चिट्ठों पर टिप्पणी न करें!

हर चिट्ठाकर की इच्छा होती है कि उसको टिप्पणी मिले. स्थापित लेखकों को जिस तरह थोक में टिप्पणियां मिलती हैं उस तरह न मिले तो भी कम से कम प्रति रचना तीन चार टिप्पणियां भी मिल जायें तो बहुत से नवोदित चिट्ठाकारों का हौसाला बढ जायगा. अत: कई चिट्ठाकर तो कुंठा के कारण लिख भी देते हैं कि भईया, कोई तो करो एक टिप्पणी हमारे चिट्ठे पर.

मजे की बात है कि इन नवागंतुकों मे से बहुत से लोग टिप्पणी चाहते हैं, लेकिन किसी और को टिप्पणी नहीं देते है. यह बात मैं पिछले 4 माह से नोट कर रहा हूं. अत: उन लोगों के लिय, जो कभी भी किसी अन्य के चिट्ठे पर टिप्पणी नहीं करते, कुछ सुझाव नीचे दे रहा हूं.

1. आप तो टिप्पणी चाहते हैं, पर आप किसी को टिप्पणी नहीं देते अत: आप कई महीनों तक उस अनजान टिप्पणीकार की बाट जोहते रहेंगे जो इतना बेवकूफ होगा कि आपको एकतरफा टिप्पणी देता रहेगा. अरे भईया, वह नहीं आयगा. इस बीच इंतजार करते करते आपकी चिट्ठाकारी पर पूर्णविराम नहीं लगा तो अल्पविराम तो लग जायगा.

2. आप तो टिप्पणी चाहते हैं, पर आप किसी को टिप्पणी नहीं देते अत: जल्दी ही आप चिट्ठाजगत में एक प्रश्नचिन्ह बन जायेंगे. हरेक को मालूम है प्रश्नचिन्ह अधिक दूरी तक नहीं चल पाता है.

3. आप तो टिप्पणी चाहते हैं, पर आप किसी को टिप्पणी नहीं देते अत: तेजी से बढते चिट्ठासंसार में आप हमेशा अपरिचित ही रहेंगे. कल को यदि आपका चिट्ठा एवं आपके शहर का भूतमहल एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगेंगे कि कौन लोगों को दूर भगाने में अधिक सफल है तो निश्चित आपका चिट्ठा ही जीतेगा.

चिट्ठाजगत में पहचान अपने आप नहीं आती, बल्कि बनाई जाती है. यह पहचान बनती है सार्थक लेखों द्वारा एवं अन्य लोगों के साथ संबंध बढा कर. अत: आप अपने चिट्ठे की रचना के लिये जितना समय देते हैं, उतना ही समय चिट्ठाभ्रमण एवं टिप्पणियों के लिये दें. नहीं तो आप सफल नहीं हो पायेंगे.

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: विश्लेषण, आलोचना, सहीगलत, निरीक्षण, परीक्षण, सत्य-असत्य, विमर्श, हिन्दी, हिन्दुस्तान, भारत, शास्त्री, शास्त्री-फिलिप, सारथी, वीडियो, मुफ्त-वीडियो, ऑडियो, मुफ्त-आडियो, हिन्दी-पॉडकास्ट, पाडकास्ट, analysis, critique, assessment, evaluation, morality, right-wrong, ethics, hindi, india, free, hindi-video, hindi-audio, hindi-podcast, podcast, Shastri, Shastri-Philip, JC-Philip,

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Author: Super_Admin

17 thoughts on “चिट्ठों पर टिप्पणी न करें!

  1. मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ। चिट्ठाकार टिप्पणी के नहीं पाठकों के लिये लिखते हैं। पाठक आ रहे हैं या नहीं, पढ़ रहे हैं या नहीं यह मुझे अपने हिट काउंटर के आँकड़ों से पता चल जाता है। निजी तौर पर मैं अपनी प्रविष्टियों पर बेवजह की टिप्पणियों पाने की न अपेक्षा रखता हूं और न ही बेवजह टिप्पणी करता हूँ। मेरा तो मानना कि यदि कुछ ठोस लिखने का नहीं हो या आपकी टिप्पणी से प्रविष्टि में कुछ जुड़ता न हो या बहस में योगदान न होता हो तो “वाह वाह” या “लिखते रहें” की ३ शब्दों की कॉपी पेस्ट दाद वाली टिप्पणी की बजाय चुप्पी रखना श्रेयस्कर है। कभी कभार बार मैं भी अनावश्यक टिप्पणी कर देता हूँ पर तभी जब चिट्ठाकार मेरे गुरु अनूप हों या जब यूं ही कोई चुहल करनी हो। मेरे टिप्पणी ना करने से कई लोग भले ये सोचते हों ये चिट्ठे नहीं पढ़ता, सचाई यह है कि मैं चिट्ठे समय मिलने पर ज़रूर पढ़ता हूं पर टिप्पणी सोच समझ कर ही करता हूँ और मुझे नहीं लगता कि ये मेरी प्रविष्टि को टिप्पणी न मिलने या चिट्ठाकारों का कोपभाजन बनने का कारक है, मेरे चिट्ठे पर “मेरी पसंद” पृष्ठ पर ऐसे चिट्ठे हैं जो मुझे पसंद हैं पर उन पर खास टिप्पणीयाँ नहीं आईं पर मैं इसे पोस्ट की गुणवत्ता से जोड़ कर नहीं देखता, मसलन अगर मैं महिला चिट्ठाकार होता तो शायद कूड़ा पोस्ट पर भी दो दर्जन कमेंट बटोर लेता। आप क्या सोचते हैं?

