हिंसक पति: पत्नी क्या करे?

प्रश्न: शास्त्री जी, मेरी एक सखी के पति ने पिछले दिनों उस पर बहुत जोर से प्रहार किया एवं डर कर वह अपने 6 साल की बेटी के साथ अपने घर चली गई है. वह अब वापस नहीं जाना चाहती क्योंकि उसे अपने जीवन का भय है. क्या किया जाये कि बात गुपचुप रहे लेकिन पति को सजा भी मिल जाये.

उत्तर: वैवाहिक जीवन में कलह एवं हिंसा बहुत दुख की बात है क्योंकि सही रीति से निर्वाह किया जाये तो विवाह दुनियां में सबसे अधिक तसल्ली, शांति, खुशी, एवं प्रोत्साहन देने वाली एक संस्था है. आपकी सखी के साथ जो कुछ हुआ वह गलत हुआ है तथा समय रहते उस के लिये हल निकालना जरूरी है वर्ना कई जिंदगियां तबाह या (कम से कम) अशांत हो सकती हैं.

सबसे पहले तो आप समझ लें वैवाहिक जीवन इतनी सरल एक प्रक्रिया नहीं है कि आपके लिखे दो या चार वाक्यों के आधार पर कोई बेंडएड जैसा आसान हल सुझाया जा सके. न ही मानव जीवन यंत्रवत है कि खराब हुए कुछ कलपुर्जे बदल दें तो सब ठीक हो जाये. इसे मन में रखकर मेरा परामर्श पढें एवं जरूरी हुआ तो पुन: अधिक जानकारी के लिये लिखें, या मेरे सुझाव के अनुसार मित्रों एवं परिवारजनों की मदद लें. यदि स्थिति बहुत खराब है कानून की मदद ली जा सकती है, लेकिन इसे हमेशा आखिरी विकल्प के रूप में रखना चाहिये.

चिट्ठाजगत में कई कानून के ज्ञाता लोग हैं एवं आखिरी विकल्प के उपयोग के लिए आप उन लोगों की मदद ले सकती हैं. कानून से जुडे चिट्ठों में मेरी व्यक्तिगत पसंद तीसरा खंबा है जहां दिनेशराय द्विवेदी जी आपको एकदम सही सुझाव देंगे.

प्रश्न के हल के लिए निम्न बिंदुओं का जिस क्रम सें उनको मैं ने नीचे दिया है उसी क्रम से विश्लेषण करें, वह भी दो दो तीन तीन बार वस्तुनिष्ठ तरीके से करें. जल्दबाजी से या भावनात्मक तरीके से विश्लेषण करेंगी तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है. इसलिये वैवाहिक जीवन की समस्याओं को उतने ही सावधानी से सुलझाना चाहिये जितनी सावधानी से हम लोग महंगे नक्काशीदार कांच के बर्तनों को हाथ में लेते हैं.

आप ने पूछा है कि इस घटना में पति को किस तरह सजा दिलाई जाये. इसका मतलब है कि आपकी नजर में आपकी सखी इस घटना में पूरी तरह निर्दोष है. मैं आपके मूल्यांकन की कदर करता हूँ, लेकिन एक परामर्शदाता की हैसियत से निवेदन करूंगा कि एक बार और निश्चित कर लें कि आपकी सखी ने वादविवाद, झगडे, उपेक्षा आदि के द्वारा समस्या को तूल तो नहीं दिया. यदि दिया है तो समस्या का हल अलग कोण से होगा. यदि नहीं तो अलग तरीके से होगा.

फिलहाल मैं यह मान कर चलूँगा कि आपकी सखी एक दम निर्दोष है एवं उसके साथ हिंसा हुई है, ज्यादती हुई है. अत: अब क्या करना है.  आपने पूछा है “क्या किया जाये कि बात गुपचुप रहे लेकिन पति को सजा भी मिल जाये”.  इस संदर्भ में निम्न बातें सोचें

1. आपका या अपकी सखी का अंतिम लक्ष्य क्या है – पति को सजा दिलाना या उसको सुधारना.

2. आप लोग उस अध-टूटे विवाह को हमेशा हमेशा के लिये तोडना चाहेंगे या पति की हिंसा का एक स्थाई हल निकाल कर उस परिवार को पुन: जोडना चाहेंगे.

3. इस परिवार को तोडने से उस पति, पत्नी, बेटी को एवं उनसे जुडे लोगों को अधिक फायदा होगा या समस्यानिदान के द्वारा अधिक फायदा होगा.

4. जिस तरह से एक डाक्टर का काम जीवनदान है, उसी तरह एक परामर्शदाता का लक्ष्य स्थाई “हल” है न कि स्थाई विध्वंस. अत:  इन तीन बिन्दुओं के आधार पर हम आगे बढेंगे, कल के आलेख में. तब तक आप मेरे तीन प्रश्नों पर सोचें एवं अपनी सखी  को भी सोचने के लिये प्रोत्साहित करें.  (क्रमश:)

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Author: Super_Admin

13 thoughts on “हिंसक पति: पत्नी क्या करे?

