समलैंगिकता: आनुवांशिक या अर्जित?

image समलैंगिकता: आनुवांशिक है या अर्जित इसका अध्ययन इसलिये जरूरी है कि यदि यह आनुवांशिक हो तो इसके लिये कुछ भी करना कठिन है. लेकिन यदि यह एक सीखी हुई आदत हो तो जिस तरह नशेडी की चिकत्सा की जाती है उसी प्रकार इन लोगों को भी चिकित्सा मुहैया करवाई जा सकती है.

चित्र: अमरीका के में 2008 में हुए समलैंगिक परेड का एक दृश्य

सन 1960 से इस विषय पर काफी अनुसंधान हुआ है और कई लोगों ने इसके संभावित आनुवंशिक कारणों को को ढूंढने की कोशिस की है. आनुवांशिकता कई दावे भी आये हैं लेकिन इन में से कोई भी दावा अभी तक वैज्ञानिक या मेडिकल जगत में सर्वमान्य नहीं हुआ है. न ही अन्य गवेषकों ने इसकी पुष्टि की है. अत: समलैंगिकता को फिलहाल आनुवांशिक नहीं कहा जा सकता है.

दूसरी ओर निम्न बाते भी गवेषकों की नजर में आई हैं:

  1. बहुत से समलैंगिक ऐसे परिवारों से आते हैं जहां पिता एकदम से दब्बू और मां बहुत ही कठोर एवं एकाधिपति किस्म की होती हैं.
  2. एक ही प्रकार के आनुवांशिक पृष्ठभूमि के जुडवां बच्चे एक समान समलैंगिक नहीं बनते.
  3. एक ही परिवार में पले लेकिन विभिन्न आनुवांशिक पृष्ठभूमि के बच्चे (विभिन्न परिवारों में जन्मे बच्चे जो एक परिवार द्वारा गोद लिये गये हैं) समलैंगिक बनने की संभावना अधिक है.
  4. जो लोग इसे छोडना चाहते हैं  उन में से अधिकतर इसे आसानी से छोड लेते हैं.

इसके आधार पर यह स्पष्ट है कि मनोवैज्ञानिक कारणों से कई लोग इस ओर उन्मुख होते हैं.

कुल मिला कर कहा जाये तो समलैंगिकता के  आनुवांशिक होने  के लिये कोई सर्वमान्य प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है. सारे अनुसंधान इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अधिकतर (शत प्रतिशत नहीं) समलैंगिकों के लिये यह सीखी हुई आदत है एवं कंडीशनिंग को हटा लिया जाये तो वे बडे आराम से इसे छोड देते हैं. इस कारण समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने का मैं अनुमोदन करता हूँ. इनको रोगी मानकर इनको मानसिक-शारीरिक चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध करवाया जाना चाहिये.

समलैंगिक लोगों के बीच एक अतिन्यूनपक्ष है जो मां के गर्भ में विकसित होते समय उनके पुरुष या स्त्री संबंध बाहरी या आंततिक अवयव अविकसित रह जाते हैं या उनका विकास भृष्ट हो जाता है. उदाहरण के लिये पुरुष योनि मे जन्मे एक व्यक्ति के शरीर में हो सकता है कि इन विकलांगताओं के कारण स्त्री-हारमोन्स का प्रवाह अधिक हो. ऐसा पुरुष स्त्रीसमान व्यवहार करेगा और पुरुषों की ओर यौनाकर्षण महसूस करेगा. यही स्थिति उन स्त्रियों की है जिनके शरीर में कुछ विकलांगता के समान पुरुष हार्मोनों का प्रवाह अधिक होता है.

ऐसे लोगों की संख्या काफी विरल होती है, लेकिन इनकी समस्या जन्म संबंधी होने के कारण इनका इलाज किया जा सकता है और किया जाना चाहिये. जिस तरह से कोई व्यक्ति जन्म से लंगडा या लूला हो तो उसका इलाज किया जाता है, यही स्थिति इस न्यूनपक्ष की है.  लेकिन बहुसंख्यक समलैंगिकों के लिये यह एक सीखी हुई या आर्जित आदत है.

(कल इस परंपरा का आखिरी लेख छपेगा और वह है: समलैंगिक आंदोलन के घोषित लक्ष्य) [क्रमश:]

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Author: Super_Admin

16 thoughts on “समलैंगिकता: आनुवांशिक या अर्जित?

