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	<title>सारथी</title>
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	<description>शास्त्री जी  का विश्वकोश, विभिन्न विषयों पर आधिकारिक जानकारी !!</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 00:42:23 +0000</pubDate>
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	<language>en</language>
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		<title>क्या आर्यों का &#8216;पणि&#8217; सिंधु सभ्यता से आया?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270</link>
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		<pubDate>Mon, 12 May 2008 00:42:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[  विजयशंकर चतुर्वेदी
शास्त्री जेसी फिलिप ने एक पोस्ट में मैसूर से श्रीलंका तक प्रचलित फणम या पणम सिक्कों का ज़िक्र किया था। उनकी यह पोस्ट काफी जानकारियां देती है. उसमें मैं भी कुछ जोड़ना चाहूंगा. (दुनियां के सबसे छोटे सिक्के!, ट्रावन्कोर सिल्वर फणम (फन नहीं)!)
ऋगवैदिक काल में व्यापार पर जिस समूह का एकाधिकार था उसे [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img height="136" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_EfGk5RcqPUs/SBFsVmcUQ4I/AAAAAAAAAII/blh78ixl3u0/S220/VC.jpg" width="150"> <span style="color: #0080c0"><font face="Mangal" size="2">विजयशंकर चतुर्वेदी</font></span></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><strong>शास्त्री जेसी फिलिप</strong> ने एक पोस्ट में मैसूर से श्रीलंका तक प्रचलित फणम या पणम सिक्कों का ज़िक्र किया था। उनकी यह पोस्ट काफी जानकारियां देती है. उसमें मैं भी कुछ जोड़ना चाहूंगा. (<a href="http://sarathi.info/archives/1255">दुनियां के सबसे छोटे सिक्के!</a>, <a href="http://sarathi.info/archives/1263">ट्रावन्कोर सिल्वर फणम (फन नहीं)!</a>)</p>
<p><font face="Mangal" size="2">ऋगवैदिक काल में व्यापार पर जिस समूह का एकाधिकार था उसे &#8216;पणि&#8217; कहकर पुकारते थे। प्रारंभ में व्यापार विनिमय द्वारा होता था लेकिन बाद में निष्क नामक आभूषण का प्रयोग एक सिक्के के रूप में होने लगा था. लेकिन तब भी गायों की संख्या से किसी वस्तु का मूल्य आँका जाता था, जैसा कि ऋगवेद के एक मन्त्र में इन्द्र द्वारा गायें देकर प्रतिमा लेने का उल्लेख आया है. लेकिन उस काल के आर्यों के विदेशों से व्यापारिक सम्बन्ध होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं. उत्तरवैदिक काल में बड़े व्यापारियों को श्रेष्ठिन कह कर बुलाया जाने लगा। निष्क के अलावा शतमान, कर्षमाण आदि सिक्के भी प्रचलन में आ गए थे. </font>
</p>
<p>यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋगवैदिक काल में व्यापारियों को &#8216;पणि&#8217; कहा जाता था। तब शास्त्री जी द्वारा सुझाया गया नाम फणम या पणम का मूल कहीं वही &#8216;पणि&#8217; तो नहीं? द्रविण कुल की भाषाओं में अधिकांशतः संस्कृत की विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है. अतः पणि से पणम या फणम हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं. शास्त्री जी ने लिखा है कि तमिल और मलयालम में पणम का मतलब होता है धन। ये दोनों द्रविड़ कुल की भाषाएं हैं. इससे एक कड़ी और जुड़ती है.</p>
<p>सिंधु घाटी की सभ्यता एक नगर सभ्यता थी। विद्वानों में अभी एकराय नहीं है लेकिन अधिकांश यही मानते हैं कि यह द्रविड़ सभ्यता थी। सिंधु घाटी से उत्खनन में मातृ देवी तथा शिव (पशुपतिनाथ) की मूर्तियाँ मिली हैं. इसे मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है। यहाँ के निवासी काले रंग के थे। इनका व्यापार बहुत बढ़ा-चढ़ा हुआ था. दक्षिण भारत में भी मातृसत्तात्मक समाज रहा है और मलयाली समाज में तो अब तक इसके अवशेष मिल जाते हैं. इन समाजों में शिव की पूजा होती है।</p>
<p>इसके विपरीत आर्यों के न तो विदेशो से व्यापारी सम्बन्ध थे न ही इनके पास कोई देवी थी, लगभग सारे देवता पुरूष थे। चूंकि सिंधु सभ्यता की लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है इसलिए यह कहना कठिन है कि वे लोग व्यापारियों को क्या कह कर बुलाते थे. लेकिन यह स्थापित हो चुका है कि सिंधु सभ्यता के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध विदेशों से थे. इस काल के लोगों के व्यापारिक सम्बन्ध मिस्र, ईरान तथा बेबीलोनिया तक से थे. व्यापार जल और थल दोनों मार्गों से होता था.</p>
<p><strong>सुमेरिया में ऐसी मोहरें प्राप्त हुई हैं जो हड़प्पा और मोहनजोदाडो में उत्खनन से प्राप्त मोहरों से समानता रखती हैं। मेसोपोटामिया में भी सिंधु सभ्यता के अनेक अवशेष तथा वस्तुओं का प्राप्त होना दोनों सभ्यताओं के सम्पर्क का प्रमाण है. इराक़ के एक स्थान पर वस्त्रों की गाँठें मिली हैं जिन पर सिंधु की मोहरों की छाप है. कहने का तात्पर्य यह कि सिंधु सभ्यता में एक बड़ा व्यापारी वर्ग मौजूद था.</strong></p>
<p>अब बात आर्यों की करते हैं। यह भी लगभग सिद्ध हो चुका है कि आर्य मध्य एशिया से आए थे. जर्मन विद्वान मैक्समूलर के अनुसार ईरान के धार्मिक ग्रन्थ &#8216;अवेस्ताँ&#8217; तथा आर्यों के धार्मिक ग्रन्थ &#8216;वेद&#8217; में पर्याप्त समानता है अतः अधिक प्रतीत यह होता है कि दोनों जातियाँ पास-पास रहती होंगी. पशुपालन तथा कृषिकर्म आर्यों का प्रमुख व्यवसाय था जो विशाल मैदानों में ही सम्भव है. घास के ये विशाल मैदान मध्य एशिया में ही प्राप्त होते हैं. इसके अलावा आर्यों के देवता भी मध्य एशिया के देवी-देवताओं से काफी समानता रखते थे.</p>
<p>आर्यों के देवता इन्द्र को नगरों का नाश करने वाला कहा गया है। याद रखना चाहिए कि इन्द्र ऋगवैदिक काल में आर्यों का प्रधान देवता था. लेकिन ऋगवैदिक सभ्यता में नगर थे ही नहीं. ऋगवैदिक आर्य भवन निर्माण कला और नगर योजना भी नहीं जानते थे. ये लोग कच्चे या घास-फूस के मकान बनाते थे. यह एक पूरी तरह ग्रामीण सभ्यता थी. तब इन्द्र ने कौन से नगरों को नष्ट किया था? जाहिर है सिंधु सभ्यता के नगरों को. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आगे चलकर यही इन्द्र एक पीठ बन गया था जैसे कि आज के शंकराचार्य.</p>
<p>गार्डन वाइल्ड तथा व्हीलर के मत में सिंधु सभ्यता के पतन का मुख्य कारण आर्यों का आक्रमण था। दोनों विद्वानों के अनुसार सिंधु सभ्यता के नगरों में सड़कों, गलियों तथा भवनों के आंगनों में मानव अस्थिपंजर मिले हैं जिससे सिद्ध होता है कि बाहरी आक्रमणों में अनेक लोग मारे गए थे.</p>
