के हैं। मैं ने जब कहा कि 1230 रुपये होते हैं तो दोनों ने हें हें करते हुए कहा “अरे साहब क्या फाईन। उसकी कोई जरूरत नहीं है” और 1199 का सही बिल बना कर 1 रुपया वापस कर दिया।</p>
<p align="justify">मैं आसमान से गिरा। यह औरत काफी समय से इस दफ्तर में है। बिल चुकाने वालों से आज तक सीधे मूंह उसने बात नहीं की। ग्राहकों से वहां बैठे लोगों का व्यवहार बहुत ही अपमानजनक होता था। लेकिन आज क्या हुआ? </p>
<p align="justify">जब किसी गली में एकाधिकार होता&#160; है तो कुत्ता शेर हो जाता है। लेकिन जब एक से एक कुत्ते उस गली में आ जाते हैं तो शेर बकरी के समान मियामियाने लगता है। आज चलभाष (मोबाईल) इतना सस्ता हो गया है, और विक्रेता इस तरह से ग्राहकों को सुविधा दे रहे हैं कि टेलिफोन विभाग की घिग्गी बंध गई है। इस बीच रिलायेंस, टाटा अदि केरल में इतना उत्तम समानांतर टेलिफोन सेवा देने लगे हैं कि काफी ग्राहक उस ओर खिच रहे हैं।</p>
<p align="justify">अब सब को पता चल गया है कि एकाधिकार नहीं चलेगा। आज से कुछ सालों पहले रेफ्रिजेटर पर एक साल की वारंटी मिलती थी। जब कई कंपनियां बाजार में आ गईं तो वह 7 साल तक का हो गया। वेस्पा स्कूटर के लिये 6 से 8 साल इंतजार करना पडता था। आज स्कूटर/मोटरसाईकिल बेचने वाले आपके घर मिठाई का पेकेट लेकर आते हैं कि भाईसाहब आकर एक गाडी खरीद लीजिये।</p>
<p align="justify">बिजली, पानी, कार स्कूटर आदि पर से परमिट लाईसेंस का राज जिस दिन हट जायगा उस दिन देश में एक विशेष प्रकार की क्रांति आ जायगी। </p>
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		<title>फलों से डर लगता है!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2640</link>
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		<pubDate>Wed, 24 Mar 2010 07:27:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[प्रभु की दया से हम सब लगभग सामान्य लोग हैं। किसी तरह की विकलांगता का अनुभव नहीं करते है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बहुत बडा तबका जो पूर्ण रूप से सामान्य नहीं है उनकी बडी उपेक्षा होती है। मैं ने इस बात को पिछले तीन महीनों में अच्छी तरह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/03/image.png"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="image" border="0" alt="image" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/03/image_thumb.png" width="240" height="178" /></a> प्रभु की दया से हम सब लगभग सामान्य लोग हैं। किसी तरह की विकलांगता का अनुभव नहीं करते है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बहुत बडा तबका जो पूर्ण रूप से सामान्य नहीं है उनकी बडी उपेक्षा होती है। मैं ने इस बात को पिछले तीन महीनों में अच्छी तरह महसूस किया है। </p>
<p align="justify">तीन महीने पहले डाक्टर बेटे ने पहचान लिया कि मुझ में डायबटीज के लक्षण दिखने लगे हैं। बस आननफानन में जांच करवाई और और तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिये। फिलहाल मैं ने सीमा को हल्के से पार किया है लेकिन उसका कहना है कि अब यहीं बने रहने के लिये फलमिठाई, मीठी चाय, ठंडे पेय आदि को एकदम तिलांजली देना जरूरी है। मैं एक अनुशासित व्यक्ति हूं अत: सब कुछ मान लिया। लेकिन अब परेशानी यह है कि किसी के घर जाओ तो न तो चाय पी सकते हैं न मिठाई खा सकते है। सेवचिवडा खाकर कब तक आदमी जी सकता है। </p>
