ईसा चरित (सेवा पर्व) 1

ईश पुत्र ईसा ने इस पृथ्वी पर दो सहस्र वर्ष पूर्व एक यहूदी परिवार में मनुष्य के चोले में जन्म लिया. यहूदी लोग चार शताब्दी से अधिक समय गुलामी में बिता चुके थे, एवं गैरयहूदी तानाशाहों की लूट एवं क्रूरता के कारण त्राहि त्राहि कर रहे थे. उनके धर्मशास्त्रों में एक उद्धारकर्त्ता की चर्चा मिलती है जो भविष्य में पधारने वाले थे. यहूदियों ने इसकी व्याख्या की कि वह उद्धारकर्ता उनको इस तानशाही से बचायेंगे.

मनुष्य कितना भी ज्ञानी हो जाये, वह वर्तमान को नजरअंदाज नहीं कर पाता है. अत: ईसा जब मानव मात्र के उद्धार के लिये पृथ्वी पर पधारे, तो अधिकतर यहूदी उनको न पहचान सके. वे एक शक्तिशाली राजा की कामना कर रहे थे जो उनको रोजमर्रा की परेशानी से छुडाये. लेकिन राजपरिवार के बदले ईसा ने एक सामान्य परिवार में जन्म लिया क्योंकि उनका अभियान कुछ और था. इस कारण एकाध परिवारजन के अलावा ईसा को उनके 30 वीं वर्षगांठ तक किसी ने न पहचाना. वे सिर्फ एक दिव्य एवं अद्भुत, आत्मिक, बालक एवं युवा के रूप में जाने जाते थे. इससे अधिक किसी को कुछ नहीं मालूम था. अपने सेवाकाल से पहले ईसा भी यही चाहते थे कि उनका वास्तविक व्यक्तित्व एवं अभियान गुप्त रहे. इतना ही नहीं, ईसा अपने बारे में किसी भी तरह का प्रचार पसन्द नहीं करते थे. यहां तक कि अपने सेवाकाल के दौरान भी वे लोगों से कडाई से कहा करते थे कि वे ईसा के नाम का प्रचार न करे. सेवा काल के समय, “आओ, देखो, अपने आप समझो” उनका एक महत्वपूर्ण नियम था.



ईसा जब तीस साल के हुए तो यहूदियों के बीच फिर से एक धार्मिक नवीकरण का समय आया. यह नवीकरण यूहन्ना नाम के एक भविष्यवक्ता के प्रवचनों के कारण आया था. यूहन्ना गांव गांव जाकर लोगों का आह्वान कर रहे थे कि ईश्वर के द्वारा निर्धारित समय आ गया है. उन्होंने कहा कि यहूदी जनता को अपने पापों के बारें मे प्रायश्चित करके ईश्वर के प्रति और अधिक भक्ति प्रदर्शित करना चाहिये. यहूदी हजारों की संख्या मे जाकर उनका अनुकरण करने लगे. कई लोगों को लगने लगा कि शायद वे ही उद्धारकर्ता हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि वे सिर्फ ईश्वर के सन्देशवाहक हैं जो मुक्तिदाता के लिये रास्ता तय्यार करने के लिये पधारे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि लोग अपनी आंख खुली रखें क्योंकि उन्ही दिनों उद्धारकर्ता का आगमन होने वाला था.