  2. आप और देवाशीष दोंनों ही अपनी जगह सही है। हां मैं ऐक बात मानता हूं कि टिप्पणी से मेत्री भाव पडता है, यह ऐक संवाद बढाने का जरिया है। मैने जब लिखना शुरू किया था तो टिप्पणी लिखने या पढने के सोचा भी नहीं था। मेरा उद्देश्य केवल अपनी रचनाएं लिखना था पर आज मैं इस समय मिल्ने पर इस प्रक्रिया में सहर्ष शामिल होता हूं। मैं सच छिपाता नहीं हूं। मैं आपके ब्लोग पर टिप्पणी करता हूं इस्से तीन लाभ होते हैं ऐक तो मेरे नाम का भी प्रचार होता है और फ़िर आप जैसे मित्र से सतत संपर्क की अनुभूति होती है और तीसरा यह कि आप तीसरा आप खुश होते हैं। मुझे टिप्पणी लिखना समय खराब करना नही लगता।

    दीपक भारतदीप

  3. मैं भी देवाषीश जी की बात से सहमत हूं पर इसमें एक बात जोड़ना चाहता हूं।
    मैं प्रयत्न करता हूं कि जो चिट्ठकार हिन्दी चिट्ठाजगत में पहला कदम रख रहें हैं उन पर अवश्य टिप्पणी करूं। यह किसी टिप्पणी पाने या अपनी पहचान बनाने के लिये नहीं, पर नये चिट्ठाकार को उत्साह बढ़ाने के लिये। उसे विश्वास दिलाने के लिये कि कोई उसे पढ़ रहा है। अक्सर नये चिट्ठाकार हिट कॉंउटर की बात भी नहीं जानते। कई उसके बाद मेरे चिट्ठे में आते हैं तो सवाल पूछते हैं और नियमित रूप से हिन्दी चिट्ठाकारी पर जुड़ जाते हैं। कई बाद में यह भी पूछते हैं कि मैं और टिप्पणियां क्यों नहीं करता हूं तो उन्हे यह सब बताना पड़ता है। यह मैंने अपने लेख में विस्तार से यहां स्पष्ट भी किया है।
    हां यदि आप नये चिट्ठाकार हैं तो अपनी पहचान बनाने के लिये टिप्पणी करना जरूरी है ताकि कम से कम एक बार लोग आपके चिट्ठे पर आयें। यदि आप अच्छा लिखते हैं तो वे फिर बार बार आयेंगे। यदि अच्छा नहीं लिखते तो फिर आप कितनी ही टिप्पणी करें लोग बार बार नहीं आयेंगे।

  4. देबु दा जो बात कह रहे हैं कि चिट्ठाकार आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता है वो अलग मुद्दा है। भले ही कोई आत्मसंतुष्टि के लिए लिखता हो पर वो ब्लॉग इसीलिए लिख रहा है कि कोई उसे पढ़े नहीं तो वो डायरी लिखता।

    इस बात में कोई शक नहीं कि टिप्पणी करना अन्य साथी चिट्ठाकारों से परिचय बढ़ाने का सबसे बेहतरीन जरिया है। नए चिट्ठाकारों के लिए तो ये स्थापित होने का एक अमोघ अस्त्र है।

    फिर कौन कहता है कि सिर्फ वाह-वाह कहिए, थोड़ा आराम से सोचिए तथा सार्थक टिप्पणी कीजिए।

  5. बेहद पते की बात कही है सारथी जी। दिक्कत यही है कि हर किसी को लगता है कि उसके पास हीरा है, लोग देखते क्यों नहीं। लेकिन यहां तो हर कोई हीरा लेकर टहल रहा है। आम जिंदगी में भी हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि हम सिर्फ लेना चाहते हैं, देना कुछ नहीं चाहते।