<p align="justify">जीवन की इस विकलांगता के कारण अब मिठाई की दुकान, फलों की दुकान, बिस्कुटटाफी की दुकान आदि को देखते ही डर लगने लगता है। अपनी असहायता पर रोना आता है। लेकिन उसके साथ साथ एक बात और याद आती है – समाज में एक बहुत बडी संख्या में लोग किसी न किसी तरह से विकलांगता का अनुभव करते हैं, लेकिन हम उनको सुविधा मुहैया कराने के नाम पर चुप्पी मार जाते हैं।</p>
<p align="justify">अधिकतर रेल्वे स्टेशनों पर अभी भी व्हीलचेयर को प्लेटफार्म पर चढानेउतारने के लिये अलग से सुविधा नहीं है। एकाध जगह है तो उस की जम कर उपेक्षा होती है। पिछले दिनों आलुवा स्टेशन पर गया तो वहां बाकायदा व्हीलचेयर चढाने के लिये घिसलपट्टी नुमा सुविधा बना रखी है, लेकिन उसके सामने इतने सारे मोटरसाईकिलें खडी कर दी जाती हैं के दस मोटरसाईकिलों को हटाने के बदल व्हीलचेयर को उस पर बैठे विकलाग सहित सीढियों पर उठा कर ले जाना आसान होता है।</p>
<p align="justify">कुछ साल पहले एक नेत्रहीन मित्र ने, और उस के कुछ समय बाद कमर से नीचे लकवे से पीढित व्हीलचेयर आसीन एक मित्र ने, मुझे टोका था कि “तुम सामान्य लोग यह भूल जाते हो कि हम भी मनुष्य हैं। तुम जरा सी सुविधा दे दो तो हम आसमान छू लें”। आज यह बात साफ समझ में आ रही है। [<a href="http://www.flickr.com/search/?q=fruits&amp;l=4" target="_blank">Pic Credit</a>]</p>
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		<title>आज मरते मरते बचे!</title>
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		<pubDate>Mon, 22 Mar 2010 15:41:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[अविस्मरणीय]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे मंझले साढू भाई की बिटिया की शादी तय करने के लिये आज सुबह दो कारों पर हम नौ जने आज सुबह लगभग 150 किलोमीटर की यात्रा पर गये। एलप्पी में नाश्ते के लिये एक जानेमाने हॉटेल में उतरे और आर्डर दिया। हम लोग इंतजार कर रहे थे कि एकदम से खाकी वस्त्रधारी दस बारह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/03/111300836_687a54b79b.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 20px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="111300836_687a54b79b" border="0" alt="111300836_687a54b79b" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/03/111300836_687a54b79b_thumb.jpg" width="240" height="180" /></a> मेरे मंझले साढू भाई की बिटिया की शादी तय करने के लिये आज सुबह दो कारों पर हम नौ जने आज सुबह लगभग 150 किलोमीटर की यात्रा पर गये। एलप्पी में नाश्ते के लिये एक जानेमाने हॉटेल में उतरे और आर्डर दिया। हम लोग इंतजार कर रहे थे कि एकदम से खाकी वस्त्रधारी दस बारह लोग खिडकी के बाहर दौडते और फुर्ती से एक दूसरे को इशारा करते नजर आये।</p>
<p align="justify">हॉटेल से ग्राहक लोग भागते नजर आये। पता चला कि रसोई में गैस के सिलेंडर ने आग पकड ली है। अपने परिवारजनों को बाहर भागने की हिदायत देकर मैं ने रसोई में झांक कर जलती आग, उसे बुझाने में लगे चुस्त दुरुस्त और फुर्तीले खाकीधारी अग्निशामकों को देखा। वे हर काम भाग भाग कर कर रहे थे। इस बीच जब उनको लगा कि अतिरिक्त पानी चाहिये तो इशारा हुआ, चार लोग दौडे और आधे मिनिट में पानी की अगली लाईन काम करने लगी।</p>
<p align="justify">अब जान बचा कर मैं भी बाहर आ गया। 15 मिनिट में आग पर काबू कर लिया गया, सिलेंडर को ठंडा किया गया, टोंटी बंद की गई और वे पाईप वापस खीचने लगे। दस जनों की इस खाकीधारी टोली की अगुवाई एक बिन वर्दी अफसर कर रहा था। उसको जब मैं ने अपना परिचय दिया तो उसने विस्तार से जानकारी दी और बताया कि यह टीम पिछले 23 घंटों से ड्यूटी पर है और यह इस दौरान छटा वाकया है। इन इन 23 घंटों में दो लोगों को डूबते से बचाया, एक घर से अजगर को निकाला, दो वाहन दुर्घट्ना से लोगों को बचाया और अब यह। मैं हैरान हो गया कि इतने भारी काम के बावजूद उनके समर्पण में किसी तरह की कमी नहीं आई थी। </p>