<p>अब प्रश्न यह उठता है कि ऋगवैदिक सभ्यता में व्यापारियों को पणि कहा गया तो यह शब्द आया कहाँ से?यहाँ एक बात उल्लेखनीय है की सिंधु सभ्यता के लोगों को लेखन का ज्ञान था लेकिन वैदिक आर्य लेखन से अपरिचित थे। सिंधु घाटी में उत्खनन से अब तक २४६७ लिखित वस्तुएं प्राप्त हो चुकी हैं. इनकी लिपि इडियोग्राफिक (भावचित्रक) है. कुछ विद्वानों के मुताबिक यह चित्र लिपि है. प्रोफेसर लैगडैन का मानना है कि यह मिस्र की चित्र लिपि से अधिक समानता रखती थी.</p>
<p>आर्यों ने आक्रमण करके सिंधु सभ्यता के नगरों को क्रमशः नष्ट किया होगा। यह कोई एक दिन में तो हो नहीं गया था. आर्य सिंधु सभ्यता के सम्पर्क में आए होंगे. ऋग्वेद में ऐसे लोगों का उल्लेख मिलता है जिनका रंग काला है और नाक चपटी. जाहिर है ये सिंधु सभ्यता के लोग थे. ऐसे में आर्यों को वहाँ से सुनकर अनेक शब्द मिले होंगे. जब सिंधु लिपि पढ़ ली जायेगी तब पता चलेगा कि आर्य कुल की भाषाओं में कितने शब्द सिंधु लिपि के समाये हुए हैं. अंदाजा लगाया जा सकता है कि सिंधु सभ्यता में व्यापारियों को पणि कहा जाता रहा होगा.</p>
<p>गौर करने की बात यह भी है कि सिंधु घाटी से जो लगभग ५५० मुद्राएं मिली हैं उनका आकार गोलाकार तथा वर्गाकार दोनों तरह का है। मुद्राओं पर एक ओर पशुओं के चित्र बने हैं तथा दूसरी ओर कुछ लिखा हुआ है. इन मुद्राओं को कहीं पणम तो नहीं कहा जाता रहा होगा? जैसा कि द्रविड़ कुल के तमिल और मलयालम समाज में धन! पणि यानी व्यापारी और पणम माने मुद्रा! यह संयोग मात्र नहीं हो सकता कि मैसूर से लेकर श्रीलंका तक फणम या पणम नामक सिक्के चलते थे.</p>
<p>द्रविड़ मानते हैं कि श्रीलंका में सिंहली लोगों से पहले उनकी ही बस्तियां थीं। हो सकता है कि आर्यों के आक्रमण के बाद सिंधु घाटी की बची-खुची जातियाँ जान बचाकर दक्षिण भारत से भी परे श्रीलंका में जा बसी हों. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सिंधु घाटी के निवासी समुद्र से परिचित थे लेकिन आर्य नदियों को ही समुद्र कहते थे. सिंधु घाटी का समाज मूलतः व्यापार आधारित समाज था और नदियों में नौकाओं तथा समुद्र में जहाजों के जरिये इनका व्यापार चलता था. हो सकता है यही द्रविड़ जातियाँ पणम जैसे अनेक शब्द समुद्र पार कर श्रीलंका तक अपने साथ ले गयी हों.&nbsp; कुल मिलाकर यह दूर की कौड़ी लाने की कोशिश ही है.</p>
<p></font></p>
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		<item>
		<title>करोडों सिक्के गला दिये गये!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1269</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1269#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 00:42:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[ 
सिख कौम हमेशा ही भारत के विदेशी आक्रमणकारियों के लिये सरदर्द का कारण रही है. उनके गुरुओं ने उनको स्वतंत्रता का जो पाठ पढाया था उस कारण उन्होंने हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों का विरोध जान देकर किया. अनुमान है कि पंजाब पर नियंत्रण पाने के पहले लगभग 200,000 सिखों को मुगल शासकों ने निर्दयता के साथ [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: x-small; font-family: mangal"></span></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सिख कौम हमेशा ही भारत के विदेशी आक्रमणकारियों के लिये सरदर्द का कारण रही है. उनके गुरुओं ने उनको स्वतंत्रता का जो पाठ पढाया था उस कारण उन्होंने हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों का विरोध जान देकर किया. अनुमान है कि पंजाब पर नियंत्रण पाने के पहले लगभग 200,000 सिखों को मुगल शासकों ने निर्दयता के साथ मार डाला था. युद्द में जो सिख मारे गये थे उनकी संख्या इसमें शामिल नहीं है.</font></p>
<table cellspacing="0" cellpadding="5" width="400" border="0">
<tbody>
<tr>
<td valign="top" width="400">
<p align="center"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/amritsarmint1835-ksbahra27.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="101" alt="AmritsarMint1835_ksbahra27" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/amritsarmint1835-ksbahra27-thumb.jpg" width="244" border="0"></a></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td valign="top" width="400">
<p align="center"><font face="Mangal" size="2">अमृतसर के टकसाल में ढाला गया एक सिख सिक्का<br />सिख सिक्का-समूह से साभार</font></span></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-size: x-small; font-family: mangal"></span></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मुगलों के बाद सिखों ने अंग्रेजों का भी डट कर विरोध किया. लेकिन अंग्रेज कौम के उन्नत हथियार, लाखों की फौज, एवं अन्य भारतीय राज्यों से मिली मदद के कारण उन्होंने अंत में सिखों को एवं पंजाब को अपने नियंत्रण में ले लिया. ऐसा करने के बात अंग्रेजी कौम ने सिख स्वाभिमान को तहस नहस करने के लिये हर नीच चाल चली. इन में से एक नीच कार्य था सिखों के सिक्कों को गला देने का.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सिख शासकों ने चांदी के एक से एक सिक्के अपने टकसालों में ढाले थे. यह उनकी शान एवं पहचान थी. इसे समझ कर अंग्रेजों ने उन सिक्कों को न केवल बंद करवा दिया बल्कि दो जहाज भर कर सिक्कों को ले जाकर गला कर उन से अंग्रेजों के सिक्के बना दिये. इस तरह भारत देश के एक अमूल्य एतिहासिक दस्तावेज का काफी हिस्सा अंग्रेजों ने लुप्त कर दिय.</font></p>
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		</item>
		<item>
		<title>चिट्ठाकारी एवं अर्थलाभ</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1266</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1266#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 05 May 2008 00:42:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[  मैं ने अपने कई चिट्ठों में अर्थलाभ के बारे में बताया था. कई चिट्ठाकारों का कहना है कि वे तो सिर्फ स्वांत: सुखाय लिखते हैं अत: अर्थलाभ-हानि से उनको कुछ लेनादेना नहीं है. मैं ने चिट्ठाकारी शौकिया शुरू की थी लेकिन आय से मुझे परहेज नहीं है. बल्कि मेरा मानना है कि आय तो [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/shastri1-100.jpg"><font face="Mangal" size="2"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 25px 5px 0px; border-right-width: 0px" height="171" alt="shastri1_100" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/shastri1-100-thumb.jpg" width="100" align="left" border="0"></font></a><font size="2"> मैं ने अपने कई चिट्ठों में अर्थलाभ के बारे में बताया था. कई चिट्ठाकारों का कहना है कि वे तो सिर्फ स्वांत: सुखाय लिखते हैं अत: अर्थलाभ-हानि से उनको कुछ लेनादेना नहीं है. मैं ने चिट्ठाकारी शौकिया शुरू की थी लेकिन आय से मुझे परहेज नहीं है. बल्कि मेरा मानना है कि आय तो आगे बढने में काफी प्रोत्साहन देता है. </font></p>
