सारथी: काव्य अवलोकन 9

प्रस्तुत है आपको चिंतनमनन के लिये प्रेरित करने के लिये पांच चुने हुए फूल. इन रचनाकरों के चिट्ठों पर जाकर पूरी माला को देखना न भूलें. टिप्पना न भूलें कि सारथी ने आपको वहां तक पहुंचाया !!

वैलेंटाइन डे का, सेलीब्रेशन था इक होटल में,
बाहर श्यामू रोटी ढूँढ़े, अपनी रधिया की खातिर ! [पूरी कविता पढें …]

यकायक तब वस्तुस्थिति का भान हुआ
जब स्वयं को एक निर्जन से स्थान में पाया
सोचा, अरे मैं ये कहां चला आया?
शायद घर से बहुत दूर निकल अया… [पूरी कविता पढें …]

हर रात उसका चेहरा
टिमटिमाते तारों के बीच
और जब भी कोई तारा
ज्यादा प्रकाशमान होता है,
लगता है मेरा नन्हा
लौट आया है
तारा बनकर
और कहता है-
“मत रो माँ मैं यहीं हूँ [पूरी कविता पढें …]

आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा,
लूटा दोनों हाथ से, प्‍यारा वतन हमारा।
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा,
तोड़ो गुलामी की जंज़ीरें बरसाओ अंगारा। [पूरी कविता पढें …]

तराश लेता हूँ उस से भी आईने “मन्ज़ूर”
किसी के हाथ का पत्थर अगर लगे है मुझे [पूरी कविता पढें …]

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Author: Super_Admin

4 thoughts on “सारथी: काव्य अवलोकन 9

  1. सागर की गहराई में जाकर मोती चुनना और कई बार खाली हाथ भी वापस आना पड़ता होगा पर यह जो सर आपका उत्साह है जो कंकड़-पत्थर में बार-बार हाथ खंगालकर भी मोती को चुनता हैं और आपकी पारखी नजरे उसे तराशकर यहाँ प्रस्तुत करती हैं…बहुत अच्छा सर बहुत अच्छा…।

  2. आपके माध्यम से हमने इन चिट्ठाकारों की रचनायें पढी । आपका बहुत -बहुत शुक्रिया ।

    बहुत-बहुत बधाई !

  3. मैंने आज आपकी ये पूरानी चिट्ठी देखा.. कवितायें तो बहुत ही खूबसूरत थी सभी, सारे एक से बढकर एक.. धन्यवाद आपका जो आपने वहां तक पहूंचाया..

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