<p align="justify">दो बातें मुझे बहुत अखर गई। इतने जरूरी सेवा के लिये जो गाडियां हैं उनकी हालत सही नहीं थी। न ही पानी के पाईप सही थे। उन में से कई में छेद हो रहे थे और पानी चूता जा रहा था। एक ओर प्रदर्शन के लिये करोडों खर्च किये जा रहे हैं लेकिन दूसरी ओर जरूरी सेवाओं को सुविधा से वंचित रखा जा रहा है।</p>
<p align="justify">क्या आप ने कभी अपने शहर के फायर ब्रिगेड की खोजखबर ली हैं? (<a href="http://www.flickr.com/photos/piccadillywilson/111300836/" target="_blank">Picture</a>)</p>
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		<title>मजदूरी भी, बेईमानी भी!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2634</link>
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		<pubDate>Fri, 19 Mar 2010 16:33:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[कोचिन में हर साल औसतन 165 दिन पानी बरसता है। इन में से कम से कम सौ दिन ऐसी मूसलाधार वर्षा होती है जैसा मैं ने उत्तर भारत में कहीं भी नहीं देखा है। यदि सही तय्यारी न की जाये तो ये 165 दिन सारे केरल को पानी में डुबा सकते हैं। इस कारण मानसून [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कोचिन में हर साल औसतन 165 दिन पानी बरसता है। इन में से कम से कम सौ दिन ऐसी मूसलाधार वर्षा होती है जैसा मैं ने उत्तर भारत में कहीं भी नहीं देखा है। यदि सही तय्यारी न की जाये तो ये 165 दिन सारे केरल को पानी में डुबा सकते हैं। इस कारण मानसून के दो महीने पहले से नालेनालियों की सफाई, मट्टी हटाना आदि चालू हो जाता है। </p>
<p>आज हमारे कालोनी में नगरपालिका वालों ने इस काम के लिये मजदूर लगाये। केरल में एक दिन की मजदूरी (सारे काटपीट के बाद) 300 रुपये के कारीब होती है जो यहां की जीविका के हिसाब से एक अच्छी आय है। इतना ही नहीं इन लोगों को हर साल काम मिलने की गारंटी है क्योंकि पानी हर साल बरसता है और नालेनालियों की सफाई कभी नहीं रुक सकती। लेकिन इसके बावजूद पिछले 15 साल से मैं इनके बीच एक खास प्रकार की बेईमानी देखता&#160; आया हूं।</p>
<p>नालों से निकाली गई मिट्टी को कहीं दूर ले जाकर डालने के बदले वे लोग इसे बहुत ही “क्रमबद्ध” तरीके से नाले के किनारे ही जमा करते जाते हैं। फलस्वरूप पहली बरसात के साथ साथ यह मिट्टी नाले में वापस चली जाती है। अगले साल के लिए नीव पड जाती है। ठेकेदार को भी इस बात की फिकर नहीं रहती कि मिट्टी को कहीं ओर डलवा दिया जाए। उसे तो खानापूरी दिखाने में दिलस्पी है। मिट्टी हटा कर डलवाने जायगा तो खर्चा अधिक जो होगा। सरकारी दफ्तर में बैठे लोगों को इन में से किसी से भी बात से कोई मतलब नहीं होता है। साले का पैसा है, जीजा को ऐश के अलावा कोई फिकर नहीं है। </p>
]]></content:encoded>
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		<title>आज मिली गाली!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2633</link>
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		<pubDate>Wed, 17 Mar 2010 15:24:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[आज के अनुभव पर लिखने की सोच रहा था कि मेरे एक मित्र का चलभाष आया कि सारथी पर अगला आलेख छापने का समय हो गया है। इन्होंने ही दो हफ्ते पहले मुझे नींद से जगाया था, और अब ठान ली है कि सुस्त घोडे को प्यारमनुहार द्वारा उठा चला देना चाहिये। आभार मेरे दोस्त! [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज के अनुभव पर लिखने की सोच रहा था कि मेरे एक मित्र का चलभाष आया कि सारथी पर अगला आलेख छापने का समय हो गया है। इन्होंने ही दो हफ्ते पहले मुझे नींद से जगाया था, और अब ठान ली है कि सुस्त घोडे को प्यारमनुहार द्वारा उठा चला देना चाहिये। आभार मेरे दोस्त!</p>
