<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>सारथी</title>
	<atom:link href="http://sarathi.info/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://sarathi.info</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2009 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
	<lastBuildDate>Thu, 11 Mar 2010 14:54:39 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.9.1</generator>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
			<item>
		<title>जनतंत्र: हम कभी न सुधरेंगे!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2631</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2631#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 11 Mar 2010 14:47:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2631</guid>
		<description><![CDATA[पिछले दिनों महिलाओं के लिये आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह हमारे कई राजनीतिज्ञों ने हिंसा का प्रदर्शन किया उसे देख हम सब को समझ लेना चाहिये कि फिलहाल हम सुधरने वाले नहीं हैं। कारण यह है कि जब जनता-की-सरकार बनती है तब यदि आदर्शों से प्रेरित लोग सत्ता की कुर्सी नहीं सभालते तो फिर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">पिछले दिनों महिलाओं के लिये आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह हमारे कई राजनीतिज्ञों ने हिंसा का प्रदर्शन किया उसे देख हम सब को समझ लेना चाहिये कि फिलहाल हम सुधरने वाले नहीं हैं। कारण यह है कि जब जनता-की-सरकार बनती है तब यदि आदर्शों से प्रेरित लोग सत्ता की कुर्सी नहीं सभालते तो फिर उनका हर निर्णय, हर चुनाव, स्वार्थ से प्रेरित होगा।</p>
<p align="justify">आजादी के शुरू के सालों में ऐसे लोग राजनीति में आये और सत्ता की कुर्सी पर बैठे जो आदर्शों से प्रेरित थे, आदर्शों के आधार पर सहीगलत का निर्णय करते थे, एवं उन बातों का समर्थन करते थे जो जनहित एवं देशहित मैं है। उनका अजेंडा ‘अगले’ चुनाव में जीतना नहीं, बल्कि ‘आज’ देश के लिये कुछ करना था। लेकिन 1960 आदि में ऐसे काफी सारे लोग राजनीति में ‘भरती’ हो गये हैं जिनका लक्ष्य देश की भलाई नहीं बल्कि सत्तासुख भोगना एवं मलाई को अपने लिये निकाल लेना है। बाकी सेपरेटा जनता के लिये छोड दिया जाता है। जनता नंगे भूखे रहे उनकी बला से।</p>
<p align="justify">इन लोगों ने बहुत जल्दी ही समझ लिया कि इसका एकमात्र तरीका है फूट डालो, राज करो। इस नीति का प्रयोग अंग्रेज लुटेरों ने 200 साल किया था, अब काले अंग्रेज इसी नीति का पालन कर रहे हैं। इस कारण भाषा, प्रदेश, धर्म, एवं इस तरह के नये नये आधार बना कर फूट डाली जा रही है। वर्ना इतिहास में किस ने कब सुना है कि देश की राजभाषा में शपथ लेने के कारण सत्ताधारियों ने साथी सत्ताधारियों को पीटा। </p>
<p align="justify">जब तक देश में एक नैतिक-धार्मिक नवीकरण नहीं आयगा तब तक फूट बढता रहेगा, मारकाट होती रहेगी, और जिस की लाठी उसका राज वाला हिसाब चलेगा। जो थोडे से आदर्शवादी सत्ता में है वे चाहें तो भी कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि वे हमेशा अल्प संख्या में होंगे जब कि लुटेरे बहुमत में होंगे। बहुमत न हो तो भी वे ऐसा ऊधम और दंगाफसाद करेंगे कि जो लोग कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं वे कान पकड कर अलग हो जायें कि कौन पडे इस पचडे में। </p>
<p align="justify">आज हिन्दी चिट्ठाजगत में जो हो रहा है वह भी सिर्फ इन राष्ट्रीय स्तर की घट्नाओं का एक छोटा सा चित्र मात्र है। </p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2631/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>11</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सारथी नाम बदल लें !!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2624</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2624#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 06 Mar 2010 07:59:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2624</guid>
		<description><![CDATA[आज एक इष्ट मित्र ने चलभाष पर बुला कर उलाहना दिया कि कैसे सारथी हो कि कु्छ लिखतेपढते नहीं हो। आभार उस मित्र का जिन्होंने मुझे सोते से जगा दिया। दर असल एक महीने पहले संगणक और आपरेटिंग सिस्टम बदला और विन्डोज 7 का उपयोग करने लगा तो मेरा इष्ट “केफे हिन्दी” गडबड करने लगा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">आज एक इष्ट मित्र ने चलभाष पर बुला कर उलाहना दिया कि कैसे सारथी हो कि कु्छ लिखतेपढते नहीं हो। आभार उस मित्र का जिन्होंने मुझे सोते से जगा दिया। दर असल एक महीने पहले संगणक और आपरेटिंग सिस्टम बदला और विन्डोज 7 का उपयोग करने लगा तो मेरा इष्ट “केफे हिन्दी” गडबड करने लगा था। अनुमान है कि कुछ दिनों में केफे का नया संस्करण आ जायगा। </font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">आज देखा कि काफी सारे लोग </font><a href="http://mithileshdubey.blogspot.com" target="_blank"><font size="2" face="Mangal">मिथिलेश दुबे</font></a><font size="2" face="Mangal"> के पीछे पडे हैं। एक&#160; चिट्ठाचर्चा के बाद सब कोई अब उस पर पिल पडा है। जहां तक चिट्ठाचर्चा की बात है, चर्चा करना तो हरेक का मौलिक अधिकार है। दर असल समस्या चर्चा की नहीं है बल्कि यह है कि अनजाने मिथिलेश ने कुछ लोगों की दुखती रगों को छू लिया है। उन लोगों ने अपने &quot;पैदल&quot; तुम्हारे विरुद्ध चला दिये। बस यह है इस गुरिल्ला युद्ध का मर्म।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">इसका तरीका भी बहुत सीधा सादा है – एकाध हैं जिनको कोई आलेख पसंद न आये तो तुरंत अपने गुर्गों के दूरभाष खनखना देते हैं। बस अपने “उस्ताद” को खुश करने के लिये वे सब (बिना मूल आलेख को पढे ही) उस बेचारे चिट्ठाकार पर पिल पडते हैं। मुझे एक दिलचस्प घटना याद आ रही है जब मैं ने “नारी” विषय पर एक आलेख छापा था। अचानक दोचार महिला चिट्ठाकारों ने (जिन से मेरे काफी पत्र आदान प्रदान होते रहते थे) सारथी पर आकर दनादन अपशब्द लिखना शुरू कर दिया। जब पलट कर मैं ने उन से पूछा कि आप मेरे जिस “कथन” का खंडन कर रही हैं वह मैं ने क सारथी पर कहां लिखा है तो उनकी झक्की खुली। बडी माफी मांगी। बोलीं कि फलां चिट्ठाकारी (चिट्ठाकार का स्त्रीलिंग) ने दूरभाष पर बुला के कहा कि आप ने ऐसा लिखा है अत: उस पर यकीन करके आपका आलेख बिन पढे ही आप के विरुद्ध टिप्पणी कर दी। इसके बाद तो कई चिट्ठामित्रों के दूरभाष मिले उन को भी मेरे विरुद्ध लिखने को कहा गया, लेकिन मेरा आलेख पढने पर उनको वह कथित कथन न मिला। मैं ने उन सब से कहा कि जिस ने आप को दूरभाष पर बुला कर भडकाया उसी से पूछें।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">समस्या यह है कि नंगे से खुदा भी डरता है। चिट्ठाजगत में लिखी कोई बात इनको पसंद न आये तो ये अपने पैदलों के साथ आप के विरोध में&#160; उतर आते हैं। ये पैदल खुद भी इन लोगों से डरते हैं अत: बिन सोचे समझे इन नंगों के कहे के अनुसार चिट्ठाकारों के विरुद्ध टिप्पणी करने लगते हैं।&#160; मिथिलेश जैसे लोगों को लगे रहना चाहिये, लिखते रहना चाहिये। अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई भी लगाम नही लगा सकता।</font></p>
