ईसा चरित (बाल पर्व, अध्याय 2)

स्वर्गदूत द्वारा दिये गये दर्शन एवं सन्देश के बाद से यूसुफ एवं मरियम ने हमेशा यह याद रखा कि उस दिव्य बालक का पालण-पोषण विशिष्ट तरीके से होना है क्योंकि उनके द्वारा ईश्वर मानव मात्र के उद्धार के लिये इस धरती पर मनुष्य-रूप में पधार रहे हैं. चोला मनुष्य का है, लेकिन वास्तव में वे ईश्वर हैं. इस तरह जब वे दोनों मुक्तिदाता की आस लगाये बैठे थे कि अचानक फिर से यहूदियों पर रोमी शासन का कहर बरसा. कर एवं चुंगी के द्वारा एक बहुत बडी रकम हर साल वसूल करने के बावजूद उनको लगा कि यहूदियों को अभी और निचोडा जा सकता है. अत: उस समय के रोमी शासक ने अचानक आदेश दिया कि यहूदियों की जनगणना की जाये और उनकी सही जनसंख्या ज्ञात की जाये. आजकल जनगणना के लिये सरकार-नियुक्त लोग घर घर जाकर जानकारी इकट्ठी करते हैं, लेकिन उन दिनों मामला उलटा था. तब हर आदमी के लिये यह जरूरी था कि वह सपरिवार अपने पैतृक गांव में पहुंच कर सरकारी केन्द्र मे अपनी जानकारी रिकार्ड करवाये. यह एक कठिन काम था, और उस परिवार के लिये बहुत कठिन था क्योंकि मरियम के प्रसव का समय निकट था, यात्रा के लिये आधुनिक वाहन उपलब्ध नहीं थे, एवं यूसुफ के पैतृक गांव में (जिसे उसके बापदादों ने कई पीढियों पहले छोड दिया था) अब उनका कोई नहीं बचा था जिनके घर वे टिक सकें. कई दिनों की पैदल एवं गधे के ऊपर यात्रा के बाद जैसे तैसे वे अपने गांव बैतलेहेम पहुंचे, लेकिन सराय मे जगह न थी. आसपास से जो लोग आये थे उनके कारण धर्मशाला पहले से ही खचाखच भरी हुई थी. हरेक के साथ स्त्री-बच्चों का बडा काफिला था, और उस जमाने के छोटे छोटे कमरों के बने भवन में कहीं भी तिल रखने की जगह नही थी.

यात्रा एवं प्रसव की निकटता के कारण थकी हारी अपनी पत्नी के लिये यूसुफ बहुत परेशान हुए. मैदानों में भी जहां टिकने के लिये सहूलियत थी वहां लोग पहले से उसे घेर कर तम्बू लगा चुके थे. अंत में सराय के मालिक की दया के कारण अपने गौशाले को साफ कर उसने उसमें उनको रहने की जगह दी. वे वहां कुछ दिन रहे ही थे कि मरियम को प्रसव-वेदना उठी एवं उसी गौशाले में उन्होंने ईसा को जन्म दिया. कैसा विरोधाभास कि जिसने सारी सृष्टि को ताना, उसको एक भवन तो छोडिये, एक मैदान में तना तम्बू भी अपने जन्म के लिये न मिला. लेकिन यही ईश्वर की रीत है. मनुष्य दिखावे से अपने आपको बडा दिखाने की कोशिश करता है. ईश्वर अपने कार्यों के द्वारा अपने आप को प्रकट करते हैं — उनको किसी बाह्य अलंकार या घोषणा की जरूरत नहीं है. मनुष्य यह अकसर भूल जाता है, एवं इस कारण कई बार उनके संगियों ने ईसा को न पहचाना के वे कौन हैं.

गौशाले में एक चरनी को साफ-सूखा करके कपडे बिछा कर मरियम ने ईसा को उस में लिटा दिया. ब्रह्माण्ड के पालक के लिये कैसी पालनी. विधाता की गति को पहचानना कई बार बहुत मुश्किल है. किसी को भी इस दिव्य बालक की सही खबर अभी नहीं थी, लेकिन उस रात उस गौशाले से कुछ ही दूर गडरियों के एक समूह के सामने स्वर्गदूतों का एक झुण्ड प्रकट हुआ. सरल स्वभाव के वे गडरिये इस दिव्य घटना को देख आश्चर्य से भर गये. तभी स्वर्गदूतों के प्रधान ने उन से कहा, “हे सरल स्वभाव के धर्मप्रिय सज्जनोँ, आज ईश्वर मनुष्य रूप में इस धरती पर पधारे हैं. दुनियां के राजे महाराजों एवं धनिकों को यह खबर देने से पहले ईश्वर की यह इच्छा है कि तुम जैसे सरल एवं सात्विक स्वभाव के ईश्वर भक्तों को यह खबर दी जाये. तुम लोग तुरंत जाकर मुक्तिदाता का दर्शन करो क्योंकि यह ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिये ठहराया गया है कि अन्य लोग इसके बाद ही उनके दर्शन करें”