  6. केवल प्रोत्‍साहन के लिए टिप्‍पणी देना बुरा नहीं है लेकिन अकारण और निरर्थक टिप्‍पणी देना भी बुध्दिमानी नहीं है । ब्‍लागर को प्रोत्‍साहन तो देना चाहिए लेकिन उसके कण्‍टेण्‍ट के आधार पर दें तो दोनों का और समूची ब्‍लाग विधा का भला होगा । ‘मैं तेरी पीठ खुजाऊं, तू मेरी खुजा’ वाली बात ‘स्‍थायी चरित्र’ नहीं बननी चाहिए । टिप्‍पणी करना या न करना कोई आधार नहीं हो तो ही बेहतर है । इससे सम्‍बन्‍धों पर कोई अन्‍तर नहीं आता । मैं, मेरे गुरु श्री रवि रतलामी की अनेक पोस्‍टों पर कोई टिप्‍पणी नहीं करता इससे हमारे सम्‍बन्‍धों में कोई अन्‍तर आता है । मैं ब्‍लाग संसार में अभी मई 2007 से ही आया हूं । मेरी कुछ पोस्‍टों पर मुझे मेरी उम्‍मीद, मेरी योग्‍यता, मेरी पात्रता से कहीं-कहीं अधिक टिप्‍पणियां मिलीं और किसी पोस्‍ट पर एक भी नहीं । टिप्‍पणी न मिलने से तकलीफ तो होती है लेकिन इससे अपने लिखे की स्‍वसमीक्षा करने का अवसर भी मिलता है जिसकी अन्तिम परिणती लेखन में बेहतरी हो होती है ।
    इसलिए, केवल टिप्‍णी के लिए टिप्‍पणी करने वाली मानसिकता किसी के भी लिए हितकर नहीं होगी ।

  7. मेरा मनाना यह है की टिप्पणी जरूरी है हा यह बात भी सच है की बे वजह की टिप्पणी ग़लत है, ये कहना की आत्म संतुस्ती के लिए सिर्फ़ लिखते है, ब्लॉग पर ये बात कहना और भी ग़लत. अगर आत्म संतुस्ती के लिए ब्लोग्पर लिखते है और किसी से कोई लेना देना नही है तो इससे बड़ा वक़्त बरवाद करने वाला मैंने नही देखा, बहुतों के ऊपर ” मन मन भावे , मुडी हिलावे” वाली कहावत सही बैठती है.
    मैं यह नही कहता की सब पे टिप्पणी करो पर आपको जो अच्छा लगता है उसपे आप टिप्पणी नही कर रहे तो ये आप अपने साथ ही नाइंसाफी कर रहे है अपनी मानसिकता का परिचय दे रहे है, एक तो किसी ने आपका मनोरंजन किया, जानकारी दी , दर्द सहलाया वो भी फ्री मे, आपके चंद शब्द उसका इधन बन सकते है या आपकी आलोचना उसे अपने आप को या आपको आगे रास्ता दिखा सकती है.
    दूसरे शब्दो मे तुच्छ भासा मे कहे तो आप होटल मे तो वेटर को टिप देते हो, क्या लिखने वाला इतना गया गुजरा है की उसकी २-४ शब्दो की टिप की भी औकात नही.
    मेरे ख्याल मे हिंदी ब्लोगर अभी बहुत ही शुरुआती दौर में है यहाँ बुद्धीजीवियो से ज्यादा तकनीकी ज्ञान वाले लोगों की संख्या ज्यादा है. बहुत से लोगो ने बेतुकी बहसबाजी के लिया इसे मध्यम बनाया है, हमारी सुन लो दुनिया जाए भाड़ में.
    गरिमामयी हिंदी अभी आयी नही है ब्लोग्पर, यह आपसी सहयोग से ही आसकती है, तकनीकी एक यन्त्र है और व्यव्हार पूरा संयंत्र.
    किसी को बुरा लगे तो माफी चाहता हूँ

  8. वैसे ये बात तो सच है….
    टिप्पणी देने से उत्साहवर्धन तो होता है…
    अब लेखक का टिप्पणी का इंतेज़ार न करना एसा है…कि कोई महिला ‘बनारसी सिल्क’ और उससे मिलती चूड़िया,आभूषण आदि पहने और ये न चाहे की कोई आकर उसकी तारीफ़ मे कुछ कहे…
    सो अपनी रचनाओं पर हर रचनाकार को टिप्पणी का इंतेज़ार रहता है…
    कैसा लिखा है… इसका मानक टिप्पणी ही तय करती ..आप की जिस रचना पर सबसे अधिक टिप्पणी मिली होगी…
    निशित ही वो सबसे अच्छी या सबसे बुरी रचना होगी…

    सही नब्ज़ पकड़ी..

    एसा मुझे लगता है.