  1. क्या कहें वैसे सुधारने की दिशा में ही कदम उठाना लाभदायक होगा…अगर पूरी नाऊम्मीदी न हो तो!!

  2. all such husbands who ” physically torcher ” the wifes should be handed over to the police and given a treatment due to criminals .
    any one who wants to teach a woman to be submisive and accept this as part of married life is only misguiding the woman
    and all those woman who want to hide such things without bringing them out in open are not only harming themselfs but he society
    वादविवाद, झगडे, उपेक्षा आदि के द्वारा समस्या को तूल तो नहीं दिया.
    even if this happens its no justification for the husband to physically harm or torcher or rape the wife

    any woman/wife who wants to hide such things or wants to keep them in wraps is not only harming herself but the entire woman commununity and society in general

    there is no point in continuing to live in such a maariage because children who see such things have a permanently scarred child hood

    any onw who wants to give solutions to such problems should give solutions based on family structure of 2008 and not of family stucture in 1945=1960
    time as achanged and its not right to continue to live with ideologies of past and solve a problem

  3. औरत पर हाथ उठाना पुरूष की गरिमा के विपरीत है -नारी की गरिमा के विरुद्ध तो खैर है ही !
    पर कुछ औरतें पुरुषों पर हाथ छोड़ देती हैं -इन मामलों में क्या किया जाय -तलाक ?

  4. समीर लाल जी और शास्त्री जी आप दोनों से सहमत हूँ.
    अरविन्द जी से यह कहना चाहूंगा कि कभी मेरी पत्नी ने मुझ पर हाथ उठा दिया तो मैं यह भूल कर कि मैं एक पुरूष हूँ जो कि शारीरिक व सामाजिक रूप से सशक्त होता है, मैं माफ़ कर दूँगा.
    मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूंगा कि उसे समझ सकूं कि क्यों उसने ऐसा किया. उसे यह महसूस करने का पूरा अवसर दूँगा कि वह यह सोच सके कि क्या उसने सही किया.
    फ़िर यदि 2-4 माफियाँ दे देने के बाद भी वह न सुधरे तो तलाक ही अन्तिम सत्य है.
    पर तलाक से पूर्व मैं यह भी सोचूंगा कि एक पति-पत्नी ही आपस में नहीं जुड़ते हैं बल्कि दो परिवार और हम दोनों कि संतानें भी एक तलाक से प्रभावित होंगे, अतः सहनशीलता भी विवाह का एक आवश्यक तत्व है, पर इस सहनशीलता की भी एक सीमा होनी ही चाहिए जो पति-पत्नी ही तय करें तो बेहतर है. फिलहाल मेरी नज़र में कोई पैमाना नहीं है.
    पति-पत्नी के रिश्ते में पुरूष हमेशा ही बड़ा होता है क्योंकि-
    1.किसी दूसरे के घर की लड़की उसकी जीवन-संगिनी बनती है, अतः वह मान-सम्मान और प्यार की पूरी-पूरी हकदार होती है. उसका तिरस्कार घर की लक्ष्मी का तिरस्कार होता है, अतः उसका तिरस्कार बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए, पर उसे भी घर की लक्ष्मी बन कर घर को संवारने पर ही ध्यान केंद्रित करने वाली होना चाहिए.
    इस प्रकार दूसरे की पुत्री को अपने घर में शरण देने और जीवन-साथी बनाने के कारण पुरूष समाज में बड़ा होता है. दूसरे के घर की पुत्री उसके घर की प्रतिष्ठा (लक्ष्मी) होती है.
    2. साधारणतया पुरूष ही बाहर से धन कमा कर लाता है और पत्नी के हाथ में रख देता है, अतः वह बड़ा हुआ और घर का मालिक भी. उसका यह कर्तव्य होता है कि घर का हर कोई खुश रहे. माता-पिता, पत्नी और बच्चे सभी को वह खुश रख सके. तभी तो वह सच्चे अर्थों में घर का मालिक होता है.
    एक पति अपना घर, घर की प्रतिष्ठा, अपना सारा परिवार और अपना सम्पूर्ण जीवन विवाहोपरांत अपनी पत्नी को सौंप देता है.
    घर की मालकिन या देवी है वो.
    उसका सम्मान = पूरे परिवार का सम्मान.
    पत्नी को तिरस्कृत करने वाला अपने जीवन में अपने कुल-खान-दान का नाम ही डुबोता है.
    जहाँ पत्नी घर की लक्ष्मी होती है वहीं पति भी घर का विष्णु होता है यानी पालनहार. वह पालनहार (पालने वाला) ही क्या जो अपनी पत्नी और बच्चों को खुश न रख पाए !!
    वह लक्ष्मी ही क्या जो घर को तिरस्कृत कर चली जाए !!
    तलाक जीवन का सबसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है भले ही विष्णु जी लापरवाह हों या लक्ष्मी जी. जितना सम्भव हो इससे बचें और सुलह का प्रयास करें.
    फिलहाल पीड़िता को बिल्कुल ही सही सलाह शास्त्री जी ने दी है.
    मेरा मानना है कि ऐसे (ग़लत मार्ग पर चल पड़े) विष्णु जी को थोड़ा सा समय दें ताकि उन्हें अपनी गलती का अहसास हो सके. लक्ष्मी जी भी पति की गलती को माफ़ करने का प्रयास करें, कम से कम बच्चे के भविष्य के विषय में सोचें.
    और यदि इसके उपरांत भी बात न बने तो विवाह-विच्छेद ही अन्तिम विकल्प है.
    ( वैसे तो पति-पत्नी दोनों ही एक गाड़ी के दो पहिये हैं, दोनों ही बराबर हैं. अब लक्ष्मी-विष्णु में बड़े छोटे की बात करना ग़लत होगा. पुरूष को बड़ा कहने का मतलब उसे उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराना है, उससे बड़प्पन दिखाने की इच्छा रखना है. पत्नी के प्रति अच्छा व्यवहार करने के लिए प्रेरित करना मात्र ही है.)

