ये वादा है — सारथी काव्य विश्लेषण – 1

लीजिये, चर्चा के बाद अब कविता का सन्दर्भ सहित विश्लेषण प्रस्तुत है:

तुमने कहा
“नहीं छोडूंगा मै उसे
ये मेरा फैसला है
क्योकि
शायद मै उसे तुम से
ज्यादा प्यार करता हूँ “

चलो पता तो चला कि
प्यार भी कम ज्यादा होता है
तुलता है वह भी
तराजू पर.
मै प्यार मे रिश्ता ढूंढ
रही थी क्योंकि
रिश्तों से प्यार नहीं मिला था,
पर तुम क्या ढूंढ रहें थे
तराजू लेकर.
क्या तोल रहें थे,
कौन तुम्हारे लिये कितना अच्छा है ?
कभी फिर किसी रास्ते पर
मिलेंगे तो देखेंगे तुम्हारा
बही खाता.
ये वादा है
पर आज नहीं,
क्योकि आज मुझे भी एक तराजू
खरीदनी है
क्या पता कब ज़रूरत पड जाये
प्यार को तौलने की.
[मुक्त प्रकाशनाधिकार रचना सिंह]

रचना सिंह की टिप्पणी: मेरी इस कविता को सर ने क्यो चुना है मै नहीं जानती । अपनी इस कविता से मुझे अपनी कुछ दुसरी कविताए ज़्यादा सार पूरण लगती है । पर सर के चुनाव पर प्रश्न चिन्ह लगना गलत होगा क्योकि पसंद का कोई मापदण्ड नहीं होता । उसी तरह ऐसा कोई तराजू भी नहीं होता है जिसमे प्यार या कोई भी भावना तुल सके । पर शब्दो को तराजू ज़रूर बनाया जा सकता है । इस कविता मै एक प्रश्न है जो अगर मै ऊपर लिख देती तो ये कविता सीधी और सपाट हों जाती ।

एक शादीशुदा पुरुष से एक स्त्री का संबंध है और वह बिना किसी शिक़ायत के इस संबंध को जीती है पर एक दिन वह पूछती है” तुम हिम्मत क्यो नहीं करते और क्यो अपनी पत्नी से संबंध खतम करके मेरे साथ सम्मान से नहीं रहना चाहते ? ” पुरुष का ये कहना कि “नहीं छोड़ुगा मै उसे ये मेरा फैसला है क्योकी शायद मै उसे तुम से ज्यादा प्यार करता हूँ ” स्त्री को एहसास दिलाता है की पुरुष वहाँ नाखुश नहीं है और उसी समय ये कविता जनम लेती हे . वह स्त्री जो बिना किसी शर्त के प्यार का रिश्ता निभा रही थी उस पुरुष से अलग हो जाती है . बाक़ी सारी बाते और वह पुरुष से नही करती हे वो तो उसकी सोच मे हे ।

वह समझ्ना चाहती है की वह तो अकेली है इस लिये इस सम्बन्ध मे है पर पुरुष जिस के पास इतने सम्बन्ध है और वह उनसे नाखुश भी नही है क्यो इस सम्बन्ध मे है । वह प्यार के साथ तो बिना किसी शर्त के रह सकती है अगर उसे ये विश्वास हों की पुरुष की चाहत सिर्फ उसके लिये है पर वह पुरुष के बही खाते का पन्ना नहीं बनना चाहती है ।

अन्त मे मे सिर्फ इतना कहुगी की “जा की रही भावना जैसी ” अगर
@ hellohelloTesting
को कविता revengeful लगी है तो कहीं उनके मन मे ” बदला ” होगा
@ kanchan
को कविता आहत मन की पुकार लगी तो शायद वह आहत हुई होगी
@ सुनीता
को अगर एसा तराजू नही दिखा है तो वह अपनी जिन्दगी मे खुश हें
@ सागर चन्द नाहर जी
अभी प्यार को खोज रहें है दर्द को समझने मे समय लगेगा !!!!
@divyabh
“जा की रही भावना जैसी ” का ही अनुमोदन करते है
@ umashankar सिंह
की कविता भी एक जवाब है
बाक़ी कमेंट्स ब्लोग पर थे उन्हे मे इस परिचर्चा का हिस्सा नहीं मानती हूँ

मेरे शब्दो को कविता बना दिया आप सब की टिप्पणीओ ने अगर आप सब ना होते तो शब्द कविता ना बनते । आप सब को मेरा नमन , धन्यवाद कह कर आप सब को पराया नही करूगी । अपना नेह मेरे शब्दो पर बनाये रखे — रचना

शास्त्री जे सी फिलिप का विश्लेषण: रचना अंग्रेजी में काफी अच्छा लिखती हैं एवं हिन्दी में वह बात नहीं आ पाई है. इसके बावजूद अपने पहले विश्लेषण के लिये मैं ने इनकी कविता कि निम्न कारणों से लिया है

1. इनमें तेजी से भाषा सीखने की क्षमता है.