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal">डा अरविंद मिश्रा की एक टिप्पणी एक और बात सोचने को मजबूर करती है:</font></p>
<blockquote><p align="justify">मिथिलेश की चिंता और आक्रोश इस मामले में जायज है की इसके पहले तो चिट्ठाचर्चा ने इनकी किसी पोस्ट का जिक्र नहीं किया &#8212; अब क्या केवल चिट्ठाचर्चा मात्र एकल पोस्टों की चर्चा का भंडास निकालने का मंच बन रहा है? जिसे जो भी खुन्नस हो और जिससे भी हो चिट्ठाचर्चा खुला मंच बनता जा रहा है उनके लिए -पहुँचो और भोंपू बजा दो !बढ़िया हैं -लगता है जल्दी ही यहाँ नारियों और नारीवादियों का ही वर्चस्व होगा &#8212; मिथिलेश आदि हवा हवाई हो रहेगें!</p>
</blockquote>
<p align="justify">
<p align="justify"><font size="2" face="Mangal"></font></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2624/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>19</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>गूगल विज्ञापन और हिंदी चिट्ठे</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2623</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2623#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 14 Feb 2010 17:22:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2623</guid>
		<description><![CDATA[आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार करता था. </p>
<p align="justify">दोस्तों, आदमी का लालच कई बार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को खत्म कर देती है. गूगल के साथ मामला यही है. किसी ज़माने में गूगल हिन्दीभाषी चिट्ठों को विज्ञापन के लिए स्वीकार करता था, लेकिन चिट्ठाकार भाई लोग जम कर अपने चिट्ठों पर दिख रहे विज्ञापनों परा चटका लगा कर पैसा सूतने लगे. वे भूल गए कि गूगल के हाथ बड़े लम्बे हैं. </p>
<p align="justify">आप जिस संगणक से अपने गूगल विज्ञापन की आय को जांचते हैं उसी आई पी नम्बर से जब क्लिक जाने लगे तो गूगल ने पहचान लिया कि आप खुदा ही दुकानदार और खुद ही ग्राहक का काम कर रहे हैं. अंधा बांटे रेवड़ी, आपन आपन&#160; को देता जाए अंधे के लिए सही है लेकिन गूगल के लिए नहीं.    </p>
<p align="justify">चूँकि कुछ&#160; हिंदी चिट्ठे जम कर ऐसा कर रहे थे, उसकी सजा सबा को मिल रही है. गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2623/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>18</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>दुर्घटना: कौन जिम्मेदार है?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2621</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2621#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 14:41:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2621</guid>
		<description><![CDATA[ 
मेरे घर के पास ही है राजमार्ग 47, जिस पर हर महीने मैं 1000 से 3000 किलोमीटर की सफारी करता हूँ. अधिकतर अपनी कार में, लेकिन कई बार गैरों की गाडी में. एक औसत यात्रा 100 से 400 किलोमीटर की होती है. 4-लेन के इस राजमार्ग पर यात्रा सामान्यतया सुखद होती है, लेकिन एक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/Motorcycle.jpg"><img style="border-right-width: 0px; display: block; float: none; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: auto; border-left-width: 0px; margin-right: auto" title="Motorcycle" border="0" alt="Motorcycle" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/Motorcycle_thumb.jpg" width="300" height="242" /></a> </p>
<p align="justify">मेरे घर के पास ही है राजमार्ग 47, जिस पर हर महीने मैं 1000 से 3000 किलोमीटर की सफारी करता हूँ. अधिकतर अपनी कार में, लेकिन कई बार गैरों की गाडी में. एक औसत यात्रा 100 से 400 किलोमीटर की होती है. 4-लेन के इस राजमार्ग पर यात्रा सामान्यतया सुखद होती है, लेकिन एक चीज मन को दुखी करती है और वह है दुर्घटनायें. </p>
<p align="justify">एक बार की यात्रा में औसतन एक दुर्घटना नजर आ जाती है. यहां अधिकतर गाडियां 80 किमी रफ्तार से चलती हैं अत: दुर्घटनाओं में मौत बहुत अधिक होती है, और छोटी गाडियों के सिर्फ अंजरपंजर बच पाते हैं. अनुसंधानों से पता चलता है&#160; कि इन में 80% से 90% मानुषिक लापरवाही और घमंड के कारण जबर्दस्ती होती हैं, और सिर्फ 10% से कम दुर्घटनायें आकस्मिक होती हैं. </p>
<p align="justify">मद्यापन करके गाडी चलाना, आधी अधूरी नींद के बाद गाडी चलाना, बिन सही ब्रेक के गाडी चलाना, दूसरे से सडक पर प्रतियोगिता करना, सडक किनाने की चेतावनियों (खतरनाक घाटी, तंग रास्ता, बिन-फाटक रेलवे क्रासिंग, खतरनाक/अंधा मोड) की उपेक्षा आदि के कारण अधिकतर दुर्घटनायें होती हैं. </p>
<p align="justify">अफसोस यह है कि एक सेकेंड के दसवें भाग में जो दुर्घटना होती है उसका दर्द, विकलांगपन, बच्चों का, अनाथपन, स्त्रियों का वैधव्य आजीवन दर्द देता है.&#160; आश्रितों की&#160; जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं. बुद्धिमान बच्चे पढाई छोड मजूरी के लिये निकल पडने पर विवश हो जाते हैं. उससे भी अफसोस की बात है है कि जरा सी सावधानी से इन आजीवन के दुखों से बचा जा सकता था.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="center"><a href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">Indian Tourism</font></a><font size="1">&#160; | </font><a href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Coins Encyclopedia</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics Simplified</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.income4u.com/"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/india-all-about-it/3aw752rt3ywhc/68#" target="_blank"><font size="1">India News</font></a><font size="1">&#160; । </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/gwalior-all-about-it/3aw752rt3ywhc/69"><font size="1">Gwalior</font></a><font size="1"> </font></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2621/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>9</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>डॉ अरविंद &#8212; बड़े बड़ों की बातें!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2610</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2610#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 06 Feb 2010 11:22:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परामर्श]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2610</guid>
		<description><![CDATA[मेरे कल के आलेख मसिजीवी का एक प्रश्न!&#160; पर डॉ अरविंद मिश्रा ने टिपियाया: 
बड़े बड़ों की बातें!