<p align="justify">आज दोपहर को विश्वविद्यालय डाकघर से वापस आ रहा था कि विद्यार्थीयों का एक झुंड रास्ता रोक कर खडा हो गया। हल्के से हार्न दिया तो उन में से दो लोगों ने मुझे हिन्दी में मांबहन की गाली दी। मैं ने बडी शाति से पूछा कि भैया अपनी मां बहन के साथ जो करने जा रहे हो उसे यहां सबके सामने क्यों एलान कर रहे हो। प्रश्न सुन कर वे दोनों भौंचक्के रह गये। उसके बाद यह सोच कर अचकचा गये कि केरल में किसी ने उन्हें हिन्दी में टोका है।</p>
<p align="justify">उनके साथी लोग उनकी हालात देख कर हंसने लगे।&#160; एकाध ने पूछा कि आप कौन हैं सर। जैसे ही मैं ने “शास्त्री” नाम बताया तो एकाध एकदम मुझे पहचान गये। (सारथी के कुछ भक्त कोचिन विश्वविद्यालय में मौजूद हैं और इस कारण इस नाम को कुछ लोग पहचानते हैं लेकिन मुलाकात कभी नहीं हुई थी)। इस बीच मैं गाडी रोक कर उतर गया तो दोचार ने आकर पैर छूए और माफी मांगी। गाली देने वाले तो पानी पानी हो कर खडे थे ही।</p>
<p align="justify">यह लगभग हम सभी हिन्दुस्तानियों की आदत है कि अपने इलाको छोड कहीं और जाता है और दोचार अपने मिल जाते हैं तो संतुलन बिगड जाता है। उदाहरण के लिये आस्ट्रेलिया की इन दिनों बडी चर्चा चल रही है कि भारतीयों के साथ हिंसा हो रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वे स्थानीय लोगों के साथ कितनी बदतमीजी के साथ पेश आते हैं? मेरी जानपहचान के कम से कम एक दर्जन विद्यार्थी पिछले तीन सालों में वहां गये हैं। उन सब का कहना है कि वे वहां उतने ही सुरक्षित हैं जितने यहां थे। लेकिन हरेक की शिकायत है कि भारतीय विद्यार्थी नौकरी मिलते ही उज्जड्ड एव बदतमीजी से व्यवहार करने लगते हैं।</p>
<p align="justify">चाहे कोचिन हो या आस्ट्रेलिया, अपने सस्कारों को भूलने की कुछ जल्दी हो रही है हमारे जवानों को!</p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>जनतंत्र: हम कभी न सुधरेंगे!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2631</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2631#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 11 Mar 2010 14:47:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[पिछले दिनों महिलाओं के लिये आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह हमारे कई राजनीतिज्ञों ने हिंसा का प्रदर्शन किया उसे देख हम सब को समझ लेना चाहिये कि फिलहाल हम सुधरने वाले नहीं हैं। कारण यह है कि जब जनता-की-सरकार बनती है तब यदि आदर्शों से प्रेरित लोग सत्ता की कुर्सी नहीं सभालते तो फिर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पिछले दिनों महिलाओं के लिये आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह हमारे कई राजनीतिज्ञों ने हिंसा का प्रदर्शन किया उसे देख हम सब को समझ लेना चाहिये कि फिलहाल हम सुधरने वाले नहीं हैं। कारण यह है कि जब जनता-की-सरकार बनती है तब यदि आदर्शों से प्रेरित लोग सत्ता की कुर्सी नहीं सभालते तो फिर उनका हर निर्णय, हर चुनाव, स्वार्थ से प्रेरित होगा।</p>
<p align="justify">आजादी के शुरू के सालों में ऐसे लोग राजनीति में आये और सत्ता की कुर्सी पर बैठे जो आदर्शों से प्रेरित थे, आदर्शों के आधार पर सहीगलत का निर्णय करते थे, एवं उन बातों का समर्थन करते थे जो जनहित एवं देशहित मैं है। उनका अजेंडा ‘अगले’ चुनाव में जीतना नहीं, बल्कि ‘आज’ देश के लिये कुछ करना था। लेकिन 1960 आदि में ऐसे काफी सारे लोग राजनीति में ‘भरती’ हो गये हैं जिनका लक्ष्य देश की भलाई नहीं बल्कि सत्तासुख भोगना एवं मलाई को अपने लिये निकाल लेना है। बाकी सेपरेटा जनता के लिये छोड दिया जाता है। जनता नंगे भूखे रहे उनकी बला से।</p>
<p align="justify">इन लोगों ने बहुत जल्दी ही समझ लिया कि इसका एकमात्र तरीका है फूट डालो, राज करो। इस नीति का प्रयोग अंग्रेज लुटेरों ने 200 साल किया था, अब काले अंग्रेज इसी नीति का पालन कर रहे हैं। इस कारण भाषा, प्रदेश, धर्म, एवं इस तरह के नये नये आधार बना कर फूट डाली जा रही है। वर्ना इतिहास में किस ने कब सुना है कि देश की राजभाषा में शपथ लेने के कारण सत्ताधारियों ने साथी सत्ताधारियों को पीटा। </p>
<p align="justify">जब तक देश में एक नैतिक-धार्मिक नवीकरण नहीं आयगा तब तक फूट बढता रहेगा, मारकाट होती रहेगी, और जिस की लाठी उसका राज वाला हिसाब चलेगा। जो थोडे से आदर्शवादी सत्ता में है वे चाहें तो भी कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि वे हमेशा अल्प संख्या में होंगे जब कि लुटेरे बहुमत में होंगे। बहुमत न हो तो भी वे ऐसा ऊधम और दंगाफसाद करेंगे कि जो लोग कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं वे कान पकड कर अलग हो जायें कि कौन पडे इस पचडे में। </p>
<p align="justify">आज हिन्दी चिट्ठाजगत में जो हो रहा है वह भी सिर्फ इन राष्ट्रीय स्तर की घट्नाओं का एक छोटा सा चित्र मात्र है। </p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>सारथी नाम बदल लें !!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2624</link>
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		<pubDate>Sat, 06 Mar 2010 07:59:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[आज एक इष्ट मित्र ने चलभाष पर बुला कर उलाहना दिया कि कैसे सारथी हो कि कु्छ लिखतेपढते नहीं हो। आभार उस मित्र का जिन्होंने मुझे सोते से जगा दिया। दर असल एक महीने पहले संगणक और आपरेटिंग सिस्टम बदला और विन्डोज 7 का उपयोग करने लगा तो मेरा इष्ट “केफे हिन्दी” गडबड करने लगा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">आज एक इष्ट मित्र ने चलभाष पर बुला कर उलाहना दिया कि कैसे सारथी हो कि कु्छ लिखतेपढते नहीं हो। आभार उस मित्र का जिन्होंने मुझे सोते से जगा दिया। दर असल एक महीने पहले संगणक और आपरेटिंग सिस्टम बदला और विन्डोज 7 का उपयोग करने लगा तो मेरा इष्ट “केफे हिन्दी” गडबड करने लगा था। अनुमान है कि कुछ दिनों में केफे का नया संस्करण आ जायगा। </font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">आज देखा कि काफी सारे लोग </font><a href="http://mithileshdubey.blogspot.com" target="_blank"><font size="2" face="Mangal">मिथिलेश दुबे</font></a><font size="2" face="Mangal"> के पीछे पडे हैं। एक&#160; चिट्ठाचर्चा के बाद सब कोई अब उस पर पिल पडा है। जहां तक चिट्ठाचर्चा की बात है, चर्चा करना तो हरेक का मौलिक अधिकार है। दर असल समस्या चर्चा की नहीं है बल्कि यह है कि अनजाने मिथिलेश ने कुछ लोगों की दुखती रगों को छू लिया है। उन लोगों ने अपने &quot;पैदल&quot; तुम्हारे विरुद्ध चला दिये। बस यह है इस गुरिल्ला युद्ध का मर्म।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">इसका तरीका भी बहुत सीधा सादा है – एकाध हैं जिनको कोई आलेख पसंद न आये तो तुरंत अपने गुर्गों के दूरभाष खनखना देते हैं। बस अपने “उस्ताद” को खुश करने के लिये वे सब (बिना मूल आलेख को पढे ही) उस बेचारे चिट्ठाकार पर पिल पडते हैं। मुझे एक दिलचस्प घटना याद आ रही है जब मैं ने “नारी” विषय पर एक आलेख छापा था। अचानक दोचार महिला चिट्ठाकारों ने (जिन से मेरे काफी पत्र आदान प्रदान होते रहते थे) सारथी पर आकर दनादन अपशब्द लिखना शुरू कर दिया। जब पलट कर मैं ने उन से पूछा कि आप मेरे जिस “कथन” का खंडन कर रही हैं वह मैं ने क सारथी पर कहां लिखा है तो उनकी झक्की खुली। बडी माफी मांगी। बोलीं कि फलां चिट्ठाकारी (चिट्ठाकार का स्त्रीलिंग) ने दूरभाष पर बुला के कहा कि आप ने ऐसा लिखा है अत: उस पर यकीन करके आपका आलेख बिन पढे ही आप के विरुद्ध टिप्पणी कर दी। इसके बाद तो कई चिट्ठामित्रों के दूरभाष मिले उन को भी मेरे विरुद्ध लिखने को कहा गया, लेकिन मेरा आलेख पढने पर उनको वह कथित कथन न मिला। मैं ने उन सब से कहा कि जिस ने आप को दूरभाष पर बुला कर भडकाया उसी से पूछें।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">समस्या यह है कि नंगे से खुदा भी डरता है। चिट्ठाजगत में लिखी कोई बात इनको पसंद न आये तो ये अपने पैदलों के साथ आप के विरोध में&#160; उतर आते हैं। ये पैदल खुद भी इन लोगों से डरते हैं अत: बिन सोचे समझे इन नंगों के कहे के अनुसार चिट्ठाकारों के विरुद्ध टिप्पणी करने लगते हैं।&#160; मिथिलेश जैसे लोगों को लगे रहना चाहिये, लिखते रहना चाहिये। अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई भी लगाम नही लगा सकता।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">डा अरविंद मिश्रा की एक टिप्पणी एक और बात सोचने को मजबूर करती है:</font></p>
<blockquote><p align="justify">मिथिलेश की चिंता और आक्रोश इस मामले में जायज है की इसके पहले तो चिट्ठाचर्चा ने इनकी किसी पोस्ट का जिक्र नहीं किया &#8212; अब क्या केवल चिट्ठाचर्चा मात्र एकल पोस्टों की चर्चा का भंडास निकालने का मंच बन रहा है? जिसे जो भी खुन्नस हो और जिससे भी हो चिट्ठाचर्चा खुला मंच बनता जा रहा है उनके लिए -पहुँचो और भोंपू बजा दो !बढ़िया हैं -लगता है जल्दी ही यहाँ नारियों और नारीवादियों का ही वर्चस्व होगा &#8212; मिथिलेश आदि हवा हवाई हो रहेगें!</p>
</blockquote>
<p align="justify">
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal"></font></p>
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		<title>गूगल विज्ञापन और हिंदी चिट्ठे</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Feb 2010 17:22:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार करता था. </p>
<p align="justify">दोस्तों, आदमी का लालच कई बार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को खत्म कर देती है. गूगल के साथ मामला यही है. किसी ज़माने में गूगल हिन्दीभाषी चिट्ठों को विज्ञापन के लिए स्वीकार करता था, लेकिन चिट्ठाकार भाई लोग जम कर अपने चिट्ठों पर दिख रहे विज्ञापनों परा चटका लगा कर पैसा सूतने लगे. वे भूल गए कि गूगल के हाथ बड़े लम्बे हैं. </p>
<p align="justify">आप जिस संगणक से अपने गूगल विज्ञापन की आय को जांचते हैं उसी आई पी नम्बर से जब क्लिक जाने लगे तो गूगल ने पहचान लिया कि आप खुदा ही दुकानदार और खुद ही ग्राहक का काम कर रहे हैं. अंधा बांटे रेवड़ी, आपन आपन&#160; को देता जाए अंधे के लिए सही है लेकिन गूगल के लिए नहीं.    </p>
<p align="justify">चूँकि कुछ&#160; हिंदी चिट्ठे जम कर ऐसा कर रहे थे, उसकी सजा सबा को मिल रही है. गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है.</p>
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