अध्यापकों ने दिया धोखा !

भारतीय जनसाधारण अध्यापकों को हमेशा आदर से देखता आया है. आदर से देखना जरूरी भी है क्योंकि बिना शिक्षा या विद्या जीवन जानवरों से बेहतर नहीं है. अत: जो हम को ज्ञान देता है वह आदर का पात्र है.

लेकिन कई बार अध्यापकगण अपनी हैसियत भूल कर ऐसा कार्य करते हैं जो विद्यार्थीयों के मन पर गहरा घाव कर जाते हैं. मैं पढाई में काफी होशियार था और सांस्कृतिक-साहित्यिक प्रतियोगिताओं में अव्वल आता था,  अत: अध्यापकों का इष्ट विद्यार्थी था, लेकिन इसके बावजूद मेरे साथ ऐसी कई घटनाये हुई जो चिट्ठाजगत के अध्यापकों की नजर में लाना चाहता हूँ — ताकि अनजाने भी किसी अध्यापक द्वारा ऐसी भूल  न हो.

बचपन में मेरे अध्यापकों ने एक कहानी सुनाई थी कि कैसे कक्षा के विद्यार्थीयों ने मूंगफली खाकर छिलके कक्षा में डाल दिये. अध्यापक ने इसे देखा तो सबको डांटा और सबसे अपने आसापास के छिलके उठाने की आज्ञा दी. सबने छिलके उठाये, लेकिन एक विद्यार्थी अपनी जगह खडा रहा. जब उससे पूछा गया तो उसने कहा कि उसने छिलके नहीं फैलाये अत: वह नहीं उठायगा.

हमको यह कहानी बार बार सुनाई गई और बताया गया कि वह होनहार बालक भारत के आजादी के वीर सेनानियों एवं नायकों में से एक था. इस बात ने मुझ पर गहरा असर डाला कि जो गलती तुम ने नहीं की है उसकी सजा का विरोध करो. कहानी पहली बार सुनी जब मैं छठी में था, और उस पर अमल करने का मौका मिला नवीं में.

एक बार हम प्रार्थना के लिये पंक्ति में खडे थे. दो शरारती लडके बार बार सबको धक्का दे रहे थे एवं कई लडके बारबार एक दूसरे के ऊपर गिर रहे थे. अचानक हमारे मास्टर साहब आये. सब लडकों को हाथ ऊपर उठा कर खडे होने की सजा दी. मैं ने एवं एक साथी ने हाथ नहीं उठाये. उनका पारा आसामान छू गया.

मेरे साथी ने कई बार सर को समझाया कि हम आपकी सीख पर अमल कर रहे हैं. लेकिन सर न माने. उन्होंने इसे इज्जत का सवाल बना लिया. उनकी सीख के बारे में हम पूछते तो वे उलटासीधा बकने लगते. अंत में हम दोनों के पिताओं को आकर मामला हल करना पडा.

जब नैतिक शिक्षा सिर्फ सिद्धांत के लिये दी जाती है और जब व्यावहारिक जीवन में वही अध्यापक उसी सिद्धांत को नकारता है तो यह विद्यार्थी के साथ धोखा है. एक आनंदमय विद्यार्थी जीवन में कुल चारपांच बार ही इस तरह की घटनायें हुई हैं, लेकिन उनका सदमा इतना गहरा है कि आज भी भूल नहीं पाया हूँ.

हां, एक फायदा जरूर हुआ. मैं ने अपने अध्यापक जीवन में मुक्त-चर्चा का सिद्धांत लागू कर दिया: मैं ने जहां जहां अध्यापन किया वहां विद्यार्थीयों को इस बात की आजादी दी कि यदि मेरे कथनी एवं करनी में विरोधाभास हो तो वे खुल कर मुझे बतायें. इस तरह मेरे एक कडुवे अनुभव के कारण मैं अपने अध्यापन-जीवन में सतर्क रह सका.

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Author: Super_Admin

19 thoughts on “अध्यापकों ने दिया धोखा !

  1. आपने पुराने समय कि बात लिखि है लेकिन वर्तमान मे तो हालात और भी खराब है। जिन्हे बच्चो कि साइक्लोजी समझ मे ही नही आती है, वो भी अध्यापक बने घूम रहे है । पुराने समय मे अध्यापक बच्चो से सिगरेट तक नही मंग्वाते थे । और आजकल तो शराब तक उनके सामने पीते है ।

  2. अध्यापको के बारे मे मेरी स्पष्ट राय है की वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते है . कुछ अपवाद हो सकते है आप जैसे .

  3. कम से कम अध्यापकों को तो स्कूल में कथनी करनी में फर्क नही रखना चाहिय |

  4. yehi hotaa he shastri ji, adhayapak kevel padhane kie liye padhate he.. vo naa mulyo ko aapane jeevan me dhalte he.. naa hi disaro ko prerit karate he…

    (sorry for roman)

  5. मैं ने जहां जहां अध्यापन किया वहां विद्यार्थीयों को इस बात की आजादी दी कि यदि मेरे कथनी एवं करनी में विरोधाभास हो तो वे खुल कर मुझे बतायें.
    ” और आपका यही सिधांत आपकी कामयाबी और लोकप्रियता का राज रहा होगा , वरना तो हमेशा अध्यापक अपने को ही सही और श्रेष्ट मानतें हैं …..”
    Regards

  6. वैसे शास्त्री जी अगर आप अध्यापक की जगह होते तो क्या अनुशासनहीनता का दंड आप पर नहीं लागू होता. यदि सारे बच्चे अध्यापक के विरोध में आ जाते तो अध्यापक का डर हमेशा के लिए छात्रों के मन से निकल जाता. स्कूलों में यह डर ज़रूरी हो जाता है भले ही कॉलेजों में यह डर न हो.
    कहानी शायद वीरता का, साहस का पाठ पढ़ाती हो पर ….
    मेरा मानना है कि वह कहानी भी ज़रूरी थी और वह दंड भी. आप इसे आई गई घटना की तरह समझ कर भूल जाइए. गुरूजी कि बात को मन से मत लगाइए.
    जहाँ तक इस कहानी की बात है तो यह मैंने भी सुनी है और दंड की बात हो तो मुझे भी मिला है. मैंने सहज भाव से स्वीकार भी किया पर टीचर ख़ुद मुझे दंड देकर पछताए थे. हमारे टीचर रो पड़े थे. हम सभी छात्र उनके दोनों कर्तव्यों कहानी सुनाने और दंड देने से सहमत थे.
    कभी-कभी मजबूरीवश ऐसा करना पड़ जाता है. मैं जानता हूँ कि यह विरोधाभास आपको दुखी कर रहा है पर यह ज़रूरी है.
    (मेरी कोई भी टिपण्णी आपके बड़े व्यक्तित्व का विरोध कभी भी नहीं करती.)

  7. शास्त्री जी हमने तो खूब बेंत खाए हैं अपने स्कूलिंग के दौरान ! वैसे हम शरीफ बच्चो में नही थे ! ऐसा कभी हुआ ही नही की सामूहिक सजा का समय हो और उसके जिम्मेदार हम नही रहे हों ! हमारा नाम ही कुख्यात हो गया था ! अत: इस विषय पर राय देने का हमें हक़ नही है ! 🙂

    रामराम !

  8. आलेख का भाव-पक्ष बहस बना सकता है.कई बार यूं भी होता है कि जब आप एक ग्रूप-अक दल के सदस्य हों,तो एक की गलती पर भी पूरे दल को सजा देने का मंतव्य प्रशिक्षण का हिस्सा हो सकता है..

    हमारी सैन्य-प्रशिक्षण प्रणाली कुछ इसी तरह के उसूल पर आधारित…

  9. ‘भटजी भटे खाएं, औरों को परहेज बताएं’ वाली लोकोक्ति अधिकांश अध्‍यापको पर लागू होती है । वे प्राय: ही, अहम्ग्रस्‍त हो जाते हैं और अपनी ही दी गई सीख से उलट व्‍यवहार करते हैं ।

  10. मुझे आपकी बात ठीक नहीं लगती है। यदि यह पता न चल सके कि किसने गलत काम किया है तो सबको एक बराबर सजा देना ठीक है। ऐसा न केवल स्कूलों में पर जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में होता है।

    यदि किसी व्यक्ति का कहना है कि उसने गलती नहीं कि तो उसमें इतनी हिम्मत होनी चाहिये कि वह गलती करने वालों के नाम बताये। यदि वह जानते हुऐ भी (जैसा कि सावरकर की घटना पढ़ के लगता है) नहीं बताता है तो वह उसमें उतना ही शामिल है जितना उसे करने वाला।

  11. शास्त्री जी आपकी बात बिलकुल ठीक है। जो स्वतंत्रता दूसरे पेशों में है, वही शिक्षक को उपलब्ध नहीं हो सकती। यह बड़ी जिम्मेदारी का काम है। अपने शिष्यों के जीवन का निर्माण करने का दायित्व भली प्रकार से निभाने वाले शिक्षकों की कमी होती जा रही है। उसे तो अपने मन, वचन और कर्म में अनुशासित और समानधर्मी होना पड़ेगा।

    असली हालत ऐसी नहीं है। यही दुखद है।

  12. सच बताऊँ तो इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक स्वयं ही शिष्यों को अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं क्योंकि पढ़ाना तो बस एक अच्छी नौकरी मिलने से पहले टाइम-पास करने का साधन मात्र है!

  13. “मन सौं, करेजे सौं, स्रवन-सिर-आंखिनी सौं
    उधौ तिहारी सीख भीख करि लैहें हम .”

    धन्यवाद .

  14. उन्मुक्तजी की टिप्पणी से सहमति! आपका शीर्षक जबरियन सनसनीखेज बनाने की कोशिश है- हमेशा की तरह!

  15. आपने पुराने समय कि बात लिखि है लेकिन वर्तमान मे तो हालात और भी खराब है। जिन्हे बच्चो कि साइक्लोजी समझ मे ही नही आती है, वो भी अध्यापक बने घूम रहे है । पुराने समय मे अध्यापक बच्चो से सिगरेट तक नही मंग्वाते थे । और आजकल तो शराब तक उनके सामने पीते है ।@नरेश सिंह

    वैसे शास्त्री जी अगर आप अध्यापक की जगह होते तो क्या अनुशासनहीनता का दंड आप पर नहीं लागू होता. यदि सारे बच्चे अध्यापक के विरोध में आ जाते तो अध्यापक का डर हमेशा के लिए छात्रों के मन से निकल जाता. स्कूलों में यह डर ज़रूरी हो जाता है भले ही कॉलेजों में यह डर न हो.
    कहानी शायद वीरता का, साहस का पाठ पढ़ाती हो पर ….
    मेरा मानना है कि वह कहानी भी ज़रूरी थी और वह दंड भी. आप इसे आई गई घटना की तरह समझ कर भूल जाइए. गुरूजी कि बात को मन से मत लगाइए.
    जहाँ तक इस कहानी की बात है तो यह मैंने भी सुनी है और दंड की बात हो तो मुझे भी मिला है. मैंने सहज भाव से स्वीकार भी किया पर टीचर ख़ुद मुझे दंड देकर पछताए थे. हमारे टीचर रो पड़े थे. हम सभी छात्र उनके दोनों कर्तव्यों कहानी सुनाने और दंड देने से सहमत थे.
    कभी-कभी मजबूरीवश ऐसा करना पड़ जाता है. मैं जानता हूँ कि यह विरोधाभास आपको दुखी कर रहा है पर यह ज़रूरी है.@E-Guru Rajeev

    मुझे आपकी बात ठीक नहीं लगती है। यदि यह पता न चल सके कि किसने गलत काम किया है तो सबको एक बराबर सजा देना ठीक है। ऐसा न केवल स्कूलों में पर जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में होता है।

    यदि किसी व्यक्ति का कहना है कि उसने गलती नहीं कि तो उसमें इतनी हिम्मत होनी चाहिये कि वह गलती करने वालों के नाम बताये। यदि वह जानते हुऐ भी (जैसा कि सावरकर की घटना पढ़ के लगता है) नहीं बताता है तो वह उसमें उतना ही शामिल है जितना उसे करने वाला।@उन्मुक्त

    उन्मुक्तजी की टिप्पणी से सहमति! आपका शीर्षक जबरियन सनसनीखेज बनाने की कोशिश है- हमेशा की तरह!!!!!