तीन शब्द ही सही, लेकिन इस टिप्पणी को पढ कर बढा अच्छा लगा. अच्छा इसलिये कि डॉ अरविंद बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हैं एवं सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं. वे अधिकतर वैज्ञानिक विषयों पर लिखते हैं, और इस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे कल के आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2608">मसिजीवी का एक प्रश्न!</a>&#160; पर <a href="http://indianscifiarvind.blogspot.com/" target="_blank">डॉ अरविंद मिश्रा</a> ने टिपियाया: </p>
<blockquote><p align="justify">बड़े बड़ों की बातें!</p>
</blockquote>
<p align="justify">तीन शब्द ही सही, लेकिन इस टिप्पणी को पढ कर बढा अच्छा लगा. अच्छा इसलिये कि डॉ अरविंद बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति हैं एवं सुलझे हुए चिट्ठाकार हैं. वे अधिकतर वैज्ञानिक विषयों पर लिखते हैं, और इस कारण कई बार कई चिट्ठाकार उनका विरोध कर चुके हैं.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/image1.png"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 0px 0px 40px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="image" border="0" alt="image" align="right" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/image_thumb1.png" width="224" height="169" /></a> इसका कारण है पेरोट थ्योरी जिसके बारे में ज्ञान जी अपने चिट्ठे पर लिख चुके हैं. इस सिद्धांत को वैज्ञानिक आलेखों के पाठकों पर लगाया जाये तो निष्कर्ष निकलता है कि इनके पाठकों में से कम से कम पांच प्रतिशत ऐसे लोगो होंगे जिनके लिये उनके आलेख की विषयवस्तु समझ के परे है. लेकिन पढने वाले को कुछ शब्द समझ में आ जाते हैं अत: उसको लगता है कि उसे सब कुछ समझ आ रहा है, जबकि उसके मन में अर्थ का अनर्थ हो रहा होता है.</p>
<p align="justify">इसका सबसे अच्छा उदाहरण है नितंब के शरीरशास्त्रीय/समाजशास्त्रीय विकासवाद के बारे में डॉ अरविद की शुद्ध वैज्ञानिक लेखनमाला. मैं विकासवाद का घोर विरोधी हूँ, लेकिन इसके बावजूद इस लेखनमाला में दिखे मौलिक तर्क एवं चिंतन का कायल हो गया था. लेकिन इस बीच कुछ पाठक जिनको उस आलेख के “शास्त्र” के बदले सिर्फ नितंब ही दिख पाया उन्होंने डॉक्टर के आलेख के विरुद्ध युद्ध छेड दिया. यह तो अच्छा हुआ कि उनके वैज्ञानिक मन ने उनको पकड रोके रखा, वरना एक अच्छा चिट्ठाकार असमय चिट्ठा-सन्यास ले लेता. </p>
<p align="justify">इस हफ्ते चिट्ठाजगत में वापस आया तो दिखा कि उनके विरुद्ध पुन: जबर्दस्ती का एक टंटा खडा कर दिया गया था जिसका उन्होंने डट कर विरोध किया.&#160; वैज्ञानिकों को बधाई. सरवाईवल ऑफ द फिटेस्ट के असर के कारण उन में से कुछ लोग हम सब से काफी हिम्मती एवं मजबूत हैं.</p>
<p align="justify">लिखते रहें डॉ अरविंद! आपके पाठक बहुत हैं. मैं तो आप के उन सारे आलेखों को पढने जा रहा हूँ जो पिछले 4 महीनों में मुझ से छूट गये थे!</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="center"><a href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">Indian Tourism</font></a><font size="1">&#160; | </font><a href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Coins Encyclopedia</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics Simplified</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.income4u.com/"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/india-all-about-it/3aw752rt3ywhc/68#" target="_blank"><font size="1">India News</font></a><font size="1">&#160; । </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/gwalior-all-about-it/3aw752rt3ywhc/69"><font size="1">Gwalior</font></a><font size="1"> </font></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2610/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>18</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मसिजीवी का एक प्रश्न!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2608</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2608#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 12:46:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2608</guid>
		<description><![CDATA[ मेरे पिछले आलेख पाबला जी से हुआ अपराध बहुत बडा? पर काफी सार्थक टिप्पणियां आई हैं जिनके लिये मैं अपने चिट्ठामित्रों का आभारी हूँ. इन में से एक टिप्पणी पर जरूर कुछ कहना चाहूँगा जो मेरे मित्र मसिजीवी से मिली है. 
(मसिजीवी) चर्चा के लिए अनंत विकल्‍प थे फिर चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ? उत्‍तर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/001F.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 60px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="001F" border="0" alt="001F" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/02/001F_thumb.jpg" width="154" height="164" /></a> मेरे पिछले आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2605">पाबला जी से हुआ अपराध बहुत बडा?</a> पर काफी सार्थक टिप्पणियां आई हैं जिनके लिये मैं अपने चिट्ठामित्रों का आभारी हूँ. इन में से एक टिप्पणी पर जरूर कुछ कहना चाहूँगा जो मेरे मित्र मसिजीवी से मिली है. </p>
<blockquote><p align="justify"><font color="#0000f2">(मसिजीवी)</font> चर्चा के लिए अनंत विकल्‍प थे फिर चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ? उत्‍तर मुश्किल नहीं है उनकी ओर से लोगों ने बार बार स्‍पष्‍ट किया है कि वे इस मंच से नाराज हैं हमारी छोटी सी समझ इसे ही बैडफेथ कहती है। </p>
</blockquote>
<p align="justify"><font color="#0000f2">(शास्त्री)</font> मैं नहीं जानता कि यह सही है क्या. हो सकता है कि वे नाराज हों. यह भी हो सकता है कि इस नाराजगी के कारण उन्होंने चिट्ठाचर्चा.कॉम अपने नाम रजिस्टर करवा लिया हो. तर्क के लिये ये दोनों बातें सही माल ली जायें तो भी उसका मतलब यह नहीं है कि हम अपने एक चिट्ठा-मित्र को कठघरे में खडा कर दें. उलाहना देना एक बात है, उससे आगे जाना अलग बात है. कारण यह है कि यदि कोई किसी बात का विरोध करना चाहता है तो अपराध&#160; के अलावा हर तरह के तरीके का उपयोग उसके लिये जायज है. कल को कोई मुझ से नाराज हो जाये तो वह मेरे नाम से बचे 199 डोमेन खरीद सकता है. (एक <a href="http://www.ShastriPhilip.Com">www.ShastriPhilip.Com</a>&#160; मैं ने पंजीकृत कर रखा है).&#160;&#160; जनतंत्र में यह उसका अधिकार है.&#160; अत: अपने जनतांत्रिक अधिकार के उपयोग के लिये एक चिट्ठामित्र को उलाहना से अधिक न दें तो अच्छा लगेगा.</p>
<blockquote><p align="justify"><font color="#0000f2">(मसिजीवी)</font> जब हमने कहा था कि आप अकेले ये सब नहीं कर सकते जरूर कोई ओर बात है तो ये ज्‍यादा आहत करने वाली बात थी पर आपने लीगल नोटिस की धमकी नहीं भेजी थी अपनी बात रखी थी।</p>
</blockquote>
