क्या ऐसा इतिहास कहीं और मिलेगा?

भारतीय इतिहास जैसा दुनियां में कहीं भी नहीं मिल सकता. हर अन्य देश का इतिहास एक देश का इतिहास है (या एक दर्जन का) लेकिन भारत का इतिहास उन 1000 से अधिक राज्यों का इतिहास है जो  मंद आंच पर पकाये गये स्वादिष्ट खीर के समान है जिसमें आरंभ में “अनेक” चीजें मिलाई गईं लेकिन अंत में “एक” पेय के रूप में प्रगट होती है.

पिछले 6000 हजार सालों में इन 1000 से अधिक राज्यों में  विज्ञान, तकनीकी, ललित कलाये, साहित्य, वास्तुशिल्प आदि के विभिन्न पहलुओं का असामान्य तेजी से विकास हुआ. कहीं एक कला का कहीं दूसरी कला का. आपसी व्यापार के कारण एवं महत्वाकांक्षी राजाओं के कारण अकसर अनेक प्रदेश एक राज्य के हिस्से बना लिये जाते थे एवं अलग अलग राज्यों में विकसित विद्या के आपसी प्रसार के लिये एक अनुकूल वातावरण बन जाता था.

राज्य बनते रहे, मिटते रहे, पुन: बनते रहे. ईसा के काल के आसपास एक वृहत भारत की रूपरेखा बन चुकी थी. इसके फलस्वरूप इन राज्यों  के बीच ज्ञान का प्रसार और अधिक आसान हो गया था. अलग अलग प्रदेश अलग अलग विद्याओं के विकास के लिये अनुकूल था, लेकिन कोई भी प्रदेश सभी विद्याओं के विकास के लिये अनुकूल नहीं था.

उदाहरण के लिये, उत्तरभारत की चिलचिलाती गर्मी में ठंडा पानी बेहद जरूरी है अत: मिट्टी के मटके का अविष्कार हुआ जिसमें पानी वैज्ञानिक कारण से अपने आप ठंडा होता है. केरल जैसे प्रदेश में साल भर समशीतोष्ण मौसम रहता है अत: पीने के लिये कुएं के पानी से अधिक की जरूरत नहीं पडती अत: मिट्टी के इस तरह के घडे बनाने की जरूरत यहां कभी नहीं पडी, एवं ऐसे घडे आज भी यहां नहीं मिलते हैं. लेकिन यहां की चिकनी मिट्टी ऐसी विशेष है कि उस से छिद्रहीन मिट्टी के बर्तन बनाये जा सकते है. फल यह हुआ कि पानी ठंडा करने वाला मिट्टी का घडा यहां नहीं मिलता लेकिन आग पर रख खाना पकाने के लिये मिट्टी के घडे एवं हंडिया यहां हर ओर बनती है.

आज भी केरल में कुछ खास तरह के व्यंजन मिट्टी की हंडिया में ही बनाते हैं एवं ये मिट्टी की हंडियायें बडे आराम से गैस के चूल्हे की गर्मी सहन कर लेती है.

मद्यप्रदेश में विशालकाय पत्थर बहुतायत से मिलते हैं अत: छत के निर्माण के लिये पत्थर की पटियों एवं चूने का प्रयोग विकसित हुआ. चूना भी ऐसा कि सही रीति से छत बनाई जाय तो जो सैकडों सालों तक पानी से बचाव करते हैं. ग्वालियर किले पर तीन सौ से चार सौ साल पुरानी चूने की छतें हैं जो इतने सालों की गर्मीबर्सात के बावजूद अभी तक चटके नहीं हैं.

दिल्ली के लौह जंग न लगने वाले स्तंभ के तुल्य आज भी लोहा नहीं बन पा रहा है. कपडे, औषध, अन्य तकनिकी उपकरण आदि तो मैं ने अभी छुआ भी नहीं है.