    विस्तृत फ़िर कभी!!!

  16. पिटाई करने के मामले में पिताजी मुक्त हस्त थे तो हमारी तमाम गलतियों की सजा घर में ही मिल जाती थी स्कूल में पिटने की सजा एकाध बार ही मिली वह भी आँखों देखी गलती पर। पर एक बार पिताजी के हाथों स्कूल में पिटना पड़ा था। पर एक की गलती की सजा सब को मिले और निर्दोष को भी तो यह गलत है। इसे शिक्षा और समाज सभी स्थानों से मिट जाना चाहिए।

  17. शास्त्री जी,आज की शिक्षा और शिक्षक दोनों विर्धभासी है. पढो कुछ करो कुछ, सीखो कुछ सिखाओ कुछ. आपके ज़माने के शिक्षक तो फ़िर भी कुछ नैतिकता आदि की बातें करतें है पर आजकल के शिक्षक तो उल्टे अनैतिक बातें ही सिखाते है. मै जब कक्षा १० में पढता था तो विज्ञान के शिक्षक पास प्रैक्टिकल में पास कराने हेतु पैसे भी लिया करते थे जो की सभी छात्र देते थे , और ये परम्परा आज भी बदस्तूर जारी है.

  18. आदर्णीय शास्त्रीजी।
    हर व्यक्ति के जिवन मे नैतिकता होनी ही चाहिऐ। चाहे गुरु हो या शिष्य। आपने गलती नही कि हो पर उसका द्ण्ड आपको मिले तब यह प्रशन उठता है कि सजा अनैतिक थी या नही ? नैनिकता का पाठ पढानेवाला जो सजा देनेवाला बन जाता है ओर वो भी गुरु द्वारा तब आपका यह सवाल कितना जायज है? इसका विशलेषण करना जरुरी बन जाता है।

    शास्त्रीजी, यह बात तो अपने घर से शुरु होनी चाहिये। कभी कभी मा बाप द्वारा भी यह सजा निर्धारित हो जाती है चाहे अज्ञात या ज्ञात पर बच्चो को सुधारने के लिये कभी कभी नैतिकता कि बली चढानी पडती है। सजा के भाव को ध्यान मे रखे तो गुरुजनो एवम माता पिता कि फटकार आपके सवालो के परे रहनी चाहिये। क्यो कि इस सजा/फटकार मे भी नैनिकता के भाव छुपे हुऐ है। आप सजा के मुल उदेश्य को अलग करके ना देखे॥ कुछ लोगो कि उडदण्डता मे आप दोषी नही है और सामुहिक सजा मे आप भी पात्र बने तो इसे भी नैनिकता का पाठ ही माना जाये। सजा मे उदेशय को समाहित करे तब आपको शायद अनैतिकता नही लगे।

    वैसे आचार्य श्री तुलसी ने गुरुओ के लिये एक बात कही थी=

    “निज पर शासन फिर अनुशासन॥

    उन्होने एक गीत के माध्यम से भी मानव से कहा था=

    “सुधरे व्यक्ति,समाज व्यक्ति से, राष्ट्र स्वय सुधरेगा।
    नैतिकता कि सूर सरिता मे,
    जन गन मन पावन हो।
    सयममय जिवन हो।

    मै आपको गुरु मानता हु मेरी भलाई के लिये आप द्वारा प्रदत दन्ड मै प्रसाद स्वरुप ग्रहण करुगा। आपका उपाल्हम नैनिकता का पाठ है मै उसे सहज ग्रहण करके नैतिकवान बनु ऐसा प्रयास रहेगा मेरा।

    मै क्षमा चाहता हु आपसे, जो आपसे सिखा आदर पुर्वक मेरी भावनाओ कि अभिव्यक्ति आपके श्री चरणो मे।

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