<p align="justify"><font color="#0000f2">(शास्त्री)</font> कानूनी नोटिस देने की कह कर पाबला जी भी जरूरत से कुछ अधिक आगे निकल गये हैं और मैं उसका अनुमोदन नहीं करता. पाबला जी को इतना आगे जाने की क्या जरूरत थी इसका मुझे अनुमान नहीं है और मेरा अनुरोध है कि कोई भी साथी जब तक उसके रोजी पर चोट न लगे तब तक कभी भी कानूनी कार्यवाही आदि की&#160; दिशा में न सोचे. इस छोटे परिवार में हम एक साथ मिलबैठ कर बिन कोर्टकचहरी के अपनी समस्या सुलझा सकते हैं. </p>
<p align="justify">चिट्ठाजगत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो निष्पक्ष तरीके से चिट्ठा-मित्रों के बीच की लगभग हर समस्या को सुलझा सकते&#160; हैं. अत: यदि आपसी घमासान के बदले समस्याओं को मध्यस्थता एवं परामर्श द्वारा हल कर किया जाये तो परिवार की भावना को ठेस नहीं पहुंचेगी और आपसी प्रेम और भाईचारा बना रहेगा. </p>
<p align="justify">अंत में एक बात हरेक कनिष्ठ एवं वरिष्ठ चिट्ठकारों को याद दिलाना चाहता हूँ:&#160; इस घटना में पहल कहां से हुई, तीर किस दिशा में&#160; बढा, फिर क्या हुआ आदि मेरा विषय नहीं है.&#160; विषय यह है कि&#160;&#160; हम में से हरेक व्यक्ति संयंम से काम ले तो यह खटपट की नौबत नहीं आयगी. लेकिन एक व्यक्ति संयंम खो दे तो फिर चेन-रिएक्शन शुरू हो जाता. बिना कारण सज्जन&#160; और विद्वान लोग मर मिटते हैं.&#160; यह सब देख कर चिट्ठाजगत के असली विलेन मजे ले रहे हैं क्योंकि वे यहां चिट्ठाकारी के लिये नहीं बल्कि लट्ठम-लट्ठ के लिये आये हैं.&#160; यदि हम सब यह प्रण कर लें के कम से कम अगले छ: महीने हम अन्य चिट्ठाकारों के सहीगलत व्यवहार पर टिप्पणी करने के पहले कम से कम एकाध बार उन से सीधे पूछपाछ कर आगे बढें तो हम सब के लिये अच्छा होगा.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="center">
<p><font size="2" face="Verdana"></font></p>
<p align="justify">
<p align="justify"><font size="2" face="Verdana"></font></p>
<p align="center"><a href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">Indian Tourism</font></a><font size="1">&#160; | </font><a href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Coins Encyclopedia</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics Simplified</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.income4u.com/"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/india-all-about-it/3aw752rt3ywhc/68#" target="_blank"><font size="1" face="Trebuchet MS">India News</font></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2608/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>18</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पाबला जी से हुआ अपराध बहुत बडा?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2605#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 04 Feb 2010 17:33:27 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2605</guid>
		<description><![CDATA[आज एक लंबे अरसे के बाद चिट्ठाजगत में वापस आया तो लगा कि घमासान अभी भी खतम नहीं हुआ है. कल कोई विषय था आज कुछ और है. इन में सब से आखिर में दिखाई दिया पाबला जी के विरुद्ध हो रहा घमासान जिस में उनको “बागी” (साईबर स्क्वेटर) घोषित कर दिया गया है. पाबला-विरोधी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">आज एक लंबे अरसे के बाद चिट्ठाजगत में वापस आया तो लगा कि घमासान अभी भी खतम नहीं हुआ है. कल कोई विषय था आज कुछ और है. इन में सब से आखिर में दिखाई दिया <a href="http://bspabla.blogspot.com" target="_blank">पाबला</a> जी के विरुद्ध हो रहा घमासान जिस में उनको “बागी” (साईबर स्क्वेटर) घोषित कर दिया गया है. पाबला-विरोधी “मित्र”&#160; जम कर पाबला-विरोधियों का हिम्मत-हौसला बढा रहे हैं एवं इनामकिताब कर रहे हैं. </p>
<p align="justify">इन सब से हिन्दीजगत का कितना भला हो रहा है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन एक बात का यकीन है कि गलतफमियां जरूर बढ रही हैं. उदाहरण के लिये, अब हर किसी को लगने लगा है वे साईबर-स्क्वेटिंग का मतलब जानने लगे हैं और इस कारन अपराध-शास्त्र में उनको दक्षता हासिल हो गई है.</p>
<p align="justify">“साईबर-स्क्वेटिंग” लगभग 20 साल पुराना एक शब्द है जिसका मतलब है जालजगत में ठसना. जब जालजगत चालू हुआ था उस समय कुल 3 प्रकार के डोमेन जनसाधारण के लिये उपलब्ध थे &#8212; कॉम, ऑर्ग, एवं नेट (Com, Org, Net). उस जमाने में हर व्यापारिक संस्थान एवं ट्रस्ट अपने नाम को पंजीकृत करवाने की होड में लगा रहता था क्योंकि कुल तीन ही प्रकार के डोमेन मिल सकते थे. </p>
<p align="justify">ऐसे युग में कुछ लोग व्यापारिक संस्थानों के नाम (मसलन, IBM.Com, CocaCola.Com)&#160; अपने नाम पंजीकृत करवा लेते थे और बाद में कंपनी को ऊंचे दाम पर बेच देते थे. कंपनी के पास उस नाप को प्राप्त करने का कोई और चारा नहीं था. कुल तीन संभावित नाम जो ठहरे. लेकिन आज 200 से अधिक प्रकार के डोमेन (मसलन, IN, TV, US, Asia, Org.In) उपलब्ध हैं और किसी भी व्यापारिक संस्थान को या संस्था को नाम की कोई कमी नहीं है. यदि Com में नहीं मिला तो In में पंजीकृत करवा सकते हैं.</p>
<p align="justify">चूंकि कोई भी कंपनी मसलन, IBM इन 200 डोमेनों को पंजीकृत नहीं करवा सकती अत: आज किसी भी नाम पर किसी का भी हक लगभग न के बराबर रह गया है. </p>
<p align="justify">यदि चिट्ठाचर्चा.कॉम पंजीकृत हो गया है तो अभी कम से कम 200 डोमेन बचे हैं जिन में कम से कम 25 (चिट्ठाचर्चा.इन, चिट्ठाचर्चा.नेट, आदि) को कोई भी चाहे तो पंजीकृत करवा सकता है. इस कारण पाबला जी ने कोई अपराध नहीं किया है. अपराध तो वे कर रहे हैं जो अनावश्यक मुद्धे उठा कर बवाल खडा कर रहे हैं.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="center"><a href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">Indian Tourism</font></a><font size="1">&#160; | </font><a href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Coins Encyclopedia</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics Simplified</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.income4u.com/"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://knol.google.com/k/shastri-jc-philip/india-all-about-it/3aw752rt3ywhc/68#" target="_blank"><font size="1" face="Trebuchet MS">India News</font></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2605/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>24</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>निमंत्रण: शास्त्री परिवार!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2601</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2601#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 21 Jan 2010 17:28:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2601</guid>
		<description><![CDATA[ 
मेरे बेटे आनंद का कुमारी अर्पिता के साथ 
शुभ विवाह (23 जनवरी 2010) पर सारथी 
के सारे मित्रों का स्वागत है.