2. इनकी कई कविताओं में आपसी आग्रह एवं सम्बंधों की टकराहट के कारण होने वाले मानुषिक संघर्ष का काफी अच्छा चित्रण नजर आता है.

कविता पर मेरी विश्लेषणात्मक टिप्पणी:

1. कविता में इन्होंने एक ऐसी घटना का चित्रण किया है जो प्रति दिन हजारों बार घटती है. एक शादीशुदा पुरुष अपनी पत्नी से विश्वासघात करता है एवं एक पराई स्त्री के साथ शारीरिक रिश्ता कायम करता रहता है.

2. उस पुरुष के शादीशुदा होने की सच्चाई को जानकर भी वह स्त्री समय समय पर उसके साथ रतिक्रिया में लिप्त रहती है. हर पल वह यह सोचती है कि वह पुरुष उससे सच्चा प्यार करता है एवं कि वह अपनी पत्नी को छोड कर उससे शादी कर लेगा. सवाल यह है कि उस पराई स्त्री का यह कार्य बिना शर्त था? यदि बिना शर्त था को फिर शादी की जिद क्यों.

3. दबाव जब बहुत बढा तो उस पुरुष ने साफ साफ कह दिया कि वह अपने पत्नीबच्चों को नहीं छोडेगा. यह एक सच्चाई है, जो हमेशा उसके मन में थी. लेकिन जब वह कहता है कि “तुम्हारी तुलना में शायद मैं अपनी पत्नी से अधिक प्रेम करता हूं” तो यह सिर्फ एक झूठ था. यदि वह सचमुच अपनी पत्नी से प्रेम करता तो इतने समय पत्नी को धोखा न देता जिसे ईश्वर को साक्षी मान कर उसने अपनी अर्धांगिनी माना था, एवं उसका हिस्सा (हक, अपने आप को) किसी और स्त्री के साथ न बांटता. लेकिन वह पराई स्त्री इस मर्म को समझने के बदले अभी भी अज्ञान के अंधेरे में है एवं सच्चाई को पहचानने के बदले उस झूठ के विश्लेषण में लगी हुई है कि समस्या प्यार के “कम अधिक” होने से सम्बन्धित है. तभी वह तराजू, बहीखाते इत्यादि की बात करती है.

4. लेखिका का प्रस्तुतीकरण सशक्त है, लेकिन उनकी लेखनी से परिचित न होने के कारण पाठकों में से कई कविता का मर्म नहीं समझ पाये. न ही कविता में इस तरह का एक विश्लेषण देने की कोशिश रचनाकार ने की है जो मैं ने बिन्दु 3 में दी है.

5. भाषा पर रचनाकार की पूरी पकड न होने पर भी कुल मिला कर यह एक सशक्त काव्य है. भविष्य के लिये बहुत उम्मीदें हैं.

नैतिक टिप्पणी/विश्लेषण: जिस तरह प्यासा मृग मरीचिका की ओर दौडता है, हर व्यक्ति कहीं न कहीं किसी न किसी मरीचिका के पीछे भागता है. अधिकतर लोग जल्दी ही संभल जाते हैं. कुछ को ठोकरें खाने के बाद समझ आती है. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं कि ठोकरें खाने के बावजूद वास्तविकाता को नकार कर कल्पनालोक में डूब कर अपने आप को सही सिद्ध करने की कोशिश करते है. वे कभी भी वास्तविकता के धरातल पर नहीं आ पायेंगे. उस स्त्री को तो स्त्रीयोचित अंतर्दृष्टि की सहायता से बहुत पहले ही यह समझ लेना चाहिए था कि थोडे समय के रतिसुख के लिये जो पुरुष अपनी समाजसम्मत, कानूनसम्मत, ईश्वर से मिली जन्म जन्मांतर की “धर्म” पत्नी को धोखा दे सकता है, उस पुरुष से प्यार की कामना करना दुनियां में सबसे बडा छलावा है.