वे गडरिये रातोंरात अपनी जगह से कूच कर गये एवं ढूढ कर उस गौशाले तक पहुंच गये. वहां जैसा स्वर्गदूतों ने उन से कहा था ठीक उसी तरह उन्होंने शिशु ईसा को कपडे में लिपटा और चरनी में सोते पाया. उन्होंने पहले तो उनको साष्टांग प्रणाम किया, और उसके बाद दूतों के दर्शन की बात शिशु के मांबाप को एवं सराय में टिके लोगों को बताई. यह सुन लोग ईसा के दर्शन के लिये उमड पडे, एवं यहूदियों के प्रति ईश्वर की करुणा के लिये उनका आभार माना. लेकिन जैसा कि मनुष्य की रीत है, बहुत जल्दी ही सबने उनको भुला दिया क्योंकि वे तो महलों मे जन्मे एवं राजकाज में निपुण एक मुक्तिदाता के इंतजार में थे जो उनको रोमी साम्राज्य से एक राजनीतिक छुटकारा प्रदान करेगा. वे यह नही पहचान पाये कि करुणामूर्ति ईसा मानव मात्र के लिये पधारे थे, न कि केवल यहूदियों के राजनैतिक छुटकारे के लिये.

शिशु के जन्म के आठवें दिन मांबाप उनको लेकर यहूदियों के प्रथम धर्म-संस्कार के लिये अपने मन्दिर गये. वहां दो बहुत बुजुर्ग लोग थे जिनको बीच बीच में ईश्वर की वाणी मिलती रहती थी. उनमें से एक पुरुष था, एवं एक स्त्री थी. ईसा को लेकर जैसे ही मांबाप का कदम मन्दिर में पडा, वैसे ही दोनों को ईश्वर की वाणी हुई और दोनों ने यह घोषणा की कि मुक्तिदाता पधारे हैं. मांबाप इन बातों को मन में रखते गये एवं उस हिसाब से ईसा का पालन करते गये.

जनगणना के बाद वे लोग वापस जाने के बदले उसी नगर में बस गये. जनसंख्या-लिखाई के वह बडी भीड चली गई तो बढई यूसुफ को वहां रोजगार का अच्छा अवसर प्राप्त हुआ और उस दम्पति को लगा कि दिव्य बालक के सही पालन पोषण के लिये वह नगर बेहतर रहेगा. इस बीच रोमियों की देखरेख में यहूदियों ऊपर एक के बाद एक कई शासकों ने कई तरह से राज्य किया. इन में से एक राज-निपुण लेकिन अत्यंत क्रूर राजा था जिसे लोग हेरोद कहते थे. वह एक गैर यहूदी था. वह इतना महत्वाकांक्षी एवं क्रूर था कि अपने सिंहासन को बचाने के लिये अपने परिवार के लोगों को, यहां तक कि अपने कई पुत्रों तक की, ह्त्या करवा दी थी. यहां तक कि हेरोद के दुश्मन भी प्रार्थना करते थे कि राजपरिवार में अब कोई अभागा शिशु जन्म न ले और कोई अभागिन मां न बने. उसने राज्य के हर कोने में जासूस फैला रखे थे, एवं लगभग हर ऊंचे पहाड की चोटी पर भी जासूस तैनात कर रखे थे. ये दर्पणों की सहायता से एक दूसरे को सन्देश भेजते थे, एवं इनसे छिप कर कोई परिन्दा भी उस राज्य में पर नहीं मार सकता था.