  5. पत्नी पर हाथ उठाना ही क्रूरता है। लेकिन यदि पति को अहसास हो उस की गलती का, और शादी न टूटे तो सुंदर है। बेटी से उस का पिता न छिने। इस के लिए शादी से यहाँ तक का इतिहास छानना होगा और तय करना होगा कि शादी किस मोड़ पर है। कानूनी इलाज उस के बाद की बात हैं।

  6. उस अधम को यह बात समझायी जाय कि स्त्री पर हाथ उठाने से बड़ी कायरता कोई और नहीं। लेकिन बात बात में शादी तोड़ने और अलग हो जाने के विकल्प को आगे लाना ठीक नहीं है। ऊपर कुछ अनावश्यक उग्रता दिखायी पड़ती है।

  7. shaadi naa todh kar usii shaadi ko nibhabhnaa jis mey pati hinsak pravarti kaa haen is baat ko jitney bhi log sahii mantey haen ek baar provoked picture jarur daekehy.
    ek aurat kaese criminal ban jaatee haen majburi mae kyuki sab usko shaadi nibhaney ki hi salah daetey haen .
    kyaa yahii utterdaaitav haen hmaara smaaj kae pratii ki ek ham aprivaar kae naam par nirntar naari ko balidan kartey rahey
    किरनजीत अहलुवालिया

  8. कई परिवारों में पति किसी अस्थायी और क्षनिक मानसिक तनाव के कारण ऐसा व्यवहार करता है और बाद में खूब पछताता है। क्षमा करके बात को भूल जाना ही व्यवहारिक अभिगम होगा।

    यदि स्थिति ऐसी नहीं और पति को पत्नि को पीटने की आदत पढ़ गई है तो पत्नि को अपनी सास/ससुर/ या पति के बढ़े भाईयों/भाभियों का समर्थन का प्र्यास करना चाहिए। पति का यदि शिष्ट परिवार हो तो यह लोग पति को सम्झा सकते हैं और उसे सही रास्ते पर ला सकते हैं। कानूनी हल तो अंतिम उपाय होना चाहिए।

  9. आपसी समझ के ना रहने से ही ऐसी स्थितियाँ निर्मित होती हैं. संबंधों को सुधारने की दिशा में कार्य किया जावे तब ही परिवारिक सुख शांति बनी रह सकती है.
    यह भी सही है कि कुछ मामलों में पति को पुलिस के हवाले कर तलाक़ प्राप्त कर लेना ही अपरिहार्य बन जावे. हमारे पुराने समाज की बात की जाए तो एक विकल्प है – मातृ सत्तात्म्क समाज.

  10. आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

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    सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥

    शारदीय नवरात्र में माँ दुर्गा की कृपा से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हों। हार्दिक शुभकामना!
    (हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
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  11. हिंसा- किसी भी तरह की नाजायज हैं शारीरिक भी मानसिक भी लेकिन आप इस बात को भी ध्यान रखें कि पढे-लिखे दम्पतियों में जब पत्नी की जुबान तलवार बन जाती है और असहनीय मानसिक हिंसा बन जाती है तब पति का हाथ उठता है।अनेक बार तो पत्नी यह अच्छी तरह जानती है कि इस बात से वह पति को उकसाकर हाथ उठाने को मजबूर कर लोगो की सहानुभूति प्राप्त कर सकती हैइसे केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है।परामर्शदाता को समस्या को आमूल-चूल समझना चाहिये-मैं एक मनोचिकित्सक हूं ३४ साल के अनुभव से यह कह रहा हूं।

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