  1. शास्त्रीजी,
    आपके आलेख से सहमति है लेकिन एक विरोध भी है। यदि ये लेख किसी के विरोध में नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर लिखे जा रहे हैं तो इस एवं पिछली अन्य पोस्ट में लगे हुये चित्रों का आधार क्या है। इन लेखों की सीरीज में लगे हुये सभी चित्र Shock value लिये हुये हैं जो आपने समलैंगिकों की परेड से लिये हुये हैं।

    ऐसे चित्र भी लगाये जा सकते थे जिसमें वो हमारे और आपके जैसे दिखें। मैं ऐसे कई समलैंगिकों को जानता हूँ जो अगर स्वयं किसी को न बतायें तो शायद किसी को पता भी न चले क्योंकि उनके हाव-भाव और व्यवहार में कोई फ़र्क नहीं है। अगर आप चाहें तो खोजकर ऐसे चित्र भी लगा सकते हैं।

  2. मैं भी लगे हाथ कुछ वैज्ञानिक विवेचन कर लूं -नारी और पुरुष के आनुवंशिक अंतर में मुख्य भूमिका एक्स गुणसूत्र की है -पुरुषों में भी यह गुणसूत्र होता है -सिंगल डोज में -तो निश्चित ही मनुष्य में कुछ स्त्रैणता तो होती ही है जबकि नारियों में पुरुष का वाई गुणसूत्र का लेशांश भी नहीं है मगर उनमें भी कभी कभी कतिपय आनुवांशिक असमान्यता के चलते पुरुषत्व दीखने लगता है -जबकि पुरुष में स्त्रैणता की झलक अपवाद नहीं है सामान्य बात है -कहते हैं कृष्ण में यह स्त्रैणता प्रायः दिखती थी -बहरहाल यह तो गुणसूत्र स्तर की बात है -जीन स्तर पर अभी यह पूरी तरह नकारा नहीं जा सका है की समलैंगिक जीन /जीन लड़ी नहीं होती.मेरी संकल्पना यही है की जब अनेक निम्न जीव उभयलिंगी होते हैं तो मनुष्य में भी इनके अवशेषी वजूद होगे हीं ! और किसी दिन उजागर होगें !
    पुरुषों की ९० फीसदी जमात भी जीवन के शुरुआती वर्षों में कभी न कभी समलैंगिक आकर्षण महसूस करती ही है जो नहीं करते वे असामान्य है -यह भले ही अल्पकालिक होती हो मगर होती है -समलैंगिक आकर्षण और किशोर वयी मित्रता में कभी कभी विभाजन रेखा बहुत महीन हो उठती है -हाँ गुदा मैथुन आदि मनुष्य की गवेषणात्मक वृत्तियाँ हैं ( इक्स्प्लोरैटरी बिहैवियर ) -यह हो सकती हैं नहीं भी ! सख्यपन,सूफी संतों की इश्वर के प्रति रूहानी रुझान आदि भी इस प्रवृत्ति से बहुत अलग नहीं है -मुझे तो लगता है समलैंगिकता पर कोर्ट का फैसला सही है -हम इतने अमानवीय नहीं हो सकते की मनुष्य की अपनी निजी आजादी पर अंकुश लगाये जबकि कुदरत ने इसे ग्रीन कार्ड दे दिया हो !

  3. अरविंद जी की बातों से सहमति है। हमें इसे अपराध की श्रेणी से निकाल देना चाहिए जो अदालत कर चुकी है। समलैंगिक संबंध प्रकृति और समाज व्यवस्था के विरुद्ध हैं। इस कारण से इन्हें न्यून रखे जाने के प्रयास समाज को अवश्य ही करने चाहिए। लेकिन उस में ऐसे लोगों के प्रति भाव और व्यवहार एक रोगी जैसा ही होना चाहिए। जैसा ड्रगएडिक्ट्स के प्रति होता है।

  4. समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाने का मैं अनुमोदन करता हूँ. इनको रोगी मानकर इनको मानसिक-शारीरिक चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध करवाया जाना चाहिये.

    @नीरज

    प्रिय नीरज, किसी भी आंदोलन के बारे में लिखते समय उसके हर पहलू के बारे में लिखना जरूरी है. चित्रों में Shock-value है क्योंकि वे उस पहलू को दिखाते हैं जिन के बारे में मैं ने कुछ नहीं लिखा है.

  5. अरविन्द जी से पूर्ण सहमती.चित्रों पर मुझे भी आपत्ति है.