    ..मस्तो…

  9. वाह! यहाँ से तो एक पोस्ट का मसाला मिल गया। अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगा, विस्तार से, क्योंकि टिप्पणी मे पूरी पोस्ट लिखने का कोई विचार नही।

  10. इसमें कोई संदेह नहीं कि एक उम्दा रचनाकार हैं आप . शब्द और बिंब में ग़ज़ब का तालमेल.उपरवाला ऐसी प्रतिभा विरले को ही देता है. आपकी प्रस्तुति प्रशंसनिए है. बधाईयाँ ……/

  11. अगर आप अपनी बात दूसरों के साथ बांटते हैं तो आप उन पर दूसरो की प्रतिक्रिया भी अवश्य चाहेंगे, इसमे कुछ ग़लत भी नही है, तो कोई कहे की उसे टिप्पणियों का इंतज़ार नही रहता तो झूट कहता है, शास्त्रीजी जो बात कह रहें हैं उसका तात्पर्य इतना ही है की यदि आप चाहते हैं की कोई आपकी बात सुने तो दूसरों की बात सुनने का धैर्य भी आप मे होना चाहिए

  12. शास्त्री जीं का यह प्रेक्षण बिल्कुल सही है की कुछ लोगों की यह मानसिकता है कि वे अपने लिए तो कमेंट्स चाहते हैं मगर दूसरों के लिखे को अनदेखा कर जाते हैं ,शायद पढते भी नही .ऐसे लोग अपने को बहुत विशिष्ट समझते हैं.
    शास्त्री जीं ने महज ऎसी मनसिकत्ता कि अच्छी ख़बर ली है जो सर्वथा उचित ही है .हाँ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका हमेशा यह रोना रहता है कि उनके पोस्ट को उन्मुक्त जीं या शास्त्री जीं कभी पढते ही नही ,अरे भैया कुछ सारभूत लिखो तो ये दोनों महारथी ही नही हम भी पढने को बेकरार रहेंगे और कमेंट्स भी करेंगे .वैसे भी अगर आप मे सचमुच दम और धैर्य है तो भवभूति की तरह चुप रहिए क्योंकि उनके ही शब्दों मे –
    ” उपतस्यते कोपि समान धर्मा कालोअपि निरवधि विपुलांच पृथ्वी “-कभी तो मुझे समझने वाला कोई होगा ,काल निरवधि है और धरती विशाल .
    किमाधिकम ……..

  13. उन्मुक्त जी की बात से सौ फ़ीसदी सहमत!
    नए चिट्ठाकारों को यह एहसास दिलाना ज़रुरी है कि उन्हें कोई पढ़ रहा है जिस से वे और भी लिखें।
    क्योंकि जब हम नए नए चिट्ठाजगत में आए थे अपना वर्डप्रेस का चिट्ठाजगत में तो वरिष्ठ चिट्ठाकारों की टिप्पणी से ही हौसला बढ़ा था।

    आज भी बहुत से नए चिट्ठाकार काउंटर और क्लस्टरमैप आदि के बारे में पू्छते ही रहते हैं।

  14. शास्त्री जी आपकी बात से भी सहमत हूं और जिन महानुभावों की टिप्पणियां आई हैं उनकी बातों के भी कई बिंदुओं से सहमत हूं। ज्यादातर तो यही हो रहा है कि तू मेरी पीठ खुजा , मै तेरी खुजाऊं। मगर ये तो खुद को धोखा देने वाली बात हुई। हमें तो गंभीर पाठक की तलाश है। दूसरी बात यह ज्यादा तसल्ली देती है कि आपके लिखे को लोग पढ़ रहे हैं, चाहे टिप्पणी न दे रहे हों। तीसरी बात यह कि अगर आप सार्थक लिख रहे हैं तो स्थाई पाठक कभी न कभी तो टिप्पणी लिखेगा ही और वही काफी है। चौथी बात यह कि इतने सारे चिट्ठों को पढ़ना संभव नहीं , चाहे सार्थक की ही तलाश क्यो न हो। दरअसल आपका अपना लिखना महत्वपूर्ण है इसीलिए तो आप ब्लागिंग में आए हैं। अब जितना समय आपके पास अपना लिखने के लिए है उसके बाद कोई समय नहीं है तो क्या दूसरे का पढ़ेंगे और क्या टिप्पणी लिखेंगे ?
    यह बहस तो चलती रहेगी। बीच का रास्ता यही है कि ब्लागरोल में चुनींदा चिट्ठों को रखें और धीरे धीरे नयों को देखते रहे। सराहते रहे।

  15. हेलॊ जी
    मैँ केरल से हूँ। मलयालम में ब्लोग कर रहा हूँ।
    मैंने ब्लॊगिंग ब्लॊगस्पॊट में शुरू किया था। अब मेरा जॊ ब्लॊग( रजी चन्द्रशॆखर ) वॆर्ड्प्रस में है, उसी में हिन्दी प्रविष्टियाँ भी शामिल कर रहा हूँ । कृपया दॆखें और अड्वैस भी दें।

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