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: सारथी-पुनरवलोकन, सारथी, चुनी-कविताये, चुनी-रचनाये, काव्य-विश्लेषण

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Author: Super_Admin

4 thoughts on “ये वादा है — सारथी काव्य विश्लेषण – 1

  1. This poem is about a woman who feels unloved in the relationships that are god given . She then finds love in a man and she makes a relatiosnhip with that man . she never asks him for marrrige because she knows he is married and because he is love her she knows the “farceness” of marriage .
    had he got from his wife what he wanted he would have never been in relation with her this is her belief {in todays context most marriages are just farce . they live together without being attached to each other emotionally and its true that for a marriage to be farce not only husband but wife is also responsible . }
    she is preplexed as to why a man who has everything would try and seek love outside the wedlock so she ask him ” why dont you leave her and start your life afresh with me “this question i have not put in the poem . so many readers thought that the lady in question is the wife . all reader who thought this have preset norm that ” other woman” as they call is always wrong and its the wife who is aggreved . such readers should see with open eyes why such relationships form . and who gets the most pain .
    the man here is confused because he says that he cant leave her because “may be ” i love her more than i love you
    and from this point onwards the woman leaves this man and walks ahead because she feels that the man is not sure what he wants he is just continuing in both relatiosnhips and evaluating them which is good for him . she does not even feel like telling him why she has decided to move out rather she talks to herself and says that one day in life when they meet again { this meeting could be in this world or in the other world } she will sit with him and compare the life pages { ledger balance } but not today because today she has to do so many other things in life which includes building up a mental attitude to understand what is good or bad , right or wrong
    she does not blame the man for anything neither she wants to take any revenge . she only wants to develop a clear vision . she is not angry with the man but she feels that the man is not sure about his liking / love . he likes somethings of his wife and others of his beloved .
    The woman here is very strong because she accepts the truth and decides to move ahead without causing any harm to the person she loves . For her love is the most important thing . She is as moralistic as you all because she wants to lead a life acceptable to society but she still does not force the man.Her question was to the man was a step to understand him better but his ” may be ” makes her feel he has betrayed the trust she has placed in him
    I dont blame such man who form such relationships because somewhere their wifes push them in to doing such things http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/
    2006/10/kyoki-mae-woh-nahin-dekh-pati-jo-saab.html I have higlighted his pain there By saying man by nature are like this we malign manfolk . I feel man are worng if they cant understand what they are seeking in life . I dont see any reason not to start life all over again . And the pain this man undergoes has gone unsaid and unheard but its there and will haunt him life long till the time he will accept to himself that he did wrong by evaluating or comparing if i may take liberties with my words
    My intention is writing such poems is to bring out charcters the society labels as ” second woman” , “marriage breakers” and put them in different perspective . Before we give a TAG to any one we should see why they do what they do . Its very easy to take a moralistic view and malign someone but sometimes just see the pain they go thru . its very easy to give moralistic view point for real life situations but to understand the pain of these situations one needs to go thru them . I dont know how far i have succeed but my poems are merely an effort to bring out the pain of the people society shuns .

    I must say thank to Mr Shastri for bringing this poem up and posting his comments

  2. @ सागर चन्द नाहर जी
    अभी प्यार को खोज रहें है दर्द को समझने मे समय लगेगा !!!!

    रचना जी,
    क्या कहूं अब मैं, इतना ही कह सकता हूँ कि…………

    बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जायेगी
    लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
    ये भी पूछेंगे तुम इतनी परेशां क्यूं हो
    उंगलियाँ उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ
    एक नजर देखेंगे गुजरे हुए सालों की तरफ
    चूड़ियों पर भी कई तंज किये जायेंगे
    कांपते हाथों से भी फ़िकरे कसे जायेंगे
    लोग जालिम है हरेक बात का ताना देंगे
    बातों बातों में मेरा जिक्र भी ले आयेंगे

    आशा है रचना जी को पूरी गज़ल पढ़ाने की जरूरत नहीं होंगी, बहुत कुछ समझ गई होंगी।

  3. बस इतना ही कहूंगा… कि मजा आ गया पढ़कर… विश्लेषण तो बहुत ही उम्दा है…।

  4. prem bas mahsoos kiya ja saktaa hai.ise tola nahin ja sakta. koee taraju nahin bana jo ise tol sake.ham ise nafaa nuksaan ke paldon par tol kar saagar ko gilaas se naapne kee nakaam koshis karte hain.Rahim ne theek hi likha hai-rahiman preeti sarahie,mile hot rang doon,jyon jardee hardee tajai taje safedi choon. to ek dusre ke astitwa ka vlineekaran hee prem hai.vinay ojha snehil.

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