उन दिनों भक्त यहूदियों का एक महत्वपूर्ण धार्मिक आचरण था जलसंस्कार. एक दिन ईसा सीधे यूहन्ना के पास पहुच गये एवं उनसे अनुरोध किया कि वे ईसा को जलसंस्कार दें. यूहन्ना ने दिव्यदृष्टि से समझ लिया कि यही वह चिरप्रतीक्षित उद्धारकर्ता हैं. अत: ईसा के इस अनुरोध पर वे बहुत चकित हो गये एवं उन्होंने पूछा कि “प्रभु, आप यह कैसी अनहोनी बात कह रहे हैं. मुझ सेवक को आप से जलसंस्कार लेना चाहिये, लेकिन उल्टे आप मुझ से कह रहे हैं कि मैं आपको जलसंस्कार दूं”. ईसा ने तुरंत उत्तर दिया कि यहां दास-प्रभु आदि का सवाल नहीं बल्कि एक यहूदी परिवार में जन्म लेने के कारण जरूरत इस बात की है कि ईसा अपने जीवन में वे सारे कार्य करें जो एक भक्त यहूदी को करना चाहिये. प्रभु के मूंह से यह बात सुन कर भक्त यूहन्ना को इस विषय में ज्ञानोदय हुआ, एवं उन्होंने बिना किसी हिचक के तुरंत ही नदी के पानी में ले जाकर ईसा का जलसंस्कार किया. उनको इस बात का गुमान भी नहीं था कि अब क्या होगा, लेकिन ईसा जानते थे कि क्या होने जा रहा है.

जैसे ही जलसंस्कार पूर्ण हुआ और ईसा प्रार्थना करने लगे कि एक दम से आकाशवाणी हुई कि “ये मेरे प्रिय पुत्र हैं. मैं इन से प्रसन्न हूं. आईन्दा सब लोग इनकी वाणी ध्यान से सुनें”. यह ईशवाणी इस बात की सूचना थी कि अब ईसा का आत्मिक अभियान प्रारम्भ होने जा रहा है. इस बीच यहूदी लोग फिर बेचैन होने लगे. उनको बार बार लगने लगा कि शायद यूहन्ना यहूदियों के मुक्तिदाता हैं. लेकिन यूहन्ना ने उनको यह स्पष्ट कर दिया के वे तो सिर्फ एक चरणसेवक है, एवं ईसा हैं ईश्वर द्वारा भेजे गये मुक्तिदाता. इस कथन को सुन कर कई लोग ईसा का अनुकरण करने लगे एवं उनके शिष्य बन गये. लेकिन चूकि अभी तक ईसा ने अपनी दिव्य शक्ति को या अपने संसार वास के उद्धेश्य को प्रगट नहीं किया था, अत: उनके शिष्य बहुत कम थे. इस छोटे से शिष्यसमूह को लेकर ईसा जगह जगह घूमे, एवं अपने प्रति समर्पित शिष्यों के एक बडे समूह को चुन लिया. दिन भर उनको धर्मशास्त्र सिखाना उनका प्रारम्भिक कार्यक्रम था. इस बीच एक बहुत बडी घटना घटी. ईसा के परिवारजनों एवं शिष्यों को एक विवाहभोजन का नेवता मिला.

यहूदियों का विवाहभोजन कई दिन तक चलता था, एवं सारा गांव उसमे शामिल होता था. इस कारण कई बार बडी कठिन स्थिति भी हो जाती थी. ऐसा ही यहां पर हुआ. उस प्रदेश में अंगूर की खेती बहुतायत से होती थी, एवं अंगूरी शर्बत उन लोगों का सबसे प्रिय पेय था. बरफ या रेफ्रिजरेटर के बिना उस गरम जलवायू में भोजनवस्तु बहुत जल्दी खराब हो जाते थे, लेकिन यह पेय महीनों तक सुरक्षित रहता था. अत: शादीब्याह पर अंगूरी शर्बत भोजन का एक जरूरी भाग हुआ करता था. उस परिवार का दुर्भाग्य ऐसा हुआ कि कई टंकी शर्बत की व्यवस्था करने के बावजूद वहां के गरम मौसम में आधे दिन में ही वह सब खतम हो गया. सारा गांव शादी में व्यस्त था अत: एकदम से जाकर अच्छे स्वाद का शर्बत लाना भी कठिन था. लेकिन जो मनुष्य की नजर में दुर्भाग्य था, वह वास्तव में देवयोग था. ईसा की मां मरियम इस बात को तुरंत समझ गईं और उन्होंने चुपके से जाकर ईसा से सिर्फ इतना कहा कि उनका अंगूरी शर्बत खतम हो गया है. ईसा ने तब तक किसी भी प्रकार अपनी ईश्वरीय शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया था, अत: कोई भी इस बात को न जानता था कि वे अपनी दिव्य शक्ति से समस्या का समाधान निकाल सकते हैं. लेकिन उनकी माताश्री ने पिछले तीस सालों में क्रमश: यह पहचान लिया था कि ईसा कौन हैं एवं क्या करने की कुव्वत रखते हैं. ईसा ने एकदम अपनी मां को टोका कि उनका सेवाकाल तो अभी सिर्फ शुरू हुआ है, लेकिन मां का हृदय कौन दुखा सकता है. ईसा इस बात को जानते थे एवं उनकी मां भी. अत: ईसा के टोकने के बावजूद वह महिला टस से मस न हुई. उन्होंने तुरंत ही जाकर नौकरों से कहा कि ईसा उनसे जो कुछ कहें वह बिल्कुल वैसा ही करें. मतलब यह कि ईसा का आदेश एकदम विचित्र हो तो भी नानुकर किये बिना एवं संशय के बिना नौकरों को वह करना ही है.