<p><font size="2">पिछले 3 महीने से मैं हिन्दी एवं अंग्रेजी में आय की संभावनाओं पर अनुसंधान कर रहा था. अपने चिट्ठे पर भी तमाम तरह के विज्ञापन लगा करे देखे. कुल मिला कर मेरे निष्कर्ष निम्न हैं:</font></p>
<p><font size="2">** गूगल विज्ञापन हिन्दी में आय का सबसे अच्छा जरिया है. अन्य कोई भी विज्ञापन इसके पास भी नहीं आ पाता.</font></p>
<p><font size="2">** हिन्दी में विज्ञापनदाता अंग्रेजी की तुलना में कम है, लेकिन उनकी संख्या बढ रही है जो चिट्ठाकारों के लिये प्रोत्साहन की बात है.</font></p>
<p><font size="2">** जिस दिन आपका चिट्ठा 200 से अधिक पाठक प्रति दिन आकर्षित करने लगेगा, उस दिन से आप का जेबखर्च निकलना शुरू हो जायगा.</font></p>
<p><font size="2">** सन 2010 के अंत तक हिन्दी चिट्ठों पर पाठकों की संख्या, एवं हिन्दी पाठकों की क्रयशक्ति, दोनों ही, आज से लगभग दस गुना हो जायेंगे. </font></p>
<p><font size="2"><font face="Mangal">** विषयाधारित चिट्ठे अन्य चिट्ठों की तुलना में अधिक आय देते हैं.</font></font></p>
<p><font size="2"><font face="Mangal">** अत: यदि आप आय चाहते हैं तो आपको सन 2010 के लिये अभी से तय्यारी शुरू कर देनी चाहिये.</font></font></p>
<ul><font face="Mangal" size="2"></font></ul>
<p><span style="color: #0080c0"><strong>मेरे पुराने लेख:</strong></span></p>
<li><a href="http://sarathi.info/archives/1171">चिट्ठे से आय की तय्यारी 004</a>
<li><a href="http://sarathi.info/archives/1165">चिट्ठे से आय की तय्यारी 003</a>
<li><a href="http://sarathi.info/archives/1161">चिट्ठे से आय की तय्यारी 002</a>
<li><a href="http://sarathi.info/archives/1158">चिट्ठे से आय की तय्यारी 001</a></li>
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		<item>
		<title>ट्रावन्कोर सिल्वर फणम (फन नहीं)!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1263</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1263#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 03 May 2008 00:42:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[भारत]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1263</guid>
		<description><![CDATA[  कुछ दिन पहले मैं ने दुनियां के सबसे छोटे सिक्के! लेख में फानम (फणम, पणम) नामक सिक्के के बारे में बताया था. तमिल और मलयालम में पणम का मतलब होता है धन, एवं यह नाम वहीं से आया है. फणम दुनियां के सबसे छोटे सिक्के हैं.
फानम का प्रचार मैसूर से लेकर श्रीलंका तक था. [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/travancoresilverfanam-350px-o.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 30px 5px 0px; border-right-width: 0px" height="369" alt="TravancoreSilverFanam_350px_O" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/travancoresilverfanam-350px-o-thumb.jpg" width="300" align="left" border="0"></a><font face="Mangal" size="2"> कुछ दिन पहले मैं ने <a href="http://sarathi.info/archives/1255">दुनियां के सबसे छोटे सिक्के!</a> लेख में फानम (फणम, पणम) नामक सिक्के के बारे में बताया था. तमिल और मलयालम में पणम का मतलब होता है धन, एवं यह नाम वहीं से आया है. फणम दुनियां के सबसे छोटे सिक्के हैं.</p>
<p>फानम का प्रचार मैसूर से लेकर श्रीलंका तक था. 1600 से 1800 तक के नमूने मिल चुके हैं, लेकिन अनुमान है कि 1300 इस्वी से इनका निर्माण प्रारंभ हो गया था. </p>
<p>आज मैं ट्रावन्कोर (आजकल दक्षिण केरल) राज्य का फाणम आपकी जानकारी के लिये लाया हूँ. पिछले लेख में इनकी नापतौल न होने के कारण पाठकों को इनके बारे में सही अनुमान न लग सका था. हां ज्ञान जी ने जरूर अनुमान लगाया था कि ये गेंहूँ के दाने के तुल्य होंगे. वास्तव में इनका व्यास अशोकनगर के अच्छे किस्म के गेंहूं की लम्बाई के तुल्य, या कम, होता है.</p>
<p>इधर दिनेश जी ने आदेश दिया कि सही माप बताई जाय. अत: इस बार एक रुपये के नये सिक्के, एवं सेंटीमीटर के स्केल को भी साथ में लगा दिया है. उम्मीद है अब मित्रगण सही अनुमान लगा सकेंगे. </p>
<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/travancoresilverfanam-350px-r.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 30px 5px 0px; border-right-width: 0px" height="384" alt="TravancoreSilverFanam_350px_R" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/travancoresilverfanam-350px-r-thumb.jpg" width="300" align="left" border="0"></a> चूकि ये सिक्के इतने छोटे होते थे, अत: इन को सामान्यतया सिर्फ चांदी या सोने से ही निर्मित किया जाता था. लेकिन यदा कदा इनका निर्माण तांबे से भी हुआ है लेकिन वे इतने विरल हैं कि अभी तक मेरी नजर में नहीं आये हैं. </p>
<p>ऐसा अनुमान है कि विभिन्न प्रकार के जो फणम मैसूर से श्रीलंका तक बनाये गये थे उनकी संख्या 100 से 500 के बीच रही होगी. अब सिक्के इकट्ठा करने वालों के पास भी ये विरल होते जा रहे हैं, एवं अभी तक मेरी नजर में सिर्फ दस प्रकार के फणम आये हैं. इन में भी सिर्फ दो प्रकार के ही चित्र ले पाया हूँ. उम्मीद है कि कम से कम तीन और प्रकार के फणमों के चित्र इस महीने ले सकूंगा. </p>
<p>इस विषय पर कुल मिला कर सिर्फ एक पुस्तक मेरी नजर आया है, लेकिन वह भी एक जर्मन लेखक ने लिखा है. उम्मीद है कि जल्दी ही इस विषय पर मैं एक रंगबिरंगा एवं सचित्र, लेकिन मुफ्त ईपुस्तक लिख सकूंगा. इस दिशा में कार्य चल रहा है. </font></p>
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		</item>
		<item>
		<title>पैसा नहीं बल्कि देशप्रेम!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1258</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1258#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 02 May 2008 00:42:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1258</guid>
		<description><![CDATA[  पिछले कई सालों से मैं भारत के एतिहासिक स्थानों का अध्ययन कर रहा हूँ एवं अगली पीढियों के लिये इन धाराशाई होते एतिहासिक स्थानों के उच्च किस्म के छायाचित्र उतार रहा हूँ. इन यात्राओं के दौरान कई महानुभवों से मुलाकात होती है जिनके आगे मेरा मन नतमस्तक हो जाता है.
