पराई कैसे यहां स्वामिनी हो गई 1

विद्यालयीन जीवन में मै साहित्यिक गतिविधियों में बहुत सक्रिय था. वादविवाद, तात्कालिक भाषण, एवं निबन्ध प्रतियोगिताओं से मेरा जीभ-दांत का सम्बन्ध था. खूब इनाम जीते, ट्राफियां मिलीं एवं बहुत कुछ मिला. बहुत कुछ याद है, बहुत कुछा भूल गया, लेकिन एक अनुभव कभी नहीं भूला.

मेरे नाम के साथ जो अंग्रेजीपन जुडा हुआ है उसके कारण लोगों को गलतफहमी हो जाती थी कि मैं शायद एंग्लो इंडियन हूं, या कि मेरी जुबान अंग्रेजी है. यह लगभग हर प्रतियोगिता के बाद होता था. लोग आकर पूछते थे कि भैय्या, आप अंग्रेजी में क्यों नहीं बोलते क्योंकि वह तो बहुत शान की बात है, तथा उससे इनाम मिलने की सम्भावना और बढ जाती. कैसी विडम्बना है कि एक विदेशी भाषा में भाषण को लोग राजभषा से अधिक शान की बात समझते हैं. इतना ही नहीं, उन दिनों मैं ने नोट करना शुरू किया कि सचमुच में उन प्रतियोगियों को हम से अधिक नम्बर मिलते थे जो अंग्रेजी में बोलते थे. यहां तक कि औसत स्तर के अंग्रेजी-भाषी प्रतियोगियों को धाराप्रवाह हिन्दी बोलने वाले प्रतियोगियों से अधिक नम्बर दिया जाता था. इसका एक ही कारण है: पराई भाषा हमारे दिलों स्वामिनी हो गई है एवं हमारी मां हिन्दी को उसका हक या दर्जा नहीं मिल रहा है. यह हक-छिनाई रातों रात नहीं हुई, न ही यह अपने आप हुई.

जिस तरह ईस्ट इंडिया कम्पनी व्यापार के लिये आई लेकिन भारतीयों की कमी-घटियों को समझ कर फूट डाल कर राज्य हाथ में ले लिया, उसी तरह ही अंग्रेजी के व्यापारियों ने अपने हितों के संरक्षण के लिये कई तरह से अंग्रेजी को बढाया एवं हिन्दी का दमन किया. कम से कम आज हमें उनकी नीतियों को समझ लेना चाहिये जिससे कि हिन्दी को वह आदर मिले जो किसी भी देश में उस देश की राजभाषा को मिलता है.

आपको शायद एक दम से लगे कि मैं शायद अंग्रेजी-विरोधी हूं, या कि अंग्रेजी से अज्ञात हूं. बात यह नहीं है. मेरा किसी भी भाषा से बैर नहीं है. मैं एक बहुभाषी व्यक्ति और अंग्रेजी सहित कम से कम चार हिन्दुस्तानी एवं दो विदेशी भाषाओं का ज्ञाता हूं. बैर इस बात से है कि हिन्दी को जिस आसन पर आरूढ होना चाहिये वह स्थान अभी भी अंग्रेजी ने घेर रखा है. यह स्थिति बदलनी चाहिये. इतिहास इस बात का गवाह है कि अपनी स्वयं की राजभाषा के बिना, एवं आम नागरिक को सशक्त किये बिना, कोई भी देश विश्व शक्ति नहीं बन पाया है. (क्रमश:) — शास्त्री जे सी फिलिप्

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Author: Super_Admin

7 thoughts on “पराई कैसे यहां स्वामिनी हो गई 1

  1. यही तो विडंबना है .. लेकिन समय बदल रहा है..देखें कुछ परिवर्तन होता है कि नहीं…

  2. @kakesh
    प्रिय काकेश यदि हम में से हर एक व्यक्ति कुछ न कुछ करने की ठान ले तो स्थिति में परिवर्तन जरूर होगा !

  3. अंगरेजी को सत्ता पर काबिज बनाये रखने के षडयन्त्र में अंगरेजों से अधिक ‘काले हिन्दुस्तानी अंगरेजों’ का हाथ है। यह सब आम जनता से दूरी बनाये रखने और उसे सतत पिछड़ा बनाये रखने का षडयन्त्र है।

    यह स्थिति बदले, इसके लिये हिन्दी के प्रति अपनत्व और स्वाभिमान का भाव पैदा होना बहुत जरूरी है। और वह देर सबेर अवश्य होगा।

  4. सहमत हूँ आपसे। मैं खुद मानता हूँ कि अंग्रेजी एक अच्छी भाषा है लेकिन हिन्दी इससे कतई कमतर नहीं बल्कि भाषाई मामले में श्रेष्ठ ही है।

    पता नहीं भारतीय़ों के मन में इस भाषा के प्रति ऐसा मोह क्यों है। आखिर वह विश्व की हजारों भाषाओं की तरह एक अदद भाषा ही तो है। यदि अंग्रेजी साम्राज्य न हुआ होता तो आज शायद यह अन्य हजारों भाषाओं की तरह एक सामान्य सी भाषा होती।

    खैर कंप्यूटर पर हिन्दी के सुलभ होने से एक नया मार्ग खुला है। मेरा विश्वास है कि यह एक दिन हिन्दी को उसका स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

  5. मेरे खयाल से एक व्यक्ती को जहाँ तक हो सके ज्यादा से ज्यादा भाषाएं आनी चाहिये…और हिन्दी तो हमारी मातृ-भाषा है,ये कैसे सम्भव है की हम विदेशी भाषा के माया जाल मे हमारी मातृ-भाषा को भूल जायें…
    मै आपकी बात से सहमत हूँ..एक दिन हम हिन्दी को अपना स्थान जरूर दिला पायेंगे…।

    सुनीता(शानू)

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