ईसा जब दो साल के थे तब अचानक विद्वानों का एक बहुत बडा दल यहूदियों की राजधानी यरुशलम में हेरोद के राज दरबार पहुंचा. उन्होंने राजा को बताया कि उनको आकाश में एक विशिष्ट प्रकाश-पुंज दिखाई दिया था जो इस बात का चिन्ह था कि यहूदियों के बीच एक ‘राजा’ का जन्म हुआ था. उन्होंने यह भी बताय कि पिछले दो साल से वे इस यात्रा की तयारी कर रहे थे एवं पैदल एवं ऊटों पर यात्रा कर रहे थे. अब वे उस बालक का दर्शन करना चाहते थे. खबर सुन कर हेरोद के सर पर बिजली कौंध गई. यह खबर यहूदियों के बीच भी आग के समान फैल गई क्योंकि हेरोद एक गैर यहूदी था, एवं जिसने अपने सिंहासन को बचाने के लिये अपने बच्चों तक की हत्या करवा दी थी वह किसी भी हालत में उस यहूदी बालक को जीने न देगा बल्कि अपने आप को बचाने के लिये कत्ले आम करवा देगा. अपनी राजगद्दी को खतरे में देख हेरोद ने उन विद्वानों को बुला कर उस आसमानी प्रकाश पुंज के प्रगट होने के समय की सही सही जानकारी ले ली. उन से यह वचन भी ले लिया कि इस शिशुराज को पा लेने के बाद वे हेरोद को इस की सूचना दे देंगे. इस बीच यहूदी विद्वानों ने अपने धर्मशास्त्रों के आधार पर बताया कि उस समय मुक्तिदाता बेतलहम नामक यहूदी ग्राम में होंगे. यह सुन विद्वान लोग उस गांव की तरफ कूच कर गये.

रास्ते में वह प्रकाश पुंज फिर उनके सामने प्रगट हो गया. इस बार आकाश में स्थिर रहने के बदले वह उनके सामने चलने लगा, एवं शिशु के निवास की ओर उनका मार्गदर्शन करता गया. अंत में वह पुंज उस घर के ऊपर पहूंच कर स्थिर हो गया जहां लगभग दो साल की उमर के ईसा अपने मां बाप के साथ रहते थे. उस विलक्षण बालक का दर्शन होते ही उन लोगों ने समझ लिया कि यही वह जगत की ज्योति हैं जिनकी तरफ उस प्रकाश पुज ने अपने उदय के द्वारा संकेत किया था. उनको साष्टांग प्रणाम करने के बाद एक राजा के लिये उचित भेंट अपने अपने थैलों से निकाल कर उनको चढाया, जैसे स्वर्ण, गंधरस, एवं लोहबान. इसके बाद वे वापस जाने की तय्यारी कर रहे थे कि उनको ईश्वरीय दर्शन मिला कि हेरोद राजा के पास वापस न जाना क्योंकि उसका असली लक्ष्य तो इस दिव्य बालक की हत्या करना है. इस बीच उन विद्वानों की जानकारी के बिना हेरोद के जासूस उनके ऊपर नजर रख रहे थे. लेकिन ईश्वर की ऐसी कृपा हुई कि वे छिप कर उस देश के बाहर चले गये, एवं हेरोद के जासूसों को न तो उनका पता लग पाया, न उस बालक का अता पता मिला. इस पर हेरोद इतना कुपित हुआ कि उसने अपने सैनिकों को भेज कर बेतलहम नगर एवं उसके आसपास के ग्रामों में दो साल एवं उससे कम उमर के जितने बालक थे उनको मरवा डाला. (क्रमश:)

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Author: Super_Admin

2 thoughts on “ईसा चरित (बाल पर्व, अध्याय 2)

  1. वाह, अत्यंत रुचिकर कथा।

    ईसा जब दो साल के थे तब अचानक विद्वानों का एक बहुत बडा दल यहूदियों की राजधानी यरुशलम में हेरोद के राज दरबार पहुंचा.

    ये विद्वान क्या The Gift of Magi कहानी में वर्णित Wise Men ही थे?

    शास्त्री जी शायद आपने पहले ध्यान दिया हो कि भगवान श्रीकृष्ण और प्रभु यीशु की जन्म-कथा में अत्यंत समानता है। उनके जन्म की स्थितियाँ एक जैसी थी। कंस और हेरोद दोनों का ही चरित्र एक समान था।

    इस सब से भगवान कृष्ण का यह कथन कि “जब जब धर्म की हानि होती है, धर्म के उत्थान के लिए मैं अवतार लेता हूँ” एकदम सही प्रतीत होता है।

  2. प्रणाम!! आपके इस साईट पर मैंने कुछ लेख पढ़े ! आप मुझे बहुत ही देशप्रिये और संस्कृति प्रिय व्यक्ति लगे |
    पर आप के ईसा को इश्वर मानने की बात मुझे कुछ हज़म नहीं हुई | जैसा की आपके परिचय में मैंने पढ़ा की आप एक आधुनिक और विज्ञानिक सोच रखते है , तो में इसा के परमात्मा होने संभंधि आपसे कुछ विचार विमर्श करने का इच्छुक हू | यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार करें तो मै आपसे ईमेल द्वारा अथवा चैट द्वारा विचार करना चाहुगा ! कृपया मेरे ईमेल पर यथाशीघ्र उत्तर देने की कृपालुता करें |

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