इस चित्र में दिख रहे [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/rakeshmishra.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 20px 5px 0px; border-right-width: 0px" height="214" alt="RakeshMishra" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/05/rakeshmishra-thumb.jpg" width="200" align="left" border="0"></a><font face="Mangal" size="2"><font face="Mangal" size="2"> पिछले कई सालों से मैं भारत के एतिहासिक स्थानों का अध्ययन कर रहा हूँ एवं अगली पीढियों के लिये इन धाराशाई होते एतिहासिक स्थानों के उच्च किस्म के छायाचित्र उतार रहा हूँ. इन यात्राओं के दौरान कई महानुभवों से मुलाकात होती है जिनके आगे मेरा मन नतमस्तक हो जाता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">इस चित्र में दिख रहे श्री राकेश मिश्रा जी (सब के पंडित जी) ग्वालियर किले पर गाईड हैं. शारीरिक रूप से काफी श्रम का काम है. लगभग डेढ घंटे तक लोगों को घुमाकर स्थानपरिचय करवाने पर सौ रुपया मिल जाता है. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">तीन साल पहले मैं कुछ मित्रों को ग्वालियर किला दिखाने ले गया तो इनको गाईड के रूप में उनके साथ भेजा, और यह हमारी पहली मुलाकात थी. उसके बात अगले दो बार मैं किले पर छायाचित्र उतारने गया तो भी इन से मुलाकात हुई. जब इन छायाचित्रों को उतारने का लक्ष्य इनको मालूम हुआ तो इन्होंने न केवल मुझे जबर्दस्ती काफी दुर्गम स्थानों पर घुमाया, चित्र खीचने को कहा, बल्कि एक भी पाई पारिश्रमिक लेने से मना कर दिया. इन्होंने इस तरह अपने परिवार की रोजी रोटी कमाने के बदले देशप्रेम के लिये अपनी कमाई निछावर कर दी. मैं ने जबर्दस्ती इनकी जेब में कुछ रुपये डाले तो वे रुआंसे हो गये. गर्व है मुझे ऐसे देशाभिमानी लोगों पर.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">इस बार भी उन्होंने अपनी ओर से मुझे काफी जानकरी दी एवं मुझे अपने अनुसंधानों के परिणाम उनको बताने का अवसर मिला. यदि आप कभी ग्वालियर किले पर जाये तो 0975 435 5976 पर संपर्क करके इनकी सेवा जरूर लें. </font></font></p>
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		<title>दुनियां के सबसे छोटे सिक्के!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1255</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1255#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 28 Apr 2008 00:42:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[  पिछले दिनों मैं ने अपने नये शौक &#8220;सिक्का संग्रह&#8221; के बारे में सूचना दी थी. तब सारथी के मित्रों ने इस विषय पर हिन्दी में लिखने का आग्रह किया था. पेश है पहला लेख. अंग्रेजी जाल आप Coins Encyclopedia पर देख सकते हैं.
दुनियां का सबसे छोटा सिक्का हिन्दुस्तान में चलता था. अनुमान है कि [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img style="margin: 0px 5px 10px 0px" alt="" src="http://coinsencyclopedia.org/wp-content/uploads/2008/04/cochinsilver001-thumb.jpg" align="left"><font face="Mangal" size="2"> पिछले दिनों मैं ने अपने नये शौक &#8220;सिक्का संग्रह&#8221; के बारे में सूचना दी थी. तब सारथी के मित्रों ने इस विषय पर हिन्दी में लिखने का आग्रह किया था. पेश है पहला लेख. अंग्रेजी जाल आप</font> <a title="Coins, india coins, indian numismatics, collect, exchange, sell, buy ancient indian coins,  articles, resources, free courses, free studies, indian coins, pictures, photographs, catalogs, books indian coins" href="http://www.CoinsEncyclopedia.org">Coins Encyclopedia</a> <font face="Mangal" size="2">पर देख सकते हैं.</p>
<p>दुनियां का सबसे छोटा सिक्का हिन्दुस्तान में चलता था. अनुमान है कि 1300 ईस्वी में इसका आरंभ हुआ. 1600 ईस्वी के सिक्के आजकाल संग्राहकों के पास उपलब्ध हैं. इन सिक्कों को फानम या फाणम कहा जाता है जो दक्षिण-भारतीय पणम (धन) का अपभ्रंश है. </span></p>
<p>मैसूर से लेकर श्रीलंका तक इनका चलन था, एवं ये सिर्फ चांदी या सोने के बनते थे. चित्र में चादी को &#8220;कोचिन फानम&#8221; आप देख सकते हैं. ये इतने छोटे हैं कि एक रुपये के सिक्के पर ऐसे पांच सिक्के आ जायें. कोचिन फानम में अकसर एक ओर एक देवी का चित्र एवं दूसरी ओर कुछ अन्य चित्र दिखते हैं. आजकाल मैं इन पर अनुसंधान कर रहा हूँ एवं जल्दी ही और विस्तार से लिखूंगा.</p>
<p>आजकल फानम चलते नहीं है, लेकिन संग्रह की वस्तु है. आजकल एक चांदी का फानम 100 रुपये से लेकर एक सोने का फानम 4000 रुपये तक का आता है. अत: यह औसत व्यक्ति के वश का शौक नहीं है. मैं ने पिछले 2 महीनों में पाच रुपये से लेख पचास हजार रुपये तक के पुराने सिक्के देखे हैं, एवं विक्रेता लोग कहते हैं कि उनके पास 200,000 रुपये तक मूल्य के सिक्के हैं! अगले लेखों में कुछ और जानकारी दूंगा.</font></p>
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		<title>यह ज्ञान कब तक बचेगा ?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1254</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1254#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 21 Apr 2008 16:16:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
		<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[  कुछ महीने पहले मैं ने लुप्त होते भारतीय ज्ञान एवं कलाओं की ओर इशारा किया था. उस लेख में मैं ने केरल के एक दुर्लभ आईने का नाम लिया था जो श्रेष्ठतम कांच के आईने के तुल्य होता है लेकिन जस्तेसमान किसी धातु का बना होता है. यह गिरने पर टूटता नहीं है, एवं [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/aranmulaa.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 10px 10px 0px; border-right-width: 0px" height="609" alt="AranmulaA" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/aranmulaa-thumb.jpg" width="350" align="left" border="0"></a><font face="Mangal" size="2"> कुछ महीने पहले मैं ने लुप्त होते भारतीय ज्ञान एवं कलाओं की ओर इशारा किया था. उस लेख में मैं ने केरल के एक दुर्लभ आईने का नाम लिया था जो श्रेष्ठतम कांच के आईने के तुल्य होता है लेकिन जस्तेसमान किसी धातु का बना होता है. यह गिरने पर टूटता नहीं है, एवं सालों के बाद भी इसकी गुणवत्ता में कमी नहीं आती है.</p>
