क्या व्यायाम मन में किया जा सकता है!!

image स्वस्थ जीवन के लिए व्यायाम बहुत जरूरी है. लेकिन यह कार्य धीरे धीरे आधुनिक जीवन से खिसक कर बाहर होता जा रहा है, जिसका दुष्परिणाम हम में से कई लोग भुगत रहे हैं. अत: व्यायाम को प्रोत्साहित करना जरूरी है.

इस विषय पर अनुसंधान करते समय कुछ दिलचस्प जानकारियां मिली हैं जिनका संबंध न केवल व्यायाम से है, बल्कि मनुष्य के मन से भी संबंधित है. इसे स्पष्ट करने के लिये मान लीजिये कि व्यायाम की बात करने पर कोई व्यक्ति पलट कर पूछे:

भईया, व्यायाम के लिए बिल्कुल समय नहीं है. लेकिन हां रोज शाम को आराम कुर्सी पर एक घंटा लेटने की आदत है. यदि उस एक घंटे मैं यह कल्पना करूं कि मैं जॉगिंग कर रहा हूँ तो कुछ फायदा होगा क्या.

आप एकदम कहेंगे कि सोचने से थोडी व्यायाम होता है! सोचने से थोडी शरीर की ऊर्जा व्यय होती है! व्यायाम तो व्यायाम है, और उसे तो जंग ऐ मैदान में उतर कर ही किया जा सकता है. लेकिन यथार्थ इस से भिन्न है. कई वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि यदि कोई व्यक्ति कल्पना में माहिर हो और यदि वह एक घंटे के जॉगिंग को पूरे एक घंटे में सोच सके, सडकों को देख सके, सडक पडे पत्थरों को देख सके, मतलब यथार्थ और कल्पना को इस तरह से एकीकृत कर दे कि उसे वाकई में जॉगिंग के मानसिक अनुभव से होकर गुजरना पडे तो उसके शरीर में वाकई में काफी परिवर्तन होते  हैं. वे परिवर्तन वैसे ही होंगे  जो वास्तविक जॉगिंग के समय होते हैं.

आप कहेंगे कि वाह वाह, आज तो शास्त्री जी ने एक तोहफा दे दिया है. अब कुर्सी पर पडे पडे व्यायाम कर लिया करेंगे. ऐसा नहीं है. इस तरह के मानसिक अभ्यास के कई दुष्परिणाम भी होते हैं, जिनको देखेंगे अगले आलेख में.

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Author: Super_Admin

10 thoughts on “क्या व्यायाम मन में किया जा सकता है!!

  1. ये क्या शास्त्री जी!हम तो खुश हो गये थे! मन ही मन प्यार तो सुना था मगर मन मे व्यायाम सुनकर खुश हो गये थे,बैठे बैठे जागिंग की कल्पना ने रोमांचित कर दिया था मगर दुष्परिणाम की चेतावनी देकर डरा दिया।

  2. मैं भी आजकल ऐसा ही करता हुं कि मन ही मन सोच लेता हूं कि मैंने आम खाया और सचमुच मजा आ जाता हैं..और कभी कभी तो ये भी सोच लेता हूं कि मैं देश का प्रधानमंत्री बन गया हूं तो भी बाकि कोई माने या न माने पर मैं बङा खुश हो जाता हूं

  3. अरे वाह ..तो क्या ऐसा भी हो सकता है की इस अनोखी जोग्गिंग के बाद पसीना भी …और फिर हम मन ही मन नहा भी लेंगे..व्हाट एन उआईडिया शास्त्री जी..कल ही मल्लिका शेरावत के साथ जोग्गिंग शुरू कर देता हूँ..देखता हूँ कितना फायदा होता है…

  4. मानसिक व्यायाम करने से मानसिक बल में वृद्धि होती है .बहुत सुन्दर पोस्ट. आभार.

  5. यह तो सही है कि सोचने में ऊर्जा का व्यय होता है। लेकिन उस का असर वैसा ही होगा जैसा आप ने कहा है, इस में संदेह है। कर के देखते हैं, अनुभव हो लेगा। पर व्यायाम के बारे में लगातार घंटा या आधा घंटा सोचते रहना असंभव तो नहीं?

  6. वाह शाश्त्री जी, आज आपने हमको आपके ब्लाग के पन्ने रंगने का एक और मौका दे दिया.:) अब जब मौका दे ही दिया है तो सुनिये.

    हमको कुछ लामाओं से संगति करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. एक लामा हमको तवांग (अरुणाचल प्रदेश) की यात्रा के दौरान मिले. मेरे कुछ खोजी स्वभाव की वजह से मैने उनसे बातचीत शुरु करदी.

    मुझे आश्चर्य जनक लगा कि वो सिर्फ़ साधू ही नही थे बल्कि उन लोगों मे जीवन को जीने का एक पूरा नजरिया था. बडे ही हंसमुख थे. मजाक तो कर ही लेते थे बीच बीच मे. अभी तीन दिन पहले ही दलाई लामा हमारे शहर मे थे. वो भी बहुत हंसमुख हैं और काफ़ी मजाक कर लेते हैं. पूछने पर उन्होने कहा कि हंसना भी एक योग है. सभी को हंसाओ. और चमत्कार देखो. खैर..

    जब मेरे हृदय रोग के बारे मे उनको पता चला तो उन्होने मुझे कुछ योगिक क्रियाये इस संबंध मे बताई. और आप जिस बात का जिक्र कर रहे हैं, मुझे वैसा ही कुछ बताया था.

    १. मुझे पहला अभ्यास बताया : आंखे बंद करके पालथी लगाकर बैठ जाओ. ध्यान मुद्रा में…अब कल्पना करो कि आप बचपन मे पहुंच गये हैं और जिन गलियों मे तेज दौडा करते थे ..उन्ही गलियों मे दौड रहे हैं. स्कूल मे ग्राऊंड मे फ़ुटबाल खेल रहे हैं..या खेतों की मेड पर दौड लगा रहे हैं.

    परिणाम : बिल्कुल दौडने जितनी ही हृदय गति मे बढाव और आंख खोलते ही युं लगता है जैसे बस अभी दौडे चले आ रहे हैं.

    मैं अक्सर यह ध्यान अभी भी करता हूं और विशेषकर बरसात के दिनों मे जब बाहर घूमने नही जा पाता. मुझे यह उतनी ही चुस्ती फ़ुरती देता है जैसा हकीकत मे दौडना. आप भी आजमा कर देखें आपको आनंद नही आये तो फ़ीस वापस.:)

    वहीं पर मुझे मालूम पडा कि तिब्ब्ती मोनेस्ट्रीज मे अंतिम परीक्षा के समय एक प्रयोग करवाया जाता है. सारे वस्त्र गीले करके लामा (परिक्षार्थी) को ध्यान करने के लिये कहा जाता है. वहां का तापमान तो युं ही मायनस मे होता है. वो परीक्षार्थी अब ध्यान मे ही कल्पना करते हैं कि अग्नि जल रही है..और आप आश्चर्य करेंगे कि ना उनके वस्त्र सूखते जाते है बल्कि उनको पसीना भी निकल आता है.

    यह सब कैसे होता है? यह अनुभव करने की बात है. इनको आप गप्प ना समझे. पूरे विस्तार मे तो यहां बताना संभव नही है. पर आपकी बात सौ प्रतिशत सच है.

    अब आप इसमे खतरे भी बता रहे हैं सो आपका क्या तर्क है? वो भी बडी उत्सुकता रहेगी जानने की.

    रामराम.

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