उस घर में पत्थर की छ: टंकियां थी, जिनमें सैकडों लिटर पेय पदार्थ भरा जा सकता था. ईसा ने उस घर के नौकरों को आदेश दिया कि वे इन पाषाण टंकियों को पानी से भर दें. उन लोगों ने फुर्ती से उन टंकियों को पानी से लबालब भर दिया. तब ईसा ने कहा कि अब उस में से कुछ एक बर्तन में ले जाकर अतिथियों के मुखिये को दो. उन्होंने ऐसा ही किया. उन दिनों में लोग पहले तो अच्छे से अच्छा पेय देते थे, लेकिन पीकर छक जाने के बाद हल्के किस्म के, घाटिया गुण के, या अधिक पानी मिला पेय देते थे क्योंकि छकने के बाद किसी को पेय की गुणवत्ता का अनुमान नही रहता, एवं मेजबान का खर्चा इस तरह कम हो जाता था. मुखिये ने वह अंगूरी शर्बत पी तो उसकी आंखे फटी रह गईं. उसने आज तक ऐसा रस नहीं पिया था. उसने दुल्हे को बुलाकर कहा कि कमाल है. ऐसा अंगूरी शर्बत मै ने कभी नही पिया. लोग तो सब के छक जाने पर घाटिया शर्बत चला देते हैं, लेकिन तुम कमाल के आदमी हो कि तुम ने सबसे अच्छा हिस्सा आखिर में बांटना शुरू किया है. (नौकरों, ईसा, एवं उनकी माताश्री के अलावा किसी को तब तक नहीं मालूम था कि यह पेय कहा से आया था).

कोई भी असामन्य बात अधिक समय तक छुप नहीं सकती है. ईसा या उनके शिष्यों ने इस घटना के बारें मे किसी को बताने की कोशिश नहीं की लेकिन नौकरों के मूंह सबने इस घटना को जान लिया. इस अद्भुत कार्य के कारण बहुत लोगों ने जान लिया कि ईसा कौन हैं, एवं उनके शिष्य बन गये. इस तरह अपने 30 बरस की उमर में ईसा ने अपने संसार आगमन के उद्धेश्य को प्रगट करना शुरू कर दिया. ईसा दयामूर्ति एवं करूणा के सागर थे, लेकिन टेढे लोगों को कडी वाणी में डांट लगाते थे. जनता एक मन से उनके पीछे हो ली. लेकिन उन में से बहुत कम ने ईसा को ठीक से समझा. अधिकतर लोग यह चाहते थे कि ईसा अपनी दिव्य शक्ति को राजनैतिक कार्य के लिये उपयोग में ले. वे किसी भी तरह से रोम की तानाशाहों से मुक्ति पाना चाहते थे. इस कारण ईसा के अनुयायियों को ईसा का लक्ष्य एवं उनकी कार्यशैली समझने के लिये काफी समय लगा. ईश्वर की रीत मनुष्य के रास्तों से एकदम भिन्न है.

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Author: Super_Admin

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