<p>कल एक व्यापारी मित्र ने एकदम नया आरन्मुला-आईना दिखाया. इसकी कीमत लगभग 3000 रुपये है, एवं रोज दर्जनों आईने विदेशी लोग खरीद ले जाते हैं. यह हर भारतीय के लिये खुशी की बात है, एवं इस तरह का अद्भुत ज्ञान हर भारतीय के लिये गर्व की बात है. लेकिन अफसोस की भी एक बात है &#8212; सैकडों साल पुराना यह अद्भुत एवं विरल तकनीकी ज्ञान आज भी एक परिवार के पास सीमित है. इसका रहस्य उस परिवार के बाहर आज तक किसी को नहीं मालूम है.</p>
<p>जिस तेजी से केरल की नई पीढी परंपरागत ज्ञान एवं पेशों की उपेक्षा करके नये पेशों की और दौड रही है उस हिसाब से जल्दी ही इस अद्भुत&nbsp; तकनीकी ज्ञान का वही हाल होगा जो कुतुब मीनार के पास लगे लोहे की लाट का होगा. आज तक किसी को नहीं मालूम है कि वैसा अद्भुत जंगविरोधी लोहा कैसे बनाया गया. कल किसी को नहीं मालूम होगा कि आरन्मुला-आईना कैसे बनाया जाता था. बस देश विदेश में (विदेश में अधिक) काफी सारे नमूने रह जायेंगे कि हिन्दुस्तान में ऐसा भी कुछ होता था.&nbsp; [<font color="#0080c0">मेरा अनुरोध है कि देशप्रेमी लोग इस चित्र को अपने अपने चिट्ठे पर प्रदर्शित करके लुप्त होते ज्ञान के बारे में कम से कम एक लेख लिखें</font>]</font></p>
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		<title>कैसी पाश्विकता थी यह!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1251</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1251#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2008 00:42:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
मेरे पिछले लेख में मैं ने मनुष्य की स्वाभाविक बर्बरता पर लिखना शुरू किया था. मैं ने यह कहने की कोशिश की थी कि यदि स्त्रियां स्त्रियों के विरुद्ध अपराध करना बंद कर दे तो समाज में क्रातिकारी परिवर्तन आ जायगा. लेकिन जब तक स्त्रियां अपनों के ही विरुद्ध कार्य करते रहेंगे तो [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मेरे पिछले लेख में मैं ने मनुष्य की स्वाभाविक बर्बरता पर लिखना शुरू किया था. मैं ने यह कहने की कोशिश की थी कि यदि स्त्रियां स्त्रियों के विरुद्ध अपराध करना बंद कर दे तो समाज में क्रातिकारी परिवर्तन आ जायगा. लेकिन जब तक स्त्रियां अपनों के ही विरुद्ध कार्य करते रहेंगे तो पुरुष के स्त्रीविरोधी कार्यों पर नियंत्रण करना मुश्किल है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/samuthiri.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/samuthiri-thumb.jpg" style="border-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px" alt="Samuthiri" align="left" border="0" height="300" width="400" /></a> इस लेख में केरल के सामूतिरी राजाओं की बर्बरता की चर्चा करना चाहता हूं. आज से कुछ सौ साल पहले केरल के उत्तर का काफी इलाका इनके आधीन था. आज जो प्रदेश &#8220;केरल&#8221; नाम से जाना जाता है यह बहुत छोटे राज्यों में बंटा हुआ था.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सामुतिरी राज में हर साल एक बडा मेला लगता था. इस मेले का मुख्य आकर्षण हुआ करता था &#8220;ममांकम&#8221;. इसमें अन्य राजाओं के सैनिक इस राज्य के सैनिकों को चुनौती देते थे. एक एक करके द्वन्द्व युद्ध होता था एवं पराजित सैनिक को मारकाट कर एक कुएं में फेक दिया जाता था. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यदि सामूतिरी के विरोधी का सैनिक विजयी हो जाता था तो द्वन्द्व खतम नहीं होता था, बल्कि सामूतिरी का अगला सैनिक पाले में उतर जाता था. यह क्रम तब तक चलता था जब तक सामूतिरी अपनी श्रेष्टता न साबित कर लेता था. कल मेरे बेटे आनंद की नजर में यह कुआ अचानक पड गया जब वह अपने साथी डाक्टरों से मिलने के लिये उत्तर केरल गया था. रात हो गई थी अत: चित्र, एकदम साफ नहीं है, लेकिन उपर के चित्र में आप इसकी रूपरेखा देख सकते हैं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यह कुआं पांच भागों में बना है. सबसे नीचे के हिस्से में सिर्फ एक आदमी के लायक व्यास है. उसके ऊपर का हिस्सा कुछ और चौडा है, एवं सबसे ऊपर का हिस्सा लगभग 30 फुट या अधिक व्यास का है. जब एक हारे/अधमरे योद्धा को उपर से डाल दिया जाता था तो एक &#8220;फनल&#8221; मे बहते द्रव के समान फिसल कर वह सबसे नीचे हिस्से में जा कर हिलडुल न सकने वाले एक तंग हिस्से में जाकर रक्त स्खलन एवं दम घुटने के कारण मर जाता था.  स्थानीय लोग कहते हैं कि कुएं के भीतर एक प्लेटफार्म पर एक हाथी खडा कर दिया जाता था जो अधमरे एवं उपर आने की कोशिश करने वाले योद्धाओं को कुचल कर निचले हिस्सों में भर देता था.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">एक छोटे राज्य की &#8220;महानता&#8221; को दिखाने का क्या तरीका था यह!! मनुष्य के समान बर्बर प्राणी और कोई है क्या??</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
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		<item>
		<title>हिंसा पर उतारू समाज</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1248</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1248#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 17 Apr 2008 12:47:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[  जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था, मेरे पेशाई सफलता से त्रस्त एक आदमी पिछले दो महीनों से मुझे परेशान किये जा रहा था. चाहे शारीरिक हो या मानसिक, दर्द कभी भी एक सामान्य व्यक्ति को आनंद नहीं देता है. इसके बावजूद जीवन में कभी कभी ऐसा होना अच्छा है क्योंकि: 
दु:ख [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/shastri1-100.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="171" alt="shastri1_100" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/shastri1-100-thumb.jpg" width="100" align="left" border="0" /></a> <font face="Mangal" size="2">जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था, मेरे पेशाई सफलता से त्रस्त एक आदमी पिछले दो महीनों से मुझे परेशान किये जा रहा था. चाहे शारीरिक हो या मानसिक, दर्द कभी भी एक सामान्य व्यक्ति को आनंद नहीं देता है. इसके बावजूद जीवन में कभी कभी ऐसा होना अच्छा है क्योंकि: </p>
<p>दु:ख में सुमिरन सब करे,    <br />सुख में करे न कोई.     <br />सुख में सुमिरन सब करे तो,     <br />दु:ख काहे को होय!!</p>
<p>इस अनुभव के कारण कई बातें सीखने को मिलीं. इन में से दो एतिहासिक बातें हैं. पहली बात एक किताब से मिली जो आज ही संयोग से मेरे हाथ पड गई. इसमें पिछले 200 सालों में स्त्रियों का जो शोषण हुआ है उसका अच्छा खासा चित्र खीचा गया है. इसमें सबसे ताज्जुब की बात यह लगी कि स्त्रीशोषण की जिम्मेदारी के लिये पुरुष का नाम&#160; सबसे अधिक लिया जाता है, लेकिन स्त्री का हिस्सा किसी तरह से कम नहीं है. </p>