ऐसा देश, ऐसी संकृति, एवं ऐसा वैज्ञानिक विकास किसी और देश में नहीं हुआ था, लेकिन अपनी हीन भावना के कारण कई बार हम ये बातें भूल जाते हैं.

यदि आपको टिप्पणी पट न दिखे तो आलेख के शीर्षक पर क्लिक करें, लेख के नीचे टिप्पणी-पट  दिख जायगा!!

ArticlePedia | Guide4Income | All Things Indian

Share:

Author: Super_Admin

15 thoughts on “क्या ऐसा इतिहास कहीं और मिलेगा?

  1. अलग अलग प्रदेशों में जरूरत के हिसाब से जो काम की चीजें विकसीत की गयी,उससे हमारे पूर्वजों के व्यावहारिक ज्ञान की मजबूती का पता चलता है , पर आपने सही लिखा है कि ऐसा देश, ऐसी संकृति, एवं ऐसा वैज्ञानिक विकास किसी और देश में नहीं हुआ था, लेकिन अपनी हीन भावना के कारण कई बार हम ये बातें भूल जाते हैं.

  2. मेरे नगर चम्बल किनारे है जो इन्दौर के नजदीक से निकलती है और पुनः मध्य प्रदेश में प्रवेश कर जाती है।
    “मद्यप्रदेश में विशालकाय पत्थर बहुतायत से मिलते हैं अत: छत के निर्माण के लिये पत्थर की”
    मेरा इशारा मध्य प्रदेश को मद्यप्रदेश लिख जाने से था और सुबह सुबह थोड़ा आप से विनोद का मन भी था।
    कृपया। इसे दुरूस्त कर लें।

  3. पुनःश्च-
    वैसे मद्य की नदियाँ भी वहीं बहती थीं। संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम् का उज्जयनी का मदनोत्सव स्मरण हो आया। हालाँकि वसंत अभी दूर है।

  4. बहुत बढिया पकडा आप ने दिनेश जी. उसे ऐसा ही रहने देते हैं, लोगों को टिप्पणी का मजा लेने दें.

    हम बचपन में एक कलारी के एन सामने रहते थे एवं मध्यप्रदेश की मद्य-प्रदेश नदियां बहुत देखी हैं!!

  5. हमारे घरों मैं आज भी मिट्टी के तवे पर रोटी बनाते हैं बहुत ही स्वादिष्ट होती है…पहले पुराने घङे के नीचे वाले हिस्से को तोङकर जो गोलाकार भाग बच जाता है उसमें बनाते थे …

  6. “ईसा के काल के आसपास एक वृहत भारत की रूपरेखा बन चुकी थी”
    ईसा पूर्व ४ थी शताब्दी में ही मौर्यों का साम्राज्य रहा है. जिसमे पूरा भारत एवं पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान समाहित था. केवल दक्षिण के वर्तमान तमिलनाडु तथा केरल स्वतंत्र थे. इस लिंक पर तत्कालीन भारत का नक्शा मिल जाएगा:
    http://en.wikipedia.org/wiki/Maurya_Empire

  7. @मिहिरभोज
    मिट्टी के तवे! यह तो एकदम नई जानकारी है एवं इसे
    यहां जोडने के लिये आभार !!

    @पा.ना. सुब्रमणियन
    इस अतिरिक्त जानकारी के लिये आभार !!

  8. आपके पोस्ट और उसके साथ दिनेश राय द्विवेदी जी के साथ टीप-वार्ता ने और कुछ टीप कहने के लिए ढिलाई नहीं दी….इसके सिवाय कि, इतिहास ….से हमें आज भी संज्ञान लेने की आवश्यकता है…ताकि आप जैसे ज्ञानी अध्येता आने वाली पीढी को भविष्य में भी इसी तरह स्वर्णिम अतीत से अवगत कराते रहें.

Leave a Reply to दिनेशराय द्विवेदी Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *