गिद्धों का का खेमा !

Vulture “खेमा” शब्द अधिकतर लोग सिर्फ गलत नजरिये से प्रयुक्त करते है, अत: सही नजरिये से जब मैं ने इसका प्रयोग किया (खेमा == जहां लोग एकत्रित होते हैं) तो कुछ चिट्ठाकारों में हलचल मच गई. इस कारण सोचा कि ‘खेमे” का उपयोग एक बार और किया जाये, एक अन्य अर्थ में — गिद्धों के झुंड जहां वास करते हैं उसके बारे में.

इस विषय पर मुझे लेखन की प्रेरणा मिली कहां गए गिद्धराज जो अब पंछी क्यों नही आते ? से प्रेरणा लेकर लिखा गया है. इस लेखन की तय्यारी कर रहा था कि एकदम नजर आया, “बचाओ- विलुप्त हो सकते हैं गिद्ध”

ग्वालियर में मेरा अपना घर शहर के किनारे विश्वविद्यालय के पास, एक गांव से लगा हुआ था. आसपास पचासों ऊचे पेड थे जो गिद्धों के खेमे या बसेरे थे. 5 से 15 किलोग्राम वजन के ये दैत्य इंसानों से डरे बिना उडते थे, एवं पास से निकलते थे तो इनके पंखों द्वारा विस्थापित हवा बहुत लोगों के शरीर पर जोर के थपेडे लगाती थी.

घर के पास एक विशालकाय पुल था जो हल्की ढलान के कारण काफी लंबा हो गया था. हर दसपंद्रह फुट पर दीवार से दो फुट ऊचा एक खंबा था जिस पर ये गिद्ध शाम के समय बैठ कर हवा खाते थे. कई बार पंख फैला कर बैठते थे जिसका फैलाव लगभग 6 से 8 फुट रहता होगा. मेरा एक बहुत बडा शौक था अपने दोनों बच्चों को उनके पास ले जाना. हम लगभग 15 फुट दूर खडे होकर काफी देर बात करते रहते थे और गिद्ध बिल्कुल भी विचलित नहीं होते थे. आखिरी बार जब हम ने यह किया तब बेटा पांचवीं में और बिटिया तीसरी में थी.

ग्वालियर छोडने के बाद यह सिर्फ एक यादगार रह गया है क्योंकि केरल में अभी तक गिद्ध एक भी बार नहीं दिखे हैं. अब बच्चे बडे हो गये हैं लेकिन अभी भी याद दिलाते हैं कि इन गिद्धों के पास तक जाना उनके बाल्यपन की एक रोमांचक यादगार है जिसे वे कभी नहीं भुला सकते. इस बार (मार्च 2008) ग्वालियर गया तो इनके खेमे खाली थे.

गिद्धों के प्रति मेरी इस अभिरुचि का एक कारण है. जब बेटा तीसरी या चौथी कक्षा में था तब मैं ने उसके विज्ञान की पुस्तक  में उन चिडियों के बारे में पढा जो सडीगली चीजों को खाकर पर्यावरण को साफ एवं शुद्ध रखते हैं. कौआ एवं गिद्ध इन में प्रमुख है. पहली बार मैं ने महसूस किया कि ये दोनों पक्षी न हों तो किस तरह पर्यारवण की धज्जियां उडने लगेंगी. तब से इन दोनों पक्षियों से उतना ही स्नेह हो गया जितना तोता मैना से है.

आज गिद्ध, मगर, घडियाल आदि भारत में तेजी से लुप्त होते जा रहे है. कुछ करोड रुपये हर साल खर्च करके इनका पुनर्वास किया जा सकता है. इनकी जनसंख्या बढ गई तो  अरबों रुपये की बर्बादी बचेगी. जरा सोचें कि यदि अगले एक साल के लिये सारे सफाई कर्मचारी अपना काम रोक दें तो क्या होगा. इससे भयानक है प्रकृति के जमादार न रहे तो.

आज राजनेता लोग अपनी मूर्तियां बनाने में, अपने इष्टजनों के लिये संस्थायें बनाने, दिखावे के प्रोजेक्टों पर, करोडों रुपया फूंक रहे हैं. लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिये सारे देश में इसका दसवां हिस्सा पर्याप्त होगा. इस मामले में जनजागरण एवं सरकार पर दबाव डालना जरूरी है.

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Author: Super_Admin

17 thoughts on “गिद्धों का का खेमा !

  1. इंसानियत भी बिलुप्त हो रही है .गिद्ध तो अधिकांश खत्म हो ही गए और जो बचे वह राज………. मे पचुंह गए

  2. ‘बद अच्‍छा बदनाम बुरा’ – यह पोस्‍ट पढने के बाद यही जुमला मन में उभरा । गिध्‍द केवल वैसे ही नहीं होते जैसी उनकी छवि बना दी गई है । वे उपयोगी भी होते हैं – यह आज जाना ।

  3. गिद्ध के प्रति आपकी संवेदना उचित ही है -भगवान् राम भी इनके प्रति बहुत संवेदित थे !

  4. इनकी जनसंख्या बढ गई तो अरबों रुपये की बर्बादी बचेगी. जरा सोचें कि यदि अगले एक साल के लिये सारे सफाई कर्मचारी अपना काम रोक दें तो क्या होगा. इससे भयानक है प्रकृति के जमादार न रहे तो.
    ” oh god, if its happen it will be horrible and drastic… very well said, a serious thought and concern is required to save this useful bird..”

    Regards

  5. विलुप्त होते इस प्रजाति के लिए भारत के हर प्रांत में जनसंख्या अभिवृद्धि कार्यक्रम चलाना होगा. पारसी लोगों में मृत परिजनो को इन पक्षियों के द्वारा खाए जाने के लिए निर्दिष्ट स्थल पर छोड़ देने की परंपरा है, परंतु अब पक्षी नहीं आ रहे हैं. पर्यावरण के प्रति प्रदर्शित संवेदनशीलता के लिए साधुवाद. आभार.

  6. आपने अति संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान आकृष्ट किया है ! रामायण में गिद्ध और कौवा दोनों मौजूद हैं ! कौवा भगवान् के हाथ से रोटी छीनता है ! वो रोटी छीनना भी और गिद्ध को सहायक सिद्ध करना भी इन जीवो की उपयोगिता दर्शाने के लिए किया गया होगा ! बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं, आपको इस लेख के लिए !

  7. एक खतरा बिना आहट किये हमारी ओर आ रहा है और हम इसे देख नहीं पा रहे। गिद्द,घड़ियाल समेत कितने ही प्राणी हैं जो खतरे में हैं। शेर और हाथी पर तो फिर भी सबका ध्यान चला जाता है पर इन पर नहीं।

  8. जटायू और सम्पाती तो हमारी माइथॉलॉजी के सम्मानित गिद्ध हैं। न जाने क्या हो गया है कि वर्तमान भी मिथक बनता जा रहा है कई प्रजातियों के लिये।

  9. पहली बार आपके ब्लौग पर आया “अनवरत” के माध्यम से.पूरा वाकिया इस खेमेबाजी का इस चिट्ठाकारी का इस टिप्पणियों का पढ़ा…और उद्वेलित हो लिखने बैठ गया.
    एक तो आपकी लेखन-शैली इतनी बेबाक और मनोरम लगी
    और ये तमाम जानकारियां….
    हम आपके मुरीद हो गये.

  10. बढता कंक्रीट,घटता जंगल
    मानवता का है अमंगल — आप यह पोस्ट लिख कर लोगो को भविष्य का आइना दिखा रहे है । आपने मेरी पोस्ट को लिंक दिया,लगा कि मेरी मेहनत सफ़ल हुइ है ।

  11. पूरा लेख और साड़ी टिप्पणियाँ पढीं, वही कहना है जो सब ने कहा. मैं भी उतनी ही सहानुभूति रखता हूँ, जितनी कि आप सभी, पर शायद हम इन ख़त्म हो रहे गिद्धों के लिए कुछ नहीं कर सकते. अच्छा लगता यदि इन के लिए हम कुछ कर पाते.
    😐

  12. भगवान राम ने ही तो जटायू का अन्तिम संस्कार किया था !

  13. ये क्या शास्त्रीजी, खेमों की बात करते करते गिद्धों पर उतर आए। शायद खेमों पर किसी ने गीदड़भभ्की दी है। वैसे खेमों और खीमे में अधिक अंतर नहीं है क्योंकि दोनों ही टुकडे-टुकडे होते हैं। और फिर, गिद्ध और खीमें का तो मुंह और पेट का रिश्ता है…

  14. गीध बहुत काम के होते हैं, रामायण में दो गीध पात्र हैं। जटायु जो सीता को बचाने के लिए शहीद हो गया। दूसरा उस का भाई जिस ने हनुमान को सीता का पता लगाने में मदद की।

  15. “इनकी जनसंख्या बढ गई तो अरबों रुपये की बर्बादी बचेगी.” गिद्धों की तो गिद्धसंख्या होनी चाहिए न कि जनसंख्या .

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