<p>मेरे विश्वविद्यालय के एक साथी हमेशा मुझे याद दिलाया करते थे कि सास भी कभी बहू थी. लेकिन जब अधिकार उसके हाथ में आ जाता है तो पीडित की मदद करने के बदले एवं पीडा के मूल कारणों को दूर करने के बदले वह अगली पीढी को पीडित करने लगती है.</p>
<p>आजकल जाल पर स्त्रीविरोध एवं स्त्रीशोषण पर काफी कुछ लिखा जा रहा है. उसमें अधिकतर लेखक हमेंशा पुरुषों को दोषी मानते हैं. लेकिन इतिहास पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि स्त्रीपीडन के लिये स्त्रियां उतनी ही जिम्मेदार हैं जितना पुरुष. यदि कोई फरक है तो वह सिर्फ उन्नीसबीस का है.</p>
</p>
<p></font></p>
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		</item>
		<item>
		<title>मीडिया डाक्टर ??</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1245</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1245#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 11 Apr 2008 00:42:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
कुछ हफ्तों की गैरहाजिरी के बाद आजकल सारे चिट्ठों को बडी तेजी से पढने की कोशिश में हूं. इस बीच कुछ कारणों से मीडिया डाक्टर चिट्ठे के पुनरवलोकन का अवसर मिला तो मैं दंग रह गया. 
 
यह मैं ने बहुत पहले ही नोट किया था कि डा. प्रवीण चोपडा अच्छा लिखते है. [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कुछ हफ्तों की गैरहाजिरी के बाद आजकल सारे चिट्ठों को बडी तेजी से पढने की कोशिश में हूं. इस बीच कुछ कारणों से मीडिया डाक्टर चिट्ठे के पुनरवलोकन का अवसर मिला तो मैं दंग रह गया. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://drparveenchopra.blogspot.com/" target="_blank"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/mediadoca.jpg" style="border-width: 0px" alt="MediaDocA" border="0" height="184" width="420" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यह मैं ने बहुत पहले ही नोट किया था कि डा. प्रवीण चोपडा अच्छा लिखते है. लेकिन आजकल उनकी कलम में जो तेज भर गया है वह काबिले तारीफ है. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">आधुनिक समाज में व्यक्ति हर जगह धोखा खा रहा है, लूटा खसोटा जा है. अर्धसत्य अब सत्य का स्थान लेता जा रहा है. स्वास्थ्य के साथ तो बहुत अधिक खिलवाड हो रहा है.  डा प्रवीण के लेख स्वास्थ संबंधी मिथ्या धारणाओं, धोखाधडियों, एवं गलतफहमियों को बहुत स्पष्ट एवं विश्लेषणात्मक तरीके से समझाते हैं. यह चिट्ठा लगभग हर जागरूक व्यक्ति के नियमित पठन की सूची में होना चाहिये.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">तो देर किस बात की है. उपर दिख रहे चित्र पर किलकाईये, उनके चिट्ठे पर पहुंचिये एवं एक से एक उपयोगी लेखों का पाठ कीजिये. हां, इन अच्छे चिट्ठों को देखने के बाद &#8220;सारथी&#8221; को  भूल न जायें. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p class="akst_link"><a href="http://sarathi.info/?p=1245&amp;akst_action=share-this"  title="E-mail this, post to del.icio.us, etc." id="akst_link_1245" class="akst_share_link" rel="nofollow">Share This</a>
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		</item>
		<item>
		<title>हार की जीत !!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1243</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1243#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 10 Apr 2008 00:42:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
आज मन एकदम तरोताजा है अत:  एकदम व्यक्तिगत विषय पर लिखना चाहता हूँ. मेरे पेशाई सफलता के कारण कुछ लोग पिछले दो महीने से मुझे बहुत अधिक परेशान कर रहे थे. इनके वारों से बचने के लिये मुझे काफी समय बर्बाद करना पडा एवं सारा लेखन बंद हो गया. लेकिन जब उनका [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">आज मन एकदम तरोताजा है अत:  एकदम व्यक्तिगत विषय पर लिखना चाहता हूँ. मेरे पेशाई सफलता के कारण कुछ लोग पिछले दो महीने से मुझे बहुत अधिक परेशान कर रहे थे. इनके वारों से बचने के लिये मुझे काफी समय बर्बाद करना पडा एवं सारा लेखन बंद हो गया. लेकिन जब उनका सबसे सशक्त हथियार मेरी तरफ आया तो दिनेश जी ने उसके लिये सही समाधान बता दिया. इसके साथ मैं मानसिक रूप से एक दम निश्चिंत होकर लेखन में वापस आ गया हूं. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/anjcpa.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/anjcpa-thumb.jpg" style="border-width: 0px" alt="AnJCPA" border="0" height="326" width="450" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">इस बीच मुझे एवं मेरे बेटे को एक बुलावा आया, एवं मानसिक निश्चिंतता के कारण मैं अपने बेटे आनंद  के  साथ अगली सुबह ही निकल पडा. हमारे घर से 130 किलोमीटर दूर इस केंप केंद्र में लगभग 400 युवा मित्र एकत्रित हुए थे. हम दोनों को अलग अलग विषयों पर बोलना था. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/jcpsbs08a.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/jcpsbs08a-thumb.jpg" style="border-width: 0px" alt="JCPSBS08A" border="0" height="258" width="450" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मैं ने जीवन में मूल्यों की जरूरत पर क्लास लिया एवं विद्यार्थीयों ने इस विषय को बहुत अधिक पसंद किया. मेरे बेटे आनंद ने पढाई करने के सफल तरीकों पर क्लास लिया एवं उसे भी लोगों ने बहुत पसंद किया. लेकिन पहली बार मैं उससे हार गया जब लोगों ने कहा कि उसका प्रस्तुतीकरण मुझ से बेहतर, बोलने का तरीका मुझ से आकर्षक, एवं कुल फायदा मेरी कक्षा में बैठने से अधिक उसकी कक्षा में बैठने से हुआ. मैं पहली बार अपने बेटे से हार गया.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/anandsbs08a.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/anandsbs08a-thumb.jpg" style="border-width: 0px" alt="AnandSBS08A" border="0" height="400" width="450" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मैं ने अपनी हार के लिये ईश्वर को कोटि कोटि शुक्र अदा किया, क्योंकि मेरी हार मेरी जीत थी. पिछले 26 साल जो ट्रेनिंग उसे दी गई उस कारण आज वह मेरे ही पाले में मुझ से बेहतर निकला. मैं खुश हूं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हिन्दी चिट्ठाकारों में से कई मेरी उमर के हैं. वे निश्चित रूप से मुझ से सहमत होंगे कि मेरी यह हार मेरी जीत थी. जो मुझ से उमर में छोटे है, उनको मैं याद दिलाना चाहता हूं कि ईश्वर ने उनको जो बच्चे दिये हैं उन्हें ईश्वरदत्त निधि समझ कर अधिकतम समय उनके मानसिक पालनपोषण एवं नैतिक नीव डालनें में बितायें. आप को कभी भी अफसोस न होगा.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ईश्वर करें कि कल आप भी हार का मूँह देखें!!!</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
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		<item>
		<title>यह क्या हो सकता है?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1236</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1236#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 07 Apr 2008 19:37:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[ 
 
दिखने में तो यह रेलगाडी की पटरी लगती है, लेकिन यह है क्या. खिलौना रेल तो नहीं? इस बार ग्वालियर के आसपास एतिहासिक छायाचित्र खीचते समय मेरे सहायक उपाचार्य जिजो को तो यकीन नहीं हुआ कि यह सच है.
जी हां किसी जमाने में रेलगाडियां &#34;नेरो गेज&#34; पटरियों पर चला करती थीं. यह उसका जीताजागता [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/narrowguage-a.jpg"><img style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="564" alt="NarrowGuage_A" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/04/narrowguage-a-thumb.jpg" width="420" border="0" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">दिखने में तो यह रेलगाडी की पटरी लगती है, लेकिन यह है क्या. खिलौना रेल तो नहीं? इस बार ग्वालियर के आसपास एतिहासिक छायाचित्र खीचते समय मेरे सहायक उपाचार्य जिजो को तो यकीन नहीं हुआ कि यह सच है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">जी हां किसी जमाने में रेलगाडियां &quot;नेरो गेज&quot; पटरियों पर चला करती थीं. यह उसका जीताजागता अवशेष है. रेल विभाग इन गाडियों को काफी नुक्सान सह कर चला रहा है, लेकिन ग्वालियर के आसपास का राजनीतिक माहौल ऐसा है कि इसे बंद करने की हिम्मत किसी में नहीं है. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कुछ मजेदार बातें: अनुमान है कि अधिकतर यात्री टिकट नहीं खरीदते हैं. अति पुरातन पटरियों एवं रेल की हालत इतनी खस्ता है कि इसका वेग अधिकतर एक तेज सायकिल की रफ्तार से अधिक नहीं होती है. अत: लोग इस पर मनमाने तरीके से चढ उतरते हैं. त्यौहार के समय जितने लोग अंदर होते हैं, उतने ही लोग छत पर भी यात्रा करते हैं. सुरंग/नीचे पुल के आने पर गाडी रोक कर उन्हें उतारा जाता है, एवं सुरंग के बाद बैठा लिया जाता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कुछ साल पहले एक ड्राईवर ऐसा गुस्सा हुआ कि उसने सुरंग पर गाडी नहीं रोकी. बाकी कहानी का अनुमान आप लगा सकते हैं.</font></p>
<table cellspacing="0" cellpadding="5" width="450" border="1">
<tbody>
<tr>
<td valign="top" width="448"><font color="#0080ff"><font face="Mangal" size="2">आज का यह लेख एक दिनेशराय द्विवेदी जी को समर्पित है, क्योंकि जिस समस्या             <br /> ने मुझे लेखन से कुछ दिन दूर रखा था उसे आज उन्होंने हल कर दिया.               <br />स्नेही हिन्दीचिट्ठापरिवार के लिये मैं ईश्वर का अभारी हूं!!</font></font></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><font face="Mangal" size="2"></font></p>
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		<title>चिट्ठाकारी एवं ककनमठ</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1233</link>
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		<pubDate>Thu, 27 Mar 2008 00:42:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
 
भुवनेश, शास्त्री, डा. महेश प्रकाश. भुवनेश के घर के सामने
जैसे ही मैं ने पुरातत्व संबंधी बहुत ही महत्वपूर्ण &#8220;ककनमठ&#8221; जाने की इच्छा के बारे में सारथी में लिखा, उसी समय हिन्दी पन्ना के भुवनेश ने मुझे ईपत्र लिख कर एवं दूरभाष द्वारा ककनमठ एवं उसके लगभग 60 किलोमीटर व्यास के कई सारे [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/bhuvnesh.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/bhuvnesh-thumb.jpg" style="border-width: 0px" alt="Bhuvnesh" border="0" height="144" width="420" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#0000ff">भुवनेश, शास्त्री, डा. महेश प्रकाश. भुवनेश के घर के सामने</font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">जैसे ही मैं ने पुरातत्व संबंधी बहुत ही महत्वपूर्ण &#8220;ककनमठ&#8221; जाने की इच्छा के बारे में सारथी में लिखा, उसी समय <a href="http://www.hindipanna.blogspot.com/">हिन्दी पन्ना</a> के भुवनेश ने मुझे ईपत्र लिख कर एवं दूरभाष द्वारा ककनमठ एवं उसके लगभग 60 किलोमीटर व्यास के कई सारे महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी दी. उन्होंने इन स्थानों के चित्र भी भेजे. (उनके द्वारा सुझाये गये बटेश्वर एवं चौसठ योगिनी मंदिर के छायाचित्र के लिये इसी साल ग्वालियर वापस जाने का इरादा बना लिया है).</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/bhuvnesh2.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/bhuvnesh2-thumb.jpg" style="border: 0px none ; margin: 0px 20px 0px 0px" alt="Bhuvnesh2" align="left" border="0" height="171" width="150" /></a> ककनमठ यात्रा से लौटते समय हम भुवनेश के घर उतरे, पहली बार उन से मुलाकात की, चायनाश्ता किया एवं रात को घर वापस पहुंचे. भुवनेश से मुलाकात मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण था जितना ककनमठ का दर्शन. कारण स्पष्ट है &#8212; वे एक ऐसे मित्र हैं जो सिर्फ चिट्ठाकारी के कारण मुझे मित्ररूप में मिले हैं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">अत: आज का लेख मैं भुवनेश को समर्पित करता हुँ. इसके साथ साथ यह लेख उन सब वरिष्ट एवं कनिष्ट मित्रों को भी समर्पित है जो &#8220;सारथी&#8221; द्वारा मुझे मिले हैं.</font></p>
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		<title>आज भी ऐसे लोग हैं!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1228</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1228#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 00:42:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
 
ग्वालियर यात्रा के दौरान मैं एक डाकटिकट/सिक्का प्रदर्शनी में गया जहां हजारों साल पुराने भारतीय सिक्के प्रदर्शन के लिये रखे गये थे.
संयोग से, कुछ समय पहले पुरातत्व अध्ययन के कारण  इस विषय में भी मेरी रुचि जागृत हो चुकी है एवं http://www.CoinsEncyclopedia.Com  पर मेरे सहयोग से एक विश्वकोश तय्यार हो [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/abhay.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2008/03/abhay-thumb.jpg" style="border-width: 0px" alt="Abhay" border="0" height="250" width="420" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ग्वालियर यात्रा के दौरान मैं एक डाकटिकट/सिक्का प्रदर्शनी में गया जहां हजारों साल पुराने भारतीय सिक्के प्रदर्शन के लिये रखे गये थे.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">संयोग से, कुछ समय पहले पुरातत्व अध्ययन के कारण  इस विषय में भी मेरी रुचि जागृत हो चुकी है एवं <a href="http://www.CoinsEncyclopedia.Com">http://www.CoinsEncyclopedia.Com</a>  पर मेरे सहयोग से एक विश्वकोश तय्यार हो रहा है. इस बीच इस जालस्थल के मेरे सहयोगी ने भारतीय सिक्कों के बारे में लिखने के मामले में अपनी कठिनाई बताई अत:    <a href="http://www.CoinsEncyclopedia.org">http://www.CoinsEncyclopedia.org</a> पर हम ने भारतीय सिक्कों पर के विश्वकोश चालू कर दिया है जिस का संचालन मैं करूंगा. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">आज का भारत किसी समय 500 से 1000 छोटे राज्यों में बंटा था एवं इन में से कई राज्यों के अपने सिक्के थे. उदाहरण के लिये, सिंधिया राजाओं के राज्यकाल में उन्होंने कम से कम 250 सिक्के चलाये थे. इस तरह सब राज्यों का हिसाब देखें तो भरतीय सिक्कों का अध्ययन काफी कठिन हो जाता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ग्वालियर यात्रा के दौरान मेरी मुलाकात हुई श्रीमान अभय अग्रवाल से, जिन्होंने प्रदर्शनी में सैकडों अति प्राचीन भारतीय सिक्के प्रदर्शित किये थे. जैसे ही मैं ने अपनी रुचि बताई, मुझे एक प्रतियोगी न समझ कर, उन्होंने मुझे अलग ले जाकर विषया की सारी बारीकियां समझाईं. उसके बाद अपनी गाडी से इस विषय की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तकें एवं सूचियां दिखाईं जो दुर्लभ हैं एवं जिनको शायद मैं किसी भी तरह से न पा सकता. इतना ही नहीं उन्होंने अपने खर्चे पर ये किताबें मेरे लिये फोटोकापी कीं एवं मुझे प्रदान किया.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">आज भी ऐसे भारतीयों की कमी नहीं है जो अपनी सोच एवं कर्म द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम के भारतीय आदर्श को प्रदर्शित करते है. अभय अग्रवाल जी को मेरा शत शत नमन्!!</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
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		<title>ईपुस्तक छापें, हजारों मन जीतें!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1225</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/1225#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2008 04:22:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[   
जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था, अर्थलाभ की इच्छा त्याग दें तो आप की पुस्तक असानी से हजारों या लाखों लोगों तक पहुँच सकती है. इसके लिये सबसे अच्छा तरीका है ईपुस्तक के रूप में अपनी पुस्तक को प्रकाशित करना.
ईपुस्तक का मतलब है पुस्तकें जो इलेक्टानिक रूप में हैं एवं [...] ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p> <font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था, अर्थलाभ की इच्छा त्याग दें तो आप की पुस्तक असानी से हजारों या लाखों लोगों तक पहुँच सकती है. इसके लिये सबसे अच्छा तरीका है ईपुस्तक के रूप में अपनी पुस्तक को प्रकाशित करना.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ईपुस्तक का मतलब है पुस्तकें जो इलेक्टानिक रूप में हैं एवं जिनको जाल पर बांटा जा सकता है. इसका सबसे सरल उदाहरण है पीडीएफ पुस्तकें. मेरी निम्न पुस्तकें पीडीएफ ईपुस्तक का उदाहरण हैं <a href="http://sarathi.info/Ebooks/HindiBlogging1_5.pdf">हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 1 से 5</a> व <a href="http://sarathi.info/Ebooks/HindiBlogging6_8.pdf">हिन्दी में ब्लागिंग कैसे करें:लेख 6 से 8</a>. पिछले एक साल में इसकी लगभ 1000 प्रतियां लोग अपने संगणक पर उतार चुके हैं. मेरी अंग्रेजी ईपुस्तकें (सब बाईबिल से संबंधित हैं) काफी बडे दायरे में जाती हैं अत: पिछले साल उनकी लगभग 600,000 प्रतियां इस तरह से वितरित हुई थीं. इस साल अनुमान 1,000,000 प्रतियोंके बंटने का है. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मुझे इससे कौडी भर का आर्थिक फायदा नहीं है, लेकिन जरा सोचें कि मेरी लेखनी का प्रभाव कितना व्यापक हो रहा है. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हिन्दी चिट्ठाकारों में से यदि तीसरा खंबा, शब्दों का सफर, पर्यानाद, साईब्लाग आदि विषयाधारित चिठों के वर्गीकृत लेखों को इस रीति से बांटने लगें तो उनकी पहुंच और भी व्यापक हो जायगी. पंकज अवधिया काफी सारे वैज्ञानिक दस्तावेज इस तरह से वितरित करते आये हैं. उम्मीद है कि आप लोग भी ऐसा करेंगे.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> <a href="http://sarathi.info/archives/1223">कैसे लिखें एक किताब इस साल</a><br />
<a href="http://sarathi.info/archives/1224">आपकी किताब छापेगा कौन??</a></font></p>
<p class="akst_link"><a href="http://sarathi.info/?p=1225&amp;akst_action=share-this"  title="E-mail this, post to del.icio.us, etc." id="akst_link_1225" class="akst_share_link" rel="nofollow">Share This</a>
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