&#160;
विवाह स्थल: भारतमाता 
कालेज, त्रिक्ककारा, एर्नाकुलम
समय: 23 जनवरी 2010, प्रात: 11 बजे

सस्नेह &#8212; शास्त्री परिवार
]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/01/AnJCPA1.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="AnJCPA" border="0" alt="AnJCPA" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/01/AnJCPA_thumb1.jpg" width="450" height="326" /></a> </p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">मेरे बेटे आनंद का कुमारी अर्पिता के साथ </font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">शुभ विवाह (23 जनवरी 2010) पर सारथी </font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">के सारे मित्रों का स्वागत है.</font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5"></font></p>
<p align="center">&#160;</p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">विवाह स्थल: भारतमाता </font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">कालेज, त्रिक्ककारा, एर्नाकुलम</font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">समय: 23 जनवरी 2010, प्रात: 11 बजे</font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5"></font></p>
<p align="center"><font color="#0000f2" size="5">सस्नेह &#8212; शास्त्री परिवार</font></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2601/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>29</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>ईसा जयंती: शुभ कामनायें!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2596</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2596#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 25 Dec 2009 03:18:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2596</guid>
		<description><![CDATA[&#160;
ईसा-जयंती के इस पावन पर्व पर    आप सब को ईश्वर की असीम आशिष प्राप्त हो!
&#160;
राजमहलों में जन्म लेने के बदले जिस तरह से      प्रभु ईसा ने एक गरीब के घर में      और वह भी अपने मांबाप की यात्रा के 
दौरान एक गौशाले [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/12/JChrist.jpg"><img style="border-right-width: 0px; display: block; float: none; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin-left: auto; border-left-width: 0px; margin-right: auto" title="JChrist" border="0" alt="JChrist" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/12/JChrist_thumb.jpg" width="420" height="543" /></a></p>
<p align="center">&#160;</p>
<h4 align="center">ईसा-जयंती के इस पावन पर्व पर    <br />आप सब को ईश्वर की असीम आशिष प्राप्त हो!</h4>
<p>&#160;</p>
<h3 align="center"><font color="#0000f2">राजमहलों में जन्म लेने के बदले जिस तरह से     <br /> प्रभु ईसा ने </font><font color="#0000f2">एक गरीब के घर में     <br /> और वह भी अपने मांबाप की यात्रा के </font></h3>
<h3 align="center"><font color="#0000f2">दौरान एक गौशाले में जन्म लिया,&#160; उस घटना     <br /> के द्वारा प्रभु हम सब को </font><font color="#0000f2">यह समझने की     <br /> बुद्धि प्रदान करें कि ईश्वर आम आदमी </font></h3>
<h3 align="center"><font color="#0000f2">के दिलों में वास करना चाहते हैं.</font></h3>
<p align="center">&#160;</p>
<h3 align="center"><font color="#0000f2">प्रभु करे कि नया साल आप सब के जीवन </font></h3>
<h3 align="center"><font color="#0000f2">और मनों में ईश-निवास का एक साल हो!</font></h3>
<h3 align="center"><font color="#b90000">सस्नेह &#8212; शास्त्री</font></h3>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2596/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>26</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>ज्ञान जी का प्रस्ताव और धन!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2593</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2593#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 03 Dec 2009 00:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2593</guid>
		<description><![CDATA[मेरे कल के आलेख प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! पर टिपियाते समय ज्ञानदत्त जी ने एक आश्चर्यजनक बात कह दी जो इस प्रकार है:
मनुष्य समान बन नहीं सकता। पूंजी को आप समान बांट भी दें तो वह कालान्तर में पुन: वही असमान बंट जायेगी।&#160; [ज्ञानदत्त पाण्डेय]

इसे पढते ही मुझे एक गणना/परीक्षण याद आया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे कल के आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2592">प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी!</a> पर टिपियाते समय ज्ञानदत्त जी ने एक आश्चर्यजनक बात कह दी जो इस प्रकार है:</p>
<blockquote><p align="justify">मनुष्य समान बन नहीं सकता। पूंजी को आप समान बांट भी दें तो वह कालान्तर में पुन: वही असमान बंट जायेगी।&#160; [<cite><a href="http://halchal.gyandutt.com/">ज्ञानदत्त पाण्डेय</a></cite>]</p>
</blockquote>
<p align="justify">इसे पढते ही मुझे एक गणना/परीक्षण याद आया जो आज से कुछ साल पहले किया गया था. इसे करने वालों ने सबसे पहले विश्व-समाज के हर घटक के लोगों का पैसा खर्चने एवं निवेश करने की आदतों का हिसाब तय्यार किया. इसके बाद संगणक की मदद से यह गणना की कि यदि विश्व के हर व्यक्ति से उसका सारा धन ले लिये जाये, और हरेक को (बच्चे, बढे, बूढे आदि को) यदि एक करोड रुपया प्रति व्यक्ति दे दिया जाता है तो क्या होगा.&#160; एक ऐसा समाज जहां आर्थिक विषमता नहीं है और जहां हरेक को पैसे के उपयोग के लिये पूरी आजादी दे दी जाती है.</p>
<p align="justify">पहले महीने हर कोई बेहद खुश दिखता है,&#160; खैरात में मिला 1 करोड रुपया उसे जीवन की हर जरूरत की आपूर्ति के लिये मददगार सिद्ध होता है. लेकिन दूसरे महीने से एक अंतर दिखने लगता है: अधिकतर लोग सिर्फ खर्च और आनंद में लिप्त रहते हैं जबकि लगभग 20% लोग खर्च के साथ साथ निवेश भी करते जाते हैं. छठे महीने के अंत तक समाज पूरी तरह आर्थिक विषमता से भर जाता है. ताज्जुब:&#160; ठीक 365 वें दिन लोगों का आर्थिक स्तर वही हो जाता है जो एक करोड रुपये मिलने के पहले था.</p>
<p align="justify">लगभग 20% लोग धनी रह जाते है एवं 80% पुन: कंगाल हो जाते है. जो पहले करोडपति था वह आज करोडपति रह जाता है. जो कंगाल था वह एक करोड प्रति व्यक्ति पाने के बावजूद सडक पर भीख मांगने निकल पडता है. कुल मिला कर कहा जाये तो दोष पूंजी के वितरण का नहीं है बल्कि उपलब्ध पूंजी के विनिमय का है. अपवादों को छोड दें तो किसी भी समाज में कोई भी व्यक्ति आर्थिक उन्नति कर सकता है, लेकिन उसके लिये जरूरत अतिविशाल पूँजी की नहीं, बल्कि उसकी अपनी सामान्य पूँजी के साथ साथ उसके विनिमय व निवेश के प्रति असामान्य समर्पण की जरूरत है.</p>
<p align="justify">अत: ऊपर उद्धरित ज्ञान जी का कथन एकदम सही है. पूंजी से अधिक उपलब्ध पूँजी का सही उपयोग महत्वपूर्ण है. ज्ञान जी का अगला कथन भी इस कारण जरा देख लें:</p>
<blockquote><p align="justify">अगर मुझे पूंजी की इज्जत करनी नहीं आती तो मैं जितना भी जोर लगाऊं –- टाटा बिरला का क्लोन बन नहीं सकता।</p>
</blockquote>
<p align="center"><a href="http://guide4income.com"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.IndianTouristPlaces.info"><font size="1">About India</font></a><font size="1"> । </font><a title="indian coins encyclopedia, numismatics, free articles, free ebooks, indian coins, numismatics, free indian coin ebooks" href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.physics4u.info"><font size="1">Physics Made Simple</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://india.sarathi.info/"><font size="1">India</font></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2593/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>9</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2592</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2592#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2592</guid>