  6. मुझे भी यही लगता है कि समलैंगिकता आनुवांशिक नहीं मानसिक व्याधि है जिसे सिगरेट और शराब की तरह ही छोडा जा सकता है .

  7. @Lovely

    आपको ही नहीं, जो लोग वास्तविकता को छुपा कर रखना पसंद करते हैं उन सब को आपत्ति होगी. (आपत्ति डा अरविंद ने नहीं की, यह नोट किया जाये)

    यह एक वैज्ञानिक लेखनमाला है. जिस तरह प्रसव के ऊपर लिखी पुस्तक में आप प्रसव के चित्र नहीं छुपा सकते उसी प्रकार समलैंगिकों पर लिखे गये आलेख पर समलैंगिको के चित्र तो छपेंगे.

    सस्नेह — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  8. हम भी इसी मत के हैं की समलैंगिकता एक मानसिक विकृति है और इसका इलाज हो सकता है.

  9. We should be compassionate toward homsexuals but who can deny that it is a disease and there is a cure for it in almost every therapy. When I am saying this I am not being cruel to them.

  10. शास्त्रीजी,
    मैं आपकी व्याख्या से असन्तुष्ट हूँ। क्या गे-लेस्बियन परेड ही समलैंगिकों के जीवन का मुख्य पहलू है? यदि नहीं तो सभी तस्वीरें वहाँ से ही क्यों? बहुत से समलैंगिक वैज्ञानिक/गणितज्ञ रह चुके हैं, बहुत से अन्य क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं। उनके भी चित्र लगाते तो कम से कम लोग समझते कि समलैंगिकों की जमात में केवल जंकी नहीं हैं।
    लेकिन ये केवल एक Minor disagreement है, आपकी श्रृंखला को आगे पढने की भी बहुत उत्सुकता है।

  11. प्रिय नीरज, चार चित्रों से इतना असंतुष्ट होने की जरूरत नहीं है. ये चित्र तो आलेख का एक छोटा सा हिस्सा है. मुख आलेख पर ध्यान दें!!

  12. apke vicharon se mujhe koi aapti nahi hai na hi chitron se par main ye nahi manta ki homosexuals samaj ki natikta ko prabhavit kar rahein hain , aur agar homosexuals hain to hamin unhe samaj main vahi adhikaar dene hi honge vo samanya vyaktiyon ke hain . hum hijdn ko bhool rahein hain ve bhi homosexuals ki catagory main aate hain , aur unhe humare samaj ne alag kar rakha hai . main iska purjor virodh karta hoon . main ek insaan isi tarah homosexuals bhi . so agar unke liye kuch kar payein to achha agar nahi to unhe paressan na karein .

  13. aapke vicharon se mujhe koi aapti nahi hai na hi chitron se par main ye nahi manta ki homosexuals samaj ki naitikta ko prabhavit kar rahein hain , aur agar homosexuals hain to hamein unhe samaj main vahi adhikaar dene hi honge jo samanya vyaktiyon ke hain . hum hijdon ko bhool rahein hain ve bhi homosexuals ki catagory main aate hain , aur unhe humare samaj ne alag kar rakha hai . main iska purjor virodh karta hoon . main ek insaan hoon isi tarah homosexuals bhi . so agar unke liye kuch kar payein to achha agar nahi to unhein paresaan na karein .

  14. मेरे देखे समलैंगिकता एक अर्जित की हुई प्रवृति ही है …. जैसे शराबखोरी और धूम्रपान आदि ! इसमें मैं नहीं समझता की कहीं कोई अनुवांशिकता जिम्मेवार हो सकती है ! हाँ अपितु यह संभव है कि किसी व्यक्ति विशेष में क्रोमोजोम्स के कुछ असंतुलन के चलते अपने से इतर विपरीत लिंगी लक्षण प्रकट हो जाएँ परन्तु उस स्तिथि में भी यौन व्योहार के अनुशीलन को उससे नहीं जोड़ा जा सकता ! बाकी रही इलाज कि , चिकित्सा कि बात तो मैं इस संभावना को पूरा समर्थन नहीं दे सकता ! स्वयं से अर्कित कि गयी प्रवृति का सीधा सदा सम्बन्ध मनोदशा या मानसिक स्तिथि से जुड़ जाता है अत: इसका इलाज आसानी से हो सकता है – मुझे इस तरफ शंका है !

    शेष न्यायालय द्वारा इसे अपराधिक दायरों से मुक्त करना एक सराहनीय क़दम मन जा सकता है !

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