		<description><![CDATA[मेरे कल के आलेख&#160; एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!! पर दिनेश जी ने टिपियाया:
यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे कल के आलेख&#160; <a href="http://sarathi.info/archives/2589">एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!!</a> पर दिनेश जी ने टिपियाया:</p>
<blockquote><p align="justify">यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा। (<cite><a href="http://anvarat.blogspot.com/">दिनेशराय द्विवेदी</a></cite>)</p>
</blockquote>
<p align="justify">यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है: जहां भी किसी चीज को अर्जित की सुविधा दी जाती है, वहां कहीं भी हर व्यक्ति एक समान अर्जित नहीं कर पाता. अत: एक ही अध्यापक के पढाये विद्यार्थी जिस तरह पोजिशन से लेकर फेल होने तक के अंक अर्जित करते हैं, उसी तरह संपत्ति के अर्जित करने की स्थिति है. धनी एवं गरीब का अंतर हमेशा रहेगा. लेकिन यदि गरीब को अपने स्तर पर पर्याप्त&#160; रोटी, कपडा और मकान की सुविधा मिलती है तो उस समाज को बुरा नहीं कहा जा सकता है. आर्थिक स्थिति तब बुरी हो जाती है जब गरीब के पास अपनी मौलिक जरूरतों की आपूर्ति के लिये कोई रास्ता या साधन न बचे, जैसा आज करोडों भारतीयों के साथ हो रहा है.</p>
<p align="justify">प्राचीन भारत में धनीगरीब का अंतर जरूर था, लेकिन गरीब से गरीब व्यक्ति के पास अपनी मूलभूत जरूरतों की आपूर्ति के लिये जमीन, खेती, जंगल से प्राप्त सामग्री आदि उपलब्ध थे. जलाऊ लकडी की कोई कमी नहीं थी. बाजार या हाट में वह अन्न, उपज, या जंगल-जमीन से प्राप्त की हुई चीजों के विनिमय के द्वारा अपनी जरूरत की चीजें प्राप्त कर लेता था.</p>
<p align="justify">“दास” या “गुलाम” शब्द एकदम से अभागों का चित्र हमारे समक्ष लाता है. लेकिन यह न भूलें कि शोषित एवं बंधुआ दास या गुलाम एक अर्वाचीन प्रक्रिया है, प्राचीन नहीं. प्राचीन समाज में दास और गुलाम को पर्याप्त सुरक्षा मिल जाती थी. (अपवादों को छोडें क्योंकि अपवाद हमेशा संख्या में न्यून होते हैं).</p>
<p align="justify">प्राचीन केरल का उदाहरण लें तो यहां उपजाऊ भूमि इतनी प्रचुर थी कि हर किसी को अपने जरूरत की पूर्ति अवसर मिल जाता था. इतना ही नहीं, काली मिर्च, इलायची, अदरख, दालचीनी आदि की खेती आम थी और इनको विदेशी व्यापारी लोग हाथों हाथ खरीद ले जाते थे. काली मिर्च की खेती इतना आसान है कि कोई भी व्यक्ति अपने घरजमीन में बीसतीस बेल लगा सकता है, और आजीवन फल लेता रह सकता है. इससे इतनी आय होती थी कि कालीमिर्च को उस जमाने में काला-सोना कहा जाता था.</p>
<p align="justify">केरल में अरब, पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश लोग सिर्फ इस काले-सोने के लिये आये थे और आपस में मारामारी करते थे. केरल की जनता के लिये जबकि कालीमिर्च एक आम चीज है, एवं खेती बहुत आसान है. 1300 ईस्वी से पहले सामंतवादी व्यवस्था लगभग न के बराबर थी.</p>
<p align="justify">कुल मिला कर कहा जाये तो हिन्दुस्तान वाकई में सोने की चिडिया थी जिसे लूटने के लिये दुनियां भर के लोग लालाईत रहते थे. दिनेश जी ने सही कहा है:</p>
<blockquote><p align="justify">यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। </p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2592/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2589#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 06:11:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2589</guid>
		<description><![CDATA[ 
चित्र: केरल के राजाओं का सोने का एक सिक्का
मेरे पिछले आलेख सोने की चिडिया भारत: सच या गप? में मैं ने प्राचीन भारतीय सिक्कों के आधार पर यह प्रस्ताव रखा था कि&#160; भारत एक समृद्ध देश था जिस कारण लगभग 3000 साल तक यह विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करता रहा. मैं ने यह भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/12/image.png"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="image" border="0" alt="image" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/12/image_thumb.png" width="206" height="170" /></a> </p>
<p align="justify"><font color="#0000f2">चित्र: केरल के राजाओं का सोने का एक सिक्का</font></p>
<p align="justify">मेरे पिछले आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2583">सोने की चिडिया भारत: सच या गप?</a> में मैं ने प्राचीन भारतीय सिक्कों के आधार पर यह प्रस्ताव रखा था कि&#160; भारत एक समृद्ध देश था जिस कारण लगभग 3000 साल तक यह विदेशी व्यापारियों को आकर्षित करता रहा. मैं ने यह भी कहा था कि लोग इसे लगभग 1200 साल लूटते रहे जो इस बात को याद दिलाता है कि हिन्दुस्तान कितना समृद्ध था.</p>
<p align="justify">मेरे कई मित्रों ने समृद्धि की बात को स्वीकार किया लेकिन उसके साथ यह बात जोड दिया कि प्राचीन भारत में&#160; थोडे से लोग समृद्ध थे, बाकी सब कंगाल थे. इस प्रस्ताव ने मुझे इतना झकझोर दिया कि पिछले दिनों सारा समय भारत के इतिहास को पढने में लगाया.</p>
<p align="justify">चूँकि मेरा मूल आलेख केरल के सोने के सिक्कों के बारे में था, अत: मैं ने केरल के इतिहास को काफी विस्तार से पढा. मैं सारथी के सब मित्रों का आभारी हूँ कि जिस काम को मैं कुछ महीनों से टालता आ रहा था उसे तुरंत करने के लिये उनका प्रोत्साहन मिला. </p>
<p align="justify">प्राचीन भारत के इतिहास को वस्तुनिष्ठ तरीके से पढें तो एकदम यह स्पष्ट हो जाता है यह देश धनधान्य से, खेतीबाडी से, खनिज पदार्थों द्वारा, एवं नदीनालों की संपदा (सोना, बहुमूल्य पत्थर आदि) से भरपूर था. धनीगरीब का अंतर जरूर था, लेकिन गरीब से गरीब व्यक्ति के पास भी खेतीबाडी और पेशेवर काम इतना रहता था कि आज जो “विषमता” दिखती है इतनी विषमता नहीं थी. </p>
<p align="justify">दर असल देश के गरीब किसी जमाने में आज के समान गरीब नहीं थे. उनको खेतीबाडी, पेशेवर धंधों, एवं जगल-खनिज-नदीनालों द्वारा रोजीरोटी की उपलब्धि इतनी अधिक थी कि गरीब व्यक्ति के पास परिवार को पालनेपोसने के लिये लगभग वह सब कुछ था जिसकी जरूरत थी. जनसंख्या कम थी, रोजीरोटी के संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे.</p>
<p align="justify">आज जो आर्थिक विषमता दिखती है इसका मूल कारण विदेशी लुटेरों के द्वारा पिछले 300 सालों में&#160; की गई लूट एवं उसके कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियां हैं. भारत वाकई में सोने की चिडिया थी, एवं आज जो आर्थिक विषमता हम देखते हैं यह एक प्राचीन नहीं बल्कि अर्वाचीन स्थिति है जिसका मूल कारण यूरोपियन साम्राज्यवादियों द्वारा की गई लूटखसोट एवं सामाजिक परिवर्तन है. इसे हम अगले आलेख में विस्तार से देखेंगे.</p>
<p align="center"><a href="http://guide4income.com"><font size="1">Net Income</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.IndianTouristPlaces.info"><font size="1">About India</font></a><font size="1"> । </font><a title="indian coins encyclopedia, numismatics, free articles, free ebooks, indian coins, numismatics, free indian coin ebooks" href="http://www.IndianCoins.org"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://www.physics4u.info"><font size="1">Physics Made Simple</font></a><font size="1"> | </font><a href="http://india.sarathi.info/"><font size="1">India</font></a></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2589/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सोने की चिडिया भारत: सच या गप?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2583</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2583#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 18 Nov 2009 00:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2583</guid>
		<description><![CDATA[ बचपन में बडे उत्साह से हम लोग गाते थे “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती”. हमारे अध्यापक लोग बताते थे कि किसी जमाने में हिन्दुस्तान को&#160; “सोने की चिडिया” कहा जाता था. 
अंग्रेजों के राज (और सफल ब्रेनवाशिंग) के साथ साथ राष्ट्र के प्रति&#160; हमारा गर्व ऐसा गायब हुआ कि भारत [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/2Pagoda1.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px auto; display: block; float: none; border-top: 0px; border-right: 0px" title="2Pagoda" border="0" alt="2Pagoda" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/2Pagoda_thumb1.jpg" width="374" height="171" /></a> बचपन में बडे उत्साह से हम लोग गाते थे “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती”. हमारे अध्यापक लोग बताते थे कि किसी जमाने में हिन्दुस्तान को&#160; “सोने की चिडिया” कहा जाता था. </p>
<p align="justify">अंग्रेजों के राज (और सफल ब्रेनवाशिंग) के साथ साथ राष्ट्र के प्रति&#160; हमारा गर्व ऐसा गायब हुआ कि भारत के प्राचीन वैभव और संपन्नता के बारे में कोई कहता है तो नाक भौं सिकोडने वाले भारतीयों की संख्या अधिक होती है. यहां तक कि भारत संपन्न नहीं था यह कहने के लिये आज लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं.</p>
<p align="justify">लेकिन भारतीय सिक्कों एवं भारत में मिले विदेशी सिक्कों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कम से कम ईसा-पूर्व 2000 से लेकर ईसवी 1900 तक भारत आर्थिक रूप से बेहद संपन्न था. इन 3800 सालों में हिन्दुस्तान में सोने और चांदी के जितने सिक्के ढाले गये थे उनकी संख्या अनगिनित है. सन 600 से लेकर 1947 तक विदेशियों के हाथ लुटते पिटते रहने के बावजूद अभी भी लाखों बडेछोटे सोने के सिक्के भारत में&#160; बचे हुए है. </p>
<p align="justify">केरल जैसे छोटे प्रदेश में सोने के कम से कम दसबीस बडे प्रकार के&#160; सिक्के और सैकडों प्रकार के छोटे सिक्के (0.4 ग्राम के) और चांदी के बडे छोटे मिलाकर सैकडों प्रकार के सिक्के यहां के राजाओं ने चलाये थे. इन में से एक सिक्का ऊपर दिखाया गया है. इसकी आज की अनुमानित कीमत 100,000 रुपये&#160; या उससे ऊपर है. जब इसके विक्रेता को मेरी सिक्काशास्त्र अभिरुचि के बारे में पता चला तो मुझे घर बुला कर ले गये और केरल के राजाओं के कम से कम दस प्रकार के सोने के&#160; सिक्के दिखाये. मेरे अनुरोध पर सब को स्केन करके उनके चित्र मेरे उपयोग के लिये प्रदान भी किया.</p>
<p align="justify">भिखारी को कोई नहीं लूटता. संपन्न को ही लूटा जाता है.&#160; भारत को तो लगभग सन 600 से 1947 तक लूटा गया था, उसके बावजूद यह संपदा (सोने के हजारों प्राचीन सिक्के मेरी जानकारी में है, लेकिन असली संख्या लाखों में है) बची है. अनुमान लगा लीजिये कि यह सोने की चिडिया नहीं सोने का हाथी था.</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2583/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>11</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>100 रुपये में मुफ्त खाना??</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2580</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2580#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 16 Nov 2009 11:40:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2580</guid>
		<description><![CDATA[ कल दोपहर को एक भिखारी आया जिसे मैं ने दो रुपये दिये. उसने झुक कर ऐसा प्रणाम किया जैसे मैं ने सारी दुनियां उसकी झोली में डाल दी हो. भीख को अपना हक मानने के बदले उसे एक एहसान मानने वाले भिखारियों को मैं काफी उत्सुकता से देखा करता हूँ. कल भी ऐसा ही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/beggar.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="beggar" border="0" alt="beggar" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/beggar_thumb.jpg" width="227" height="240" /></a> कल दोपहर को एक भिखारी आया जिसे मैं ने दो रुपये दिये. उसने झुक कर ऐसा प्रणाम किया जैसे मैं ने सारी दुनियां उसकी झोली में डाल दी हो. भीख को अपना हक मानने के बदले उसे एक एहसान मानने वाले भिखारियों को मैं काफी उत्सुकता से देखा करता हूँ. कल भी ऐसा ही हुआ. </p>
<p align="justify">खिडकी से देखा तो वह तो फाटक के बाहर बैठ पैसा गिनता दिखा. पास जाकर देखा तो कम से कम सौ दोसौ रुपये का अनुमान बैठा. मैं चूँकि सिक्कों का शौकीन हूँ, और चूँकि लोग घर मे इधरउधर पडे पुराने सिक्के भिखारियों को दे देते हैं अत: उन सिक्कों की विविधता को सोच कर मैं ने पूछा&#160; कि सिक्कों के बदले नोट दे दूँ तो उस ने मना कर दिया. </p>
<p align="justify">कारण पूछा तो बोला कि (मेरे घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर) एक होटल वाला उससे सारे खुले पैसे लेकर नोट दे देता है और हर 100 रुपये पर उसे एक खाना मुफ्त देता है. मुझे एकदम लगा कि दोनों ही लोग अकलमंद हैं. एक आदमी जिसके पास न आगे कुछ है न पीछे उसे 10 किलोमीटर चलने में कोई तकलीफ नहीं है. भिक्षाटन भी हो जाता है, 10 किलोमीटर की कवायद से शरीर को भी फायदा होता है. अंत में 21 रुपये का खाना मुफ्त मिल जाता है, कमाये पैसे उसकी अंटी में सुरक्षित रह जाते हैं. </p>
<p align="justify">होटल वाला भी अकलमंद है क्योंकि बैंक का चक्कर लगाये बिना उसे इतने खुले पैसे मिल जाते हैं कि एक चाय पीने के बाद कोई ग्राहक बीस का नोट दे दे तो भी बिन झुंझलाये उसे बाकी पैसे दे सकता है. किसी होटल में दोचार भिखारियों को दोपहर का खाना खिला देने से उनको कोई अतिरिक्त खर्चा नहीं बैठता है, खासकर जब भिखारी को खाना सिर्फ आखिर में दिया जाता है.</p>
<p align="justify">काश हम में से हरेक अपने जीवन की समस्याओं को इतने व्यावहारिक तरीके से सुलझा पाता!!</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2580/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>14</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>लव जिहाद: क्या बला है यह?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2576</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2576#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 11 Nov 2009 14:06:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2576</guid>
		<description><![CDATA[पिछले दिनोँ सुरेश चिपलूनकर ने इशारा किया था कि केरल मेँ एक नये प्रकार का जिहाद चल रहा है. समयाभाव के कारण अभी तक इस विषय पर लिख नहीँ पाया था. 
जैसा मैँ ने अपने आलेखोँ (केरल में धार्मिक संघर्ष !!, केरल में मुस्लिम-ईसाई संघर्ष??) में कहा था, धार्मिक मामलों में केरल हिन्दुस्तान का सबसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar01.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Akbar01" border="0" alt="Akbar01" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar01_thumb.jpg" width="240" height="161" /></a>पिछले दिनोँ सुरेश चिपलूनकर ने इशारा किया था कि केरल मेँ एक नये प्रकार का जिहाद चल रहा है. समयाभाव के कारण अभी तक इस विषय पर लिख नहीँ पाया था. </p>
<p align="justify">जैसा मैँ ने अपने आलेखोँ (<a href="http://sarathi.info/archives/2568">केरल में धार्मिक संघर्ष !!</a>, <a href="http://sarathi.info/archives/2569">केरल में मुस्लिम-ईसाई संघर्ष??)</a> में कहा था, धार्मिक मामलों में केरल हिन्दुस्तान का सबसे सहिष्णू प्रदेश है. इस सहिष्णुता का फायदा उठा कर ईसाई और हिन्दू लडकियों को मुस्लिम बनाने के एक नये तरीके को सामान्यतया “लव-जिहाद” कहा जाता है. तरीका यह है कि मुस्लिम लडके हिन्दू और ईसाई लडकियों को जान बूझ कर&#160; प्रेम-पाश&#160; में फंसाते हैं और विवाह के पहले उन लडकियों का धर्म बदल दिया जाता है. </p>
<p align="justify">यह बीमारी केरल में इतनी अधिक हो गई है कि मेरे जानपहचान की कई ईसाई लडकियां इस पाश में फंस चुकी हैं. अनौपचारिक अनुमान है कि इस तरीके को अपनाने के कारण कम से कम 5000 ईसाई लडकियां और 5000 हिन्दू लडकियां मुस्लिम बन चुकी हैं. मेरे करीबी परिवारों की कम से कम दो लडकियों को उनके परिवार खो चुका है. अफसोस की बात है कि दोनों लडकियां अपने से बहुत कम शिक्षित एवं अपने बौद्धिक स्तर पर अपने से काफी नीचे स्तर के लडकों के साथ अपना घर छोड कर गई हैं. धर्म बदला तो बदला,&#160; शादी की तो की, लेकिन ऐसे बेमेल लडकों के साथ की सारा जीवन मानसिक नरक बना रहेगा. परिवार को छोड देने के कारण अपने लोगों से मिलनाजुलना भी नहीं हो पायगा.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar02.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Akbar02" border="0" alt="Akbar02" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar02_thumb.jpg" width="240" height="189" /></a> धार्मिक-सामाजिक सहिष्णुता अच्छी बात है, लेकिन जिस तरह से अच्छी से अच्छी दवा का भी पार्श्वफल बुरा होता है उसी तरह सहिष्णुता का एक बुरा फल है यह. कई मित्र कहेंगे कि इसका हल है कि जम कर इन जिहादियों के साथ मारपीट की जाये. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति कानूनन तरीके से अवांछित कार्य करता है तो उसे न तो कानून की सहायता से सीधा किया जा सकता है, न बलप्रयोग के द्वारा. बलप्रयोग करने जायेंगे तो कानून आपकी खबर ले लेगा और जिसने जिहाद चलाया है उसे सुरक्षा मिल जायगी. इतना ही नहीं प्रेमपाश फैलाने वाले कुछ मुस्लिम युवाओं के साथ हिंसा की जाये तो इसके कारण ईसाई या हिन्दू लडकियों की आंख नहीं खुल जायगी. आंखें ज्ञान के द्वारा खोली जाती हैं, न कि हिंसा के द्वारा.</p>
<p align="justify">सभ्य समाज में शिक्षादीक्षा, जानकारी का प्रसार अदि ऐसे अस्त्रशस्त्र हैं जिनकी मदद से यह कार्य होना चाहिये. केरल में यह कार्य कुछ साल पहले शुरू हो चुका है. इसके लिये अलग अलग लोगों ने अलग अलग प्रकार के ज्ञान-आधारित हथियार चुने हैं. मैं जब इस कार्य लिये मैदान में कूदा तो मैं नें (जैसा होना था) शास्त्रार्थ का सहारा लिया. </p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar03.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Akbar03" border="0" alt="Akbar03" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/11/Akbar03_thumb.jpg" width="216" height="240" /></a> पहले और दूसरे चित्र में आप मुझे&#160; देख सकते हैं जहां मैं मलयालम भाषा में शास्त्रार्थ करते हुए दिख रहा हूँ. बगल के तीसरे चित्र में आप मेरा विरोध करने वाले मुस्लिम वक्ता को देख सकते हैं. इस शास्त्रार्थ के बाद मैं ने कई बार उनको पुन: सबके समक्ष इसी तरह शास्त्रार्थ करने के लिये निमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने कभी भी उसे स्वीकार नहीं किया.</p>
<p align="justify">सभ्य समाज की मांग सभ्य तरीकों की है, मारपीट की नहीं. कर्नाटका के अंग्रेजी-शाराबखाने में लडकियों के साथ मारपीट के बाद लडकियों द्वारा शराब-पान बंद नहीं हुआ. हिसा से कुछ नहीं होताजाता है.</p>
<p align="justify">लेकिन आप कहेंगे कि सभ्य तरीकों से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती. सही है. लेकिन यह तरीके का दोष नहीं है. कोई भी ऐसा तरीका नहीं है जिसके द्वारा ऐसी समस्याओं का पूर्ण हल निकल सके. ऐसा होता तो आज दुनियां अपराध से एकदम मुक्त होती.</p>
<p align="justify">लव-जिहाद एक वास्तविकता है. यह केरल से आरंभ हुई है क्योंकि केरल हर तरह से सहिष्णु है. इसका हल यह है कि जिस तरह अपने बच्चों को सुरक्षित तरीके से सडक पर चलना सिखाते हैं उसी तरह हम अपने बच्चों को लव-जिहाद के&#160; यथार्थ से परिचित करवायें.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="center"><font size="1"><a title="indian coins encyclopedia, free articles, free ebooks, indian coins, numismatics, free indian coin ebooks" href="http://www.IndianCoins.org">Indian Coins</a> | </font><a title="free india tourist guide, india tour, Indian tourism, travel guide, free travel information, visit india, taj mahal, indian history, archeology" href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">India Tourism</font></a><font size="1"> | </font><a title="comprehensive information india, indian history, customs, culture, encyclopedia, festivals, informtion, guide, free articles, free information" href="http://www.allthingsindian.org"><font size="1">All About India</font></a><font size="1"> | </font><a title="work at home, free income guide, net income guide, ad words courses, blogging for income, money for blogging, online courses, free course money making" href="http://www.Guide4Income.com"><font size="1">Guide For Income</font></a><font size="1"> | </font><a title="abc of, physics made simple, ABC of physics, simplified, guide, made simple, explained, easy articles" href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics For You</font></a><font size="1"> | </font></p>
<p align="center"><font size="1">&#160;</font></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://sarathi.info/